Allazeena aamanoo wa haajaroo wa jaahadoo fee sabeelil laahi bi amwaalihim wa anufsihim a`zamu darajatan `indal laah; wa ulaaa`ika humul faaa`izoon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और (ख़ुदा के लिए) हिजरत एख्तियार की और अपने मालों से और अपनी जानों से ख़ुदा की राह में जिहाद किया वह लोग ख़ुदा के नज़दीक दर्जें में कही बढ़ कर हैं और यही लोग (आला दर्जे पर) फायज़ होने वाले हैं
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
جو لوگ ایمان لائے اور وطن چھوڑ گئے اور خدا کی راہ میں مال اور جان سے جہاد کرتے رہے۔ خدا کے ہاں ان کے درجے بہت بڑے ہیں۔ اور وہی مراد کو پہنچنے والے ہیں
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और (ख़ुदा के लिए) हिजरत एख्तियार की और अपने मालों से और अपनी जानों से ख़ुदा की राह में जिहाद किया वह लोग ख़ुदा के नज़दीक दर्जें में कही बढ़ कर हैं और यही लोग (आला दर्जे पर) फायज़ होने वाले हैं
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
آمَنُوا: ईमान लाए, अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास किया।
هَاجَرُوا: अपने वतन और घर-बार छोड़कर अल्लाह की राह में प्रवास किया, कुफ्र के देश से इस्लाम के देश की ओर हिजरत की।
جَاهَدُوا: जिहाद किया, अल्लाह के मार्ग में भरपूर कोशिश और संघर्ष किया।
بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ: अपने धन और अपनी जान से।
أَعْظَمُ دَرَجَةً: बहुत बड़े दर्जे वाले, सबसे ऊँचे मरतबे वाले।
الفَائِزُونَ: कामयाब लोग, जो अपनी मंज़िल को पाने वाले हैं।
तफसीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों की फज़ीलत बयान करती है जिन्होंने ईमान के साथ-साथ हिजरत और जिहाद को अपनाया। यानी जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए, फिर अपने वतन को छोड़कर अल्लाह के दीन की खातिर निकल पड़े, और फिर अपने माल और अपनी जान से अल्लाह की राह में जिहाद किया — ऐसे लोग अल्लाह के यहाँ सबसे बड़े दर्जे वाले हैं। उनका मरतबा उन लोगों से कहीं ऊँचा है जो सिर्फ़ हाजियों को पानी पिलाने या मस्जिद-ए-हराम की सेवा का दावा करते थे, लेकिन ईमान और हिजरत और जिहाद से महरूम थे। यह वही लोग हैं जो सच्ची कामयाबी पाने वाले हैं — यानी अल्लाह की रज़ा, जन्नत और उसकी रहमत। उनकी यह कामयाबी किसी दुनियावी चीज़ से नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा और उसके इनाम से है।
फ़ायदे (सबक):
ईमान के साथ अमल ज़रूरी है — सिर्फ़ दावा काफ़ी नहीं। हिजरत और जिहाद ईमान की पक्की निशानी हैं।
अल्लाह के यहाँ इंसान की इज़्ज़त उसके तक़वा और अमल से है, न कि नसब या दुनियावी ख़िदमात के दावे से।
माल और जान को अल्लाह की राह में खर्च करना सबसे बड़ी क़ुर्बानी है, और इसी का इनाम अल्लाह के यहाँ सबसे बड़ा है।
यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की कामयाबी असली नहीं, असली कामयाबी अल्लाह की रज़ा और जन्नत है।
मुसलमान को चाहिए कि वह अपने जीवन में ईमान, हिजरत (बुराई से अलग होना) और जिहाद (अच्छाई के लिए संघर्ष) के रास्ते पर चले, ताकि अल्लाह के यहाँ ऊँचा दर्जा पा सके।
ख़ुदा की मस्जिदों को बस सिर्फ वहीं शख़्स (जाकर) आबाद कर सकता है जो ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान लाए और नमाज़ पढ़ा करे और ज़कात देता रहे और ख़ुदा के सिवा (और) किसी से न डरो तो अनक़रीब यही लोग हिदायत याफ्ता लोगों मे से हो जाऎंगे
क्या तुम लोगों ने हाजियों की सक़ाई (पानी पिलाने वाले) और मस्जिदुल हराम (ख़ानाए काबा की आबादियों को उस शख़्स के हमसर (बराबर) बना दिया है जो ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत के दिन पर ईमान लाया और ख़ुदा के राह में जेहाद किया ख़ुदा के नज़दीक तो ये लोग बराबर नहीं और खुदा ज़ालिम लोगों की हिदायत नहीं करता है
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और (ख़ुदा के लिए) हिजरत एख्तियार की और अपने मालों से और अपनी जानों से ख़ुदा की राह में जिहाद किया वह लोग ख़ुदा के नज़दीक दर्जें में कही बढ़ कर हैं और यही लोग (आला दर्जे पर) फायज़ होने वाले हैं
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