Ulaaa`ikal lazeena hadal laahu fabihudaahumuq tadih; qul laaa as`alukum `alaihi ajran in huwa illaa zikraa lil `aalameen
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
(ये अगले पैग़म्बर) वह लोग थे जिनकी ख़ुदा ने हिदायत की पस तुम भी उनकी हिदायत की पैरवी करो (ऐ रसूल उन से) कहो कि मै तुम से इस (रिसालत) की मज़दूरी कुछ नहीं चाहता सारे जहाँन के लिए सिर्फ नसीहत है
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یہ وہ لوگ ہیں جن کو خدا نے ہدایت دی تھی تو تم انہیں کی ہدایت کی پیروی کرو۔ کہہ دو کہ میں تم سے اس (قرآن) کا صلہ نہیں مانگتا۔ یہ تو جہان کے لوگوں کے لئےمحض نصیحت ہے
(ये अगले पैग़म्बर) वह लोग थे जिनकी ख़ुदा ने हिदायत की पस तुम भी उनकी हिदायत की पैरवी करो (ऐ रसूल उन से) कहो कि मै तुम से इस (रिसालत) की मज़दूरी कुछ नहीं चाहता सारे जहाँन के लिए सिर्फ नसीहत है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
فَبِهُدَاهُمُ اقْتَدِهْ: अर्थात् उनके मार्गदर्शन का अनुसरण करो, उन्हीं की राह पर चलो।
أَجْرًا: बदला, पारिश्रमिक, कोई पारिश्रमिक।
ذِكْرَى: नसीहत, याद दिलाना, उपदेश।
तफसीर:
ये वे नबी हैं जिन्हें अल्लाह ने सत्य का मार्ग दिखाया और उन्हें अपने धर्म की ओर मार्गदर्शन किया। हे नबी! आप भी उन्हीं के मार्गदर्शन का अनुसरण करें और उन्हीं के तरीक़े को अपनाएँ। यानी जिस प्रकार उन नबियों ने एकेश्वरवाद (तौहीद) की दावत दी, अल्लाह के आदेशों पर दृढ़ रहे और कठिनाइयों पर सब्र किया, आप भी उसी राह पर चलें। यह आदेश केवल नबी के लिए नहीं, बल्कि उनकी उम्मत के लिए भी है कि वे नबियों के मार्गदर्शन को अपनाएँ।
फिर अल्लाह अपने नबी से कहता है कि आप इनकार करने वालों से कह दें: "मैं तुमसे इस क़ुरआन और इस्लाम की दावत पहुँचाने के बदले कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता। मेरा बदला तो अल्लाह के पास है। यह क़ुरआन कोई साधारण किताब नहीं, बल्कि सारे संसार के लिए एक नसीहत और याद दिलाने वाली चीज़ है, ताकि हर इंसान और जिन्न इसे सुनकर अपनी ज़िंदगी सुधार लें और सीधे मार्ग पर चल पड़ें।"
फ़ायदे:
नबियों का मार्गदर्शन एक ही स्रोत से है, इसलिए उनका तरीक़ा ही सच्चा और अनुकरणीय है। इससे हमें सीख मिलती है कि हमें अपने जीवन में नबियों की शिक्षाओं को अपनाना चाहिए।
दावत और इस्लामी काम में किसी प्रकार का सांसारिक लाभ या पारिश्रमिक नहीं लेना चाहिए; हमारा इनाम अल्लाह के पास सुरक्षित है। यह दावत के काम को पवित्र और निष्कपट बनाता है।
क़ुरआन सिर्फ़ किसी एक समुदाय या ज़माने के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया और हर युग के लिए एक सार्वभौमिक नसीहत है। यह हमें बताता है कि इस किताब की रोशनी से हर इंसान अपनी ज़िंदगी को संवार सकता है।
नबी की निस्वार्थता और अल्लाह पर भरोसा हमें सिखाता है कि सच्चे मार्गदर्शन का उद्देश्य लोगों की भलाई है, न कि कोई व्यक्तिगत लाभ। यही इस्लाम की सच्ची रूह है।
(पैग़म्बर) वह लोग थे जिनको हमने (आसमानी) किताब और हुकूमत और नुबूवत अता फरमाई पस अगर ये लोग उसे भी न माने तो (कुछ परवाह नहीं) हमने तो उस पर ऐसे लोगों को मुक़र्रर कर दिया हे जो (उनकी तरह) इन्कार करने वाले नहीं
(ये अगले पैग़म्बर) वह लोग थे जिनकी ख़ुदा ने हिदायत की पस तुम भी उनकी हिदायत की पैरवी करो (ऐ रसूल उन से) कहो कि मै तुम से इस (रिसालत) की मज़दूरी कुछ नहीं चाहता सारे जहाँन के लिए सिर्फ नसीहत है
और बस और उन लोगों (यहूद) ने ख़ुदा की जैसी क़दर करनी चाहिए न की इसलिए कि उन लोगों ने (बेहूदे पन से) ये कह दिया कि ख़ुदा ने किसी बशर (इनसान) पर कुछ नाज़िल नहीं किया (ऐ रसूल) तुम पूछो तो कि फिर वह किताब जिसे मूसा लेकर आए थे किसने नाज़िल की जो लोगों के लिए रौशनी और (अज़सरतापा(सर से पैर तक)) हिदायत (थी जिसे तुम लोगों ने अलग-अलग करके काग़जी औराक़ (कागज़ के पन्ने) बना डाला और इसमें को कुछ हिस्सा (जो तुम्हारे मतलब का है वह) तो ज़ाहिर करते हो और बहुतेरे को (जो ख़िलाफ मदआ है) छिपाते हो हालॉकि उसी किताब के ज़रिए से तुम्हें वो बातें सिखायी गयी जिन्हें न तुम जानते थे और न तुम्हारे बाप दादा (ऐ रसूल वह तो जवाब देगें नहीं) तुम ही कह दो कि ख़ुदा ने (नाज़िल फरमाई)
उसके बाद उन्हें छोड़ के (पडे झक मारा करें (और) अपनी तू तू मै मै में खेलते फिरें और (क़ुरान) भी वह किताब है जिसे हमने बाबरकत नाज़िल किया और उस किताब की तसदीक़ करती है जो उसके सामने (पहले से) मौजूद है और (इस वास्ते नाज़िल किया है) ताकि तुम उसके ज़रिए से अहले मक्का और उसके एतराफ़ के रहने वालों को (ख़ौफ ख़ुदा से) डराओ और जो लोग आख़िरत पर ईमान रखते हैं वह तो उस पर (बे ताम्मुल) ईमान लाते है और वही अपनी अपनी नमाज़ में भी पाबन्दी करते हैं
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