अल-हदीद · 16/29
अनुवाद उच्चारण — अल-हदीद
۞ أَلَمْ يَأْنِ لِلَّذِينَ آمَنُوا أَن تَخْشَعَ قُلُوبُهُمْ لِذِكْرِ اللَّهِ وَمَا نَزَلَ مِنَ الْحَقِّ وَلَا يَكُونُوا كَالَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلُ فَطَالَ عَلَيْهِمُ الْأَمَدُ فَقَسَتْ قُلُوبُهُمْ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ ۝١٦
Alam yaani laillzeena aamanooo an takhsha`a quloo buhum lizikril laahi wa maa nazala minal haqqi wa laa yakoonoo kallazeena ootul Kitaaba min qablu fataala `alaihimul amadu faqasat quloobuhum wa kaseerum minhum faasiqoon
📖 हिंदी अर्थ
क्या ईमानदारों के लिए अभी तक इसका वक्त नहीं आया कि ख़ुदा की याद और क़ुरान के लिए जो (ख़ुदा की तरफ से) नाज़िल हुआ है उनके दिल नरम हों और वह उन लोगों के से न हो जाएँ जिनको उन से पहले किताब (तौरेत, इन्जील) दी गयी थी तो (जब) एक ज़माना दराज़ गुज़र गया तो उनके दिल सख्त हो गए और इनमें से बहुतेरे बदकार हैं

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अनुवाद — Tafsir

अल-हदीद (57) : 16

शब्दों के अर्थ:

  • أَلَمْ يَأْنِ: क्या अभी वक़्त नहीं आया?
  • تَخْشَعَ: नरम होना, झुकना, अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाना और उसका एहतिराम करना।
  • لِذِكْرِ اللَّهِ: अल्लाह की याद और उसके ज़िक्र के वक़्त।
  • وَمَا نَزَلَ مِنَ الْحَقِّ: और उस हक़ (सच्चाई) के लिए जो नाज़िल हुई, यानी क़ुरआन।
  • فَطَالَ عَلَيْهِمُ الْأَمَدُ: उन पर लंबा अर्सा गुज़र गया (यानी लंबी मुद्दत बीत गई)।
  • فَقَسَتْ قُلُوبُهُمْ: तो उनके दिल सख्त हो गए।
  • فَاسِقُونَ: हुक्म से निकल जाने वाले, नाफ़रमान।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में ईमान वालों को एक प्यार भरा एहसास दिला रहे हैं और उनसे पूछ रहे हैं: "क्या अभी तक वह वक़्त नहीं आया कि ईमान लाने वालों के दिल अल्लाह की याद और उसके नाज़िल किए हुए हक़ (क़ुरआन) के सामने नरम हों और ख़ुशूअ (गिड़गिड़ाहट) हासिल करें?" यह एक मुहब्बत भरा एहसास है, जो मोमिनों को उनकी कसूर पर ध्यान दिलाता है कि कहीं उनके दिल भी उन लोगों की तरह सख्त तो नहीं हो गए जिन्हें पहले किताब दी गई थी।

अल्लाह तआला फरमाते हैं कि पहले अहले-किताब (यहूद और नसारा) को तौरात और इंजील दी गई, लेकिन उन पर लंबा ज़माना गुज़र गया। उन्होंने अपने दीन को बदल डाला, अल्लाह की निशानियों से मुँह मोड़ लिया, और धीरे-धीरे उनके दिल पत्थर जैसे सख्त हो गए। उनमें से बहुत से लोग अल्लाह की इताअत से निकल गए और फ़ासिक़ (नाफ़रमान) हो गए।

अल्लाह तआला मोमिनों को उनके हाल से सबक़ लेने की तरग़ीब देते हैं। यह आयत दिल को जगाने वाली है — यह हमें बताती है कि दिल की नरमी और ख़ुशूअ अल्लाह की रहमत की निशानी है। जब हम क़ुरआन सुनते हैं, अल्लाह का ज़िक्र करते हैं, तो हमारे दिलों में लज़्ज़त, खौफ़ और मुहब्बत पैदा होनी चाहिए। अगर दिल सख्त हो जाए, तो यह बहुत बड़ा नुक़सान है।

यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपने दिलों को हमेशा तरो-ताज़ा रखना चाहिए, क़ुरआन और ज़िक्र से जोड़े रखना चाहिए, और अहले-किताब की तरह लंबी मुद्दत गुज़रने से दिल के सख्त होने से बचना चाहिए। हमें चाहिए कि हर वक़्त अल्लाह की याद में जिएँ, उसकी आयतों पर ग़ौर करें, और अपने दिल को नरम और ख़ुशूअ वाला बनाए रखें।

याद रखिए! दिल की नरमी अल्लाह की तरफ़ से एक बड़ी नेमत है। जो दिल अल्लाह की याद से नरम हो जाता है, वही दिल सच्ची हिदायत पाता है। और जो दिल सख्त हो जाए, वह हिदायत से महरूम रहता है। आइए हम अपने दिलों को ज़िक्रुल्लाह और क़ुरआन की तिलावत से नरम करें, और अल्लाह की रहमत के तलबगार बनें।



📜 आयत 14-18 — अल-हदीद

14يُنَادُونَهُمْ أَلَمْ نَكُن مَّعَكُمْ ۖ قَالُوا بَلَىٰ وَلَٰكِنَّكُمْ فَتَنتُمْ أَنفُسَكُمْ وَتَرَبَّصْتُمْ وَارْتَبْتُمْ وَغَرَّتْكُمُ الْأَمَانِيُّ حَتَّىٰ جَاءَ أَمْرُ اللَّهِ وَغَرَّكُم بِاللَّهِ الْغَرُورُ
(क्यों भाई) क्या हम कभी तुम्हारे साथ न थे तो मोमिनीन कहेंगे थे तो ज़रूर मगर तुम ने तो ख़ुद अपने आपको बला में डाला और (हमारे हक़ में गर्दिशों के) मुन्तज़िर हैं और (दीन में) शक़ किया किए और तुम्हें (तुम्हारी) तमन्नाओं ने धोखे में रखा यहाँ तक कि ख़ुदा का हुक्म आ पहुँचा और एक बड़े दग़ाबाज़ (शैतान) ने ख़ुदा के बारे में तुमको फ़रेब दिया
15فَالْيَوْمَ لَا يُؤْخَذُ مِنكُمْ فِدْيَةٌ وَلَا مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ مَأْوَاكُمُ النَّارُ ۖ هِيَ مَوْلَاكُمْ ۖ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ
तो आज न तो तुमसे कोई मुआवज़ा लिया जाएगा और न काफ़िरों से तुम सबका ठिकाना (बस) जहन्नुम है वही तुम्हारे वास्ते सज़ावार है और (क्या) बुरी जगह है
16۞ أَلَمْ يَأْنِ لِلَّذِينَ آمَنُوا أَن تَخْشَعَ قُلُوبُهُمْ لِذِكْرِ اللَّهِ وَمَا نَزَلَ مِنَ الْحَقِّ وَلَا يَكُونُوا كَالَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلُ فَطَالَ عَلَيْهِمُ الْأَمَدُ فَقَسَتْ قُلُوبُهُمْ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
क्या ईमानदारों के लिए अभी तक इसका वक्त नहीं आया कि ख़ुदा की याद और क़ुरान के लिए जो (ख़ुदा की तरफ से) नाज़िल हुआ है उनके दिल नरम हों और वह उन लोगों के से न हो जाएँ जिनको उन से पहले किताब (तौरेत, इन्जील) दी गयी थी तो (जब) एक ज़माना दराज़ गुज़र गया तो उनके दिल सख्त हो गए और इनमें से बहुतेरे बदकार हैं
17اعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يُحْيِي الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
जान रखो कि ख़ुदा ही ज़मीन को उसके मरने (उफ़तादा होने) के बाद ज़िन्दा (आबाद) करता है हमने तुमसे अपनी (क़ुदरत की) निशानियाँ खोल खोल कर बयान कर दी हैं ताकि तुम समझो
18إِنَّ الْمُصَّدِّقِينَ وَالْمُصَّدِّقَاتِ وَأَقْرَضُوا اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا يُضَاعَفُ لَهُمْ وَلَهُمْ أَجْرٌ كَرِيمٌ
बेशक ख़ैरात देने वाले मर्द और ख़ैरात देने वाली औरतें और (जो लोग) ख़ुदा की नीयत से ख़ालिस कर्ज़ देते हैं उनको दोगुना (अज्र) दिया जाएगा और उनका बहुत मुअज़िज़ सिला (जन्नत) तो है ही
अल-हदीदकुरान सूची
29आयत
मदनीRevelation
16आयत

अनुवाद — अल-हदीद 16

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Tuesday, August 18, 2026

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