क्या तुम लोगों ने हाजियों की सक़ाई (पानी पिलाने वाले) और मस्जिदुल हराम (ख़ानाए काबा की आबादियों को उस शख़्स के हमसर (बराबर) बना दिया है जो ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत के दिन पर ईमान लाया और ख़ुदा के राह में जेहाद किया ख़ुदा के नज़दीक तो ये लोग बराबर नहीं और खुदा ज़ालिम लोगों की हिदायत नहीं करता है
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کیا تم نے حاجیوں کو پانی پلانا اور مسجد محترم یعنی (خانہٴ کعبہ) کو آباد کرنا اس شخص کے اعمال جیسا خیال کیا ہے جو خدا اور روز آخرت پر ایمان رکھتا ہے اور خدا کی راہ میں جہاد کرتا ہے۔ یہ لوگ خدا کے نزدیک برابر نہیں ہیں۔ اور خدا ظالم لوگوں کو ہدایت نہیں دیا کرتا
سِقَايَةَ الْحَاجِّ: हाजियों (तीर्थयात्रियों) को पानी पिलाने का प्रबंध।
عِمَارَةَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ: मस्जिद-ए-हराम की देखभाल, सेवा और उसका प्रबंधन।
لَا يَسْتَوُونَ: वे बराबर नहीं हैं।
الظَّالِمِينَ: अत्याचारी, जो कुफ्र (अविश्वास) करके अपने ऊपर अत्याचार करते हैं।
तफसीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में मुशरिकों (बहुदेववादियों) से सवाल करता है और उनके इस गलत ख़याल को ठीक करता है कि हाजियों को पानी पिलाना और मस्जिद-ए-हराम की सेवा करना, ईमान और जिहाद के बराबर है। अल्लाह फ़रमाता है: क्या तुमने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिद-ए-हराम की देखभाल को उस व्यक्ति के बराबर ठहरा दिया है जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान लाया और अल्लाह की राह में जिहाद किया? ये दोनों कभी बराबर नहीं हो सकते। क्योंकि ईमान और जिहाद वो आधार हैं जिन पर अल्लाह के यहाँ कर्मों की स्वीकृति टिकी है। जबकि सिक़ाया और इमारत जैसे काम, चाहे वे कितने ही बड़े क्यों न हों, बिना ईमान के अल्लाह के यहाँ कोई वज़न नहीं रखते। मुशरिकों का ये काम भले ही लोगों की नज़र में बड़ा हो, लेकिन अल्लाह के यहाँ उसकी कोई क़ीमत नहीं, क्योंकि ये शिर्क (अल्लाह के साथ साझीदार ठहराने) की वजह से बर्बाद हो जाता है। अल्लाह ने साफ़ कहा: "ये दोनों अल्लाह के यहाँ बराबर नहीं हैं, और अल्लाह अत्याचारी लोगों को (सच्चा रास्ता) नहीं दिखाता।" यानी जो लोग कुफ्र और शिर्क करके अपनी आत्माओं पर अत्याचार करते हैं, अल्लाह उन्हें वो तौफ़ीक़ नहीं देता जो उसके दीन की समझ और उसके कर्मों की स्वीकृति का ज़रिया हो।
फ़ायदे (सबक):
ईमान ही वो बुनियाद है जो अल्लाह के यहाँ हर अच्छे काम को क़बूलियत देता है। बिना ईमान के नेकियाँ भी अल्लाह के यहाँ बेकार हैं।
अल्लाह के यहाँ लोगों की बड़ाई का पैमाना उनके ईमान और अल्लाह की राह में जिहाद है, न कि दुनियावी ख़िदमात या बड़े पद।
इंसान को चाहिए कि वो अपने अच्छे कामों के साथ-साथ अपने ईमान को भी मज़बूत करे, क्योंकि बिना ईमान के हर अच्छा काम अधूरा और नाकाबिल-ए-क़ुबूल है।
ये आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की राह में अपनी जान और माल से जिहाद करना कितनी बड़ी फ़ज़ीलत है, और यही वो रास्ता है जो इंसान को अल्लाह के यहाँ बुलंद दर्जा दिलाता है।
अल्लाह अत्याचारियों को हिदायत नहीं देता, इसलिए हमें चाहिए कि हम किसी भी तरह के शिर्क और कुफ्र से बचें और अपने दीन को साफ़ और ख़ालिस रखें।
क्या तुम लोगों ने हाजियों की सक़ाई (पानी पिलाने वाले) और मस्जिदुल हराम (ख़ानाए काबा की आबादियों को उस शख़्स के हमसर (बराबर) बना दिया है जो ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत के दिन पर ईमान लाया और ख़ुदा के राह में जेहाद किया ख़ुदा के नज़दीक तो ये लोग बराबर नहीं और खुदा ज़ालिम लोगों की हिदायत नहीं करता है
मुशरेकीन का ये काम नहीं कि जब वह अपने कुफ़्र का ख़ुद इक़रार करते है तो ख़ुदा की मस्जिदों को (जाकर) आबाद करे यही वह लोग हैं जिनका किया कराया सब अकारत हुआ और ये लोग हमेशा जहन्नुम में रहेंगे
ख़ुदा की मस्जिदों को बस सिर्फ वहीं शख़्स (जाकर) आबाद कर सकता है जो ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान लाए और नमाज़ पढ़ा करे और ज़कात देता रहे और ख़ुदा के सिवा (और) किसी से न डरो तो अनक़रीब यही लोग हिदायत याफ्ता लोगों मे से हो जाऎंगे
क्या तुम लोगों ने हाजियों की सक़ाई (पानी पिलाने वाले) और मस्जिदुल हराम (ख़ानाए काबा की आबादियों को उस शख़्स के हमसर (बराबर) बना दिया है जो ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत के दिन पर ईमान लाया और ख़ुदा के राह में जेहाद किया ख़ुदा के नज़दीक तो ये लोग बराबर नहीं और खुदा ज़ालिम लोगों की हिदायत नहीं करता है
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और (ख़ुदा के लिए) हिजरत एख्तियार की और अपने मालों से और अपनी जानों से ख़ुदा की राह में जिहाद किया वह लोग ख़ुदा के नज़दीक दर्जें में कही बढ़ कर हैं और यही लोग (आला दर्जे पर) फायज़ होने वाले हैं
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