Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- لَا تَعْتَذِرُوا – बहाने मत बनाओ, अपनी माफ़ी पेश मत करो।
- قَدْ كَفَرْتُم – तुम काफ़िर हो गए।
- بَعْدَ إِيمَانِكُمْ – अपने ईमान (और इस्लाम के इज़हार) के बाद।
- إِن نَّعْفُ – अगर हम माफ़ कर दें।
- طَائِفَةٍ – एक गिरोह (समूह)।
- نُعَذِّبْ – हम अज़ाब देंगे।
- مُجْرِمِينَ – अपराधी, जो अपने गुनाह पर अड़े रहे।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ मुनाफ़िक़ों! अब बहाने बनाने का कोई फ़ायदा नहीं। तुमने जो बातें कहीं और जिस तरह अल्लाह के रसूल (ﷺ) और उनके साथियों का मज़ाक़ उड़ाया, उससे तुम्हारा कुफ़्र ज़ाहिर हो गया। तुम पहले ज़ुबान से ईमान लाए थे, लेकिन अपने इस क़ौल (बोल) से तुमने उस ईमान को तोड़ दिया और कुफ़्र का इज़हार कर दिया। इसलिए अब तुम्हारे बहाने क़बूल नहीं होंगे, क्योंकि तुम्हारा जुर्म साबित है।
हाँ, अगर अल्लाह चाहे तो तुममें से कुछ लोगों को माफ़ कर सकता है—वे जो सच्चे दिल से तौबा कर लें, अपने निफ़ाक़ (दोहरेपन) को छोड़ दें और अपने अमल को सुधार लें। लेकिन जो लोग अपने इस जुर्म और निफ़ाक़ पर अड़े रहेंगे और तौबा नहीं करेंगे, उन्हें अल्लाह ज़रूर अज़ाब में डालेगा। यह अज़ाब उनके उसी अपराध की सज़ा होगी, क्योंकि वे दिल से मुनाफ़िक़ थे और अपनी शरारत पर क़ायम रहे।
फ़ायदे (सीख):
- ईमान के बाद कुफ़्र: सिर्फ़ ज़ुबान से ईमान लाना काफ़ी नहीं, बल्कि अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) की शान में बुरा कहना या मज़ाक़ उड़ाना इंसान को ईमान से निकाल सकता है। यह बहुत बड़ा ख़तरा है।
- बहानों की कोई गुंजाइश नहीं: जब इंसान जानबूझकर गुनाह करता है, तो उसे चाहिए कि वह बहाने न बनाए, बल्कि सच्चे दिल से तौबा करे। अल्लाह तौबा करने वालों को माफ़ करता है, लेकिन अकड़ने वालों को पकड़ता है।
- तौबा का दरवाज़ा खुला है: अल्लाह ने यहाँ साफ़ कहा कि अगर कोई गिरोह सच्ची तौबा कर ले, तो उसे माफ़ किया जा सकता है। यह अल्लाह की रहमत की निशानी है कि वह गुनाहगारों को भी मौक़ा देता है, बशर्ते वे पलट आएँ।
- अल्लाह का इंसाफ़: जो लोग अपने जुर्म पर अड़े रहते हैं और सुधार नहीं करते, उन्हें अल्लाह की सज़ा से कोई नहीं बचा सकता। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने अमल की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए और अल्लाह के सामने झुकना चाहिए।
- मुनाफ़िक़ों से बचाव: यह आयत हमें सिखाती है कि मुनाफ़िक़ों की पहचान उनकी बातों और अमल से होती है। हमें अपनी ज़ुबान और दिल को साफ़ रखना चाहिए और किसी भी तरह के दोहरेपन से बचना चाहिए।
📜 आयत 64-68 — सूरा अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 66
सूरा अत-तौबा आयत 66 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : अब बातें न बनाओं हक़ तो ये हैं कि तुम…सूरा आयत 66/129 — सूरा अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अत-तौबा सुनें, सूरा अत-तौबा अनुवाद, सूरा अत-तौबा mp3, सूरा अत-तौबा pdf. आयत 64–68. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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