अल-अनआम · 91/165
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अनआम
وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ إِذْ قَالُوا مَا أَنزَلَ اللَّهُ عَلَىٰ بَشَرٍ مِّن شَيْءٍ ۗ قُلْ مَنْ أَنزَلَ الْكِتَابَ الَّذِي جَاءَ بِهِ مُوسَىٰ نُورًا وَهُدًى لِّلنَّاسِ ۖ تَجْعَلُونَهُ قَرَاطِيسَ تُبْدُونَهَا وَتُخْفُونَ كَثِيرًا ۖ وَعُلِّمْتُم مَّا لَمْ تَعْلَمُوا أَنتُمْ وَلَا آبَاؤُكُمْ ۖ قُلِ اللَّهُ ۖ ثُمَّ ذَرْهُمْ فِي خَوْضِهِمْ يَلْعَبُونَ ۝٩١
Wa maa qadarul laaha haqqa qadriheee iz qaaloo maaa anzalal laahu `alaa basharim min shai`; qul man anzalal Kitaabal lazee jaaa`a bihee Moosaa nooranw wa hudal linnaasi taj`aloonahoo qaraateesa tubdoonahaa wa tukhfoona kaseeranw wa `ullimtum maa lam ta`lamooo antum wa laaa aabaaa`ukum qulil laahu summa zarhum fee khawdihim yal`aboon
📖 हिंदी अर्थ
और बस और उन लोगों (यहूद) ने ख़ुदा की जैसी क़दर करनी चाहिए न की इसलिए कि उन लोगों ने (बेहूदे पन से) ये कह दिया कि ख़ुदा ने किसी बशर (इनसान) पर कुछ नाज़िल नहीं किया (ऐ रसूल) तुम पूछो तो कि फिर वह किताब जिसे मूसा लेकर आए थे किसने नाज़िल की जो लोगों के लिए रौशनी और (अज़सरतापा(सर से पैर तक)) हिदायत (थी जिसे तुम लोगों ने अलग-अलग करके काग़जी औराक़ (कागज़ के पन्ने) बना डाला और इसमें को कुछ हिस्सा (जो तुम्हारे मतलब का है वह) तो ज़ाहिर करते हो और बहुतेरे को (जो ख़िलाफ मदआ है) छिपाते हो हालॉकि उसी किताब के ज़रिए से तुम्हें वो बातें सिखायी गयी जिन्हें न तुम जानते थे और न तुम्हारे बाप दादा (ऐ रसूल वह तो जवाब देगें नहीं) तुम ही कह दो कि ख़ुदा ने (नाज़िल फरमाई)

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ: उन्होंने अल्लाह की उसकी सही मर्यादा के अनुसार क़द्र (प्रतिष्ठा/सम्मान) नहीं की।
  • قَرَاطِيسَ: कागज़ों/पन्नों (यहाँ तोड़े-मरोड़े और अलग-अलग किए गए पन्ने मुराद हैं)।
  • تُبْدُونَهَا: तुम उसे (जो तुम्हारे मन-मुताबिक हो) दिखाते हो।
  • وَتُخْفُونَ كَثِيرًا: और बहुत कुछ छिपाते हो।
  • خَوْضِهِمْ: उनके बेकार/झूठे विवाद और बातों में पड़ने में।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला उन लोगों की निंदा कर रहा है जिन्होंने अल्लाह की सच्ची क़द्र नहीं की, यानी उसे वह सम्मान नहीं दिया जो उसके लिए ज़रूरी है। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि अल्लाह ने किसी इंसान पर कुछ भी नाज़िल (उतारा) नहीं। यह बात उन्होंने अल्लाह की महानता और उसकी रहमत को समझे बिना कही।

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ से कहता है कि इनसे पूछो: "अगर तुम्हारा दावा सच है कि अल्लाह ने किसी इंसान पर कुछ नाज़िल नहीं किया, तो वह किताब (तौरात) किसने नाज़िल की जो मूसा (अलैहिस्सलाम) लाए थे? वह किताब जो लोगों के लिए नूर (रोशनी) और हिदायत (मार्गदर्शन) थी?"

फिर अल्लाह तआला यहूदियों को संबोधित करता है और उन्हें डांटता है कि तुम लोगों ने उस किताब (तौरात) को अलग-अलग कागज़ों में बाँट दिया। जो बात तुम्हारे मन-मुताबिक थी, उसे दिखा दिया और जो तुम्हारे ख़िलाफ़ थी, उसे छिपा दिया। उन्होंने मुहम्मद ﷺ की नबुव्वत की निशानियाँ और सच्चाई को छिपाया, और रज्म (पथराव) की आयत को भी छिपाया।

फिर अल्लाह तआला कहता है: "और तुम्हें (अरब के लोगों को) वह चीज़ें सिखाई गईं जो तुम नहीं जानते थे और न तुम्हारे बाप-दादा जानते थे।" यानी क़ुरआन के ज़रिए अल्लाह ने तुम्हें पिछली उम्मतों के हालात, भविष्य की ख़बरें और दीन की वो बातें सिखाईं जो तुम्हारी समझ से बाहर थीं।

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को हुक्म देता है कि इनसे कह दो: "अल्लाह ही ने इसे नाज़िल किया है।" फिर उन्हें उनके हाल पर छोड़ देने का हुक्म देता है कि वे अपनी बेकार बहसों और खेल-कूद में पड़े रहें, यह उनके लिए धमकी है कि अल्लाह उन्हें उनके किए पर पकड़ेगा।


दावत और नसीहत का पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की क़द्र करना यानी उसे सच्चे दिल से मानना, उसकी नाज़िल की हुई हर किताब और हर नबी पर ईमान लाना है। जो लोग अल्लाह की नाज़िल की हुई चीज़ों में से कुछ पर ईमान लाएँ और कुछ को झुठलाएँ, वे दरअसल अल्लाह की सही क़द्र नहीं करते। हमें चाहिए कि हम क़ुरआन और सुन्नत को पूरी तरह मानें, उसमें कोई कमी न करें और न ही उसे छिपाएँ। यही अल्लाह की सच्ची क़द्र है। याद रखें, अल्लाह ने अपनी रहमत से हमें क़ुरआन जैसी किताब दी है जो हर ज़माने के लिए हिदायत है — इसे पकड़ें और इस पर अमल करें, यही हमारी कामयाबी है।



📜 आयत 89-93 — सूरा अल-अनआम

89أُولَٰئِكَ الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ ۚ فَإِن يَكْفُرْ بِهَا هَٰؤُلَاءِ فَقَدْ وَكَّلْنَا بِهَا قَوْمًا لَّيْسُوا بِهَا بِكَافِرِينَ
(पैग़म्बर) वह लोग थे जिनको हमने (आसमानी) किताब और हुकूमत और नुबूवत अता फरमाई पस अगर ये लोग उसे भी न माने तो (कुछ परवाह नहीं) हमने तो उस पर ऐसे लोगों को मुक़र्रर कर दिया हे जो (उनकी तरह) इन्कार करने वाले नहीं
90أُولَٰئِكَ الَّذِينَ هَدَى اللَّهُ ۖ فَبِهُدَاهُمُ اقْتَدِهْ ۗ قُل لَّا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا ۖ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرَىٰ لِلْعَالَمِينَ
(ये अगले पैग़म्बर) वह लोग थे जिनकी ख़ुदा ने हिदायत की पस तुम भी उनकी हिदायत की पैरवी करो (ऐ रसूल उन से) कहो कि मै तुम से इस (रिसालत) की मज़दूरी कुछ नहीं चाहता सारे जहाँन के लिए सिर्फ नसीहत है
91وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ إِذْ قَالُوا مَا أَنزَلَ اللَّهُ عَلَىٰ بَشَرٍ مِّن شَيْءٍ ۗ قُلْ مَنْ أَنزَلَ الْكِتَابَ الَّذِي جَاءَ بِهِ مُوسَىٰ نُورًا وَهُدًى لِّلنَّاسِ ۖ تَجْعَلُونَهُ قَرَاطِيسَ تُبْدُونَهَا وَتُخْفُونَ كَثِيرًا ۖ وَعُلِّمْتُم مَّا لَمْ تَعْلَمُوا أَنتُمْ وَلَا آبَاؤُكُمْ ۖ قُلِ اللَّهُ ۖ ثُمَّ ذَرْهُمْ فِي خَوْضِهِمْ يَلْعَبُونَ
और बस और उन लोगों (यहूद) ने ख़ुदा की जैसी क़दर करनी चाहिए न की इसलिए कि उन लोगों ने (बेहूदे पन से) ये कह दिया कि ख़ुदा ने किसी बशर (इनसान) पर कुछ नाज़िल नहीं किया (ऐ रसूल) तुम पूछो तो कि फिर वह किताब जिसे मूसा लेकर आए थे किसने नाज़िल की जो लोगों के लिए रौशनी और (अज़सरतापा(सर से पैर तक)) हिदायत (थी जिसे तुम लोगों ने अलग-अलग करके काग़जी औराक़ (कागज़ के पन्ने) बना डाला और इसमें को कुछ हिस्सा (जो तुम्हारे मतलब का है वह) तो ज़ाहिर करते हो और बहुतेरे को (जो ख़िलाफ मदआ है) छिपाते हो हालॉकि उसी किताब के ज़रिए से तुम्हें वो बातें सिखायी गयी जिन्हें न तुम जानते थे और न तुम्हारे बाप दादा (ऐ रसूल वह तो जवाब देगें नहीं) तुम ही कह दो कि ख़ुदा ने (नाज़िल फरमाई)
92وَهَٰذَا كِتَابٌ أَنزَلْنَاهُ مُبَارَكٌ مُّصَدِّقُ الَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ وَلِتُنذِرَ أُمَّ الْقُرَىٰ وَمَنْ حَوْلَهَا ۚ وَالَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ يُؤْمِنُونَ بِهِ ۖ وَهُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ
उसके बाद उन्हें छोड़ के (पडे झक मारा करें (और) अपनी तू तू मै मै में खेलते फिरें और (क़ुरान) भी वह किताब है जिसे हमने बाबरकत नाज़िल किया और उस किताब की तसदीक़ करती है जो उसके सामने (पहले से) मौजूद है और (इस वास्ते नाज़िल किया है) ताकि तुम उसके ज़रिए से अहले मक्का और उसके एतराफ़ के रहने वालों को (ख़ौफ ख़ुदा से) डराओ और जो लोग आख़िरत पर ईमान रखते हैं वह तो उस पर (बे ताम्मुल) ईमान लाते है और वही अपनी अपनी नमाज़ में भी पाबन्दी करते हैं
93وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ قَالَ أُوحِيَ إِلَيَّ وَلَمْ يُوحَ إِلَيْهِ شَيْءٌ وَمَن قَالَ سَأُنزِلُ مِثْلَ مَا أَنزَلَ اللَّهُ ۗ وَلَوْ تَرَىٰ إِذِ الظَّالِمُونَ فِي غَمَرَاتِ الْمَوْتِ وَالْمَلَائِكَةُ بَاسِطُو أَيْدِيهِمْ أَخْرِجُوا أَنفُسَكُمُ ۖ الْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ الْهُونِ بِمَا كُنتُمْ تَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ غَيْرَ الْحَقِّ وَكُنتُمْ عَنْ آيَاتِهِ تَسْتَكْبِرُونَ
और उससे बढ़ कर ज़ालिम कौन होगा जो ख़ुदा पर झूठ (मूठ) इफ़तेरा करके कहे कि हमारे पास वही आयी है हालॉकि उसके पास वही वगैरह कुछ भी नही आयी या वह शख़्श दावा करे कि जैसा क़ुरान ख़ुदा ने नाज़िल किया है वैसा मै भी (अभी) अनक़रीब (जल्दी) नाज़िल किए देता हूँ और (ऐ रसूल) काश तुम देखते कि ये ज़ालिम मौत की सख्तियों में पड़ें हैं और फरिश्ते उनकी तरफ (जान निकाल लेने के वास्ते) हाथ लपका रहे हैं और कहते जाते हैं कि अपनी जानें निकालो आज ही तो तुम को रुसवाई के अज़ाब की सज़ा दी जाएगी क्योंकि तुम ख़ुदा पर नाहक़ (नाहक़) झूठ छोड़ा करते थे और उसकी आयतों को (सुनकर उन) से अकड़ा करते थे
अल-अनआमकुरान सूची
165आयत
मक्कीअवतरण स्थान
91आयत

अनुवाद — अल-अनआम 91

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पवित्र क़ुरआन


Wednesday, September 30, 2026

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