अत-तौबा · 65/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَلَئِن سَأَلْتَهُمْ لَيَقُولُنَّ إِنَّمَا كُنَّا نَخُوضُ وَنَلْعَبُ ۚ قُلْ أَبِاللَّهِ وَآيَاتِهِ وَرَسُولِهِ كُنتُمْ تَسْتَهْزِئُونَ ۝٦٥
Wala`in sa altahum layaqoolunna innamaa kunnaa nakhoodu wa nal`ab; qul abillaahi wa `Aayaatihee wa Rasoolihee kuntum tastahzi`oon
📖 हिंदी अर्थ
जिससे तुम डरते हो ख़ुदा उसे ज़रूर ज़ाहिर कर देगा और अगर तुम उनसे पूछो (कि ये हरकत थी) तो ज़रूर यूं ही कहेगें कि हम तो यूं ही बातचीत (दिल्लगी) बाज़ी ही कर रहे थे तुम कहो कि हाए क्या तुम ख़ुदा से और उसकी आयतों से और उसके रसूल से हॅसी कर रहे थे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نَخُوضُ (नख़ूज़ु): बातचीत में उलझना, बेकार की बातें करना, मज़ाक़ में बातें बनाना।
  • نَلْعَبُ (नल'अबु): खेलना, मज़ाक़ करना, दिल्लगी करना।
  • تَسْتَهْزِئُونَ (तस्तहज़िऊन): उपहास करना, मज़ाक़ उड़ाना, ठट्ठा करना।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे नबी! जब आप इन मुनाफ़िक़ों (कपटियों) से पूछते हैं कि उन्होंने आपके और आपके साथियों के बारे में वे बुरी बातें क्यों कहीं, तो वे बचाव के तौर पर कहते हैं: "हम तो केवल बातचीत में उलझे हुए थे और खेल-कूद रहे थे, हमारा कोई बुरा इरादा नहीं था, हम तो मज़ाक़ ही कर रहे थे।"

अल्लाह तआला आपको सिखाता है कि आप उनसे कहें: "क्या तुम अल्लाह, उसकी आयतों (क़ुरआन) और उसके रसूल का मज़ाक़ उड़ा रहे थे? क्या यही तुम्हारा खेल और मज़ाक़ था? क्या अल्लाह और उसके दीन जैसी गंभीर और पवित्र चीज़ें मज़ाक़ उड़ाने की वस्तुएँ हैं?"

यह उनके लिए बहुत बड़ी फटकार और ताड़ना है। वे अपने किए पर शर्मिंदा नहीं हुए, बल्कि बहाने बनाने लगे। उनका यह बहाना भी उनके कुफ़्र और मुनाफ़िक़ी को और स्पष्ट कर देता है, क्योंकि ईमान और अल्लाह के दीन का मज़ाक़ उड़ाना किसी भी हालत में माफ़ नहीं किया जा सकता। यह उनके दिलों में मौजूद नफ़रत और बुराई को ज़ाहिर करता है।


फ़ायदे (सीख):

  1. दीन में मज़ाक़ की गुंजाइश नहीं: अल्लाह, उसकी आयतों और उसके रसूल का मज़ाक़ उड़ाना कुफ़्र है, चाहे कोई उसे "मज़ाक़" या "दिल्लगी" ही क्यों न कहे। दीन के मामले में गंभीरता ज़रूरी है।
  2. बहानेबाज़ी से सच्चाई नहीं छिपती: मुनाफ़िक़ लोग अपनी ग़लतियों को छुपाने के लिए बहाने बनाते हैं, लेकिन अल्लाह को सब पता है। इंसान को चाहिए कि वह सच्चाई को स्वीकार करे और तौबा करे।
  3. अल्लाह के दीन की अज़मत: यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम, क़ुरआन और रसूल ﷺ की अज़मत और पवित्रता को हमेशा अपने दिल में रखें। इनकी बेअदबी से बचना हर मुसलमान का फ़र्ज़ है।
  4. मुनाफ़िक़ी की पहचान: मुनाफ़िक़ों की आदत होती है कि वे दीन के मामलों में मज़ाक़ करते हैं और जब पकड़े जाते हैं तो बहाने बनाते हैं। मुसलमान को चाहिए कि वह ऐसी सोहबत से बचे और हमेशा दीन को गंभीरता से ले।
  5. रसूल ﷺ की मोहब्बत: इस आयत में रसूल ﷺ का मज़ाक़ उड़ाने को अल्लाह के मज़ाक़ के बराबर बताया गया है, जो दर्शाता है कि रसूल ﷺ से मोहब्बत और अदब ईमान का हिस्सा है।
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📜 आयत 63-67 — अत-तौबा

63أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّهُ مَن يُحَادِدِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَأَنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدًا فِيهَا ۚ ذَٰلِكَ الْخِزْيُ الْعَظِيمُ
तो ख़ुदा और उसका रसूल कहीं ज्यादा हक़दार है कि उसको राज़ी रखें क्या ये लोग ये भी नहीं जानते कि जिस शख़्स ने ख़ुदा और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त की तो इसमें शक़ ही नहीं कि उसके लिए जहन्नुम की आग (तैयार रखी) है
64يَحْذَرُ الْمُنَافِقُونَ أَن تُنَزَّلَ عَلَيْهِمْ سُورَةٌ تُنَبِّئُهُم بِمَا فِي قُلُوبِهِمْ ۚ قُلِ اسْتَهْزِئُوا إِنَّ اللَّهَ مُخْرِجٌ مَّا تَحْذَرُونَ
जिसमें वह हमेशा (जलता भुनता) रहेगा यही तो बड़ी रूसवाई है मुनाफेक़ीन इस बात से डरतें हैं कि (कहीं ऐसा न हो) इन मुलसमानों पर (रसूल की माअरफ़त) कोई सूरा नाज़िल हो जाए जो उनको जो कुछ उन मुनाफिक़ीन के दिल में है बता दे (ऐ रसूल) तुम कह दो कि (अच्छा) तुम मसख़रापन किए जाओ
65وَلَئِن سَأَلْتَهُمْ لَيَقُولُنَّ إِنَّمَا كُنَّا نَخُوضُ وَنَلْعَبُ ۚ قُلْ أَبِاللَّهِ وَآيَاتِهِ وَرَسُولِهِ كُنتُمْ تَسْتَهْزِئُونَ
जिससे तुम डरते हो ख़ुदा उसे ज़रूर ज़ाहिर कर देगा और अगर तुम उनसे पूछो (कि ये हरकत थी) तो ज़रूर यूं ही कहेगें कि हम तो यूं ही बातचीत (दिल्लगी) बाज़ी ही कर रहे थे तुम कहो कि हाए क्या तुम ख़ुदा से और उसकी आयतों से और उसके रसूल से हॅसी कर रहे थे
66لَا تَعْتَذِرُوا قَدْ كَفَرْتُم بَعْدَ إِيمَانِكُمْ ۚ إِن نَّعْفُ عَن طَائِفَةٍ مِّنكُمْ نُعَذِّبْ طَائِفَةً بِأَنَّهُمْ كَانُوا مُجْرِمِينَ
अब बातें न बनाओं हक़ तो ये हैं कि तुम ईमान लाने के बाद काफ़िर हो बैठे अगर हम तुममें से कुछ लोगों से दरगुज़र भी करें तो हम कुछ लोगों को सज़ा ज़रूर देगें इस वजह से कि ये लोग कुसूरवार ज़रूर हैं
67الْمُنَافِقُونَ وَالْمُنَافِقَاتُ بَعْضُهُم مِّن بَعْضٍ ۚ يَأْمُرُونَ بِالْمُنكَرِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمَعْرُوفِ وَيَقْبِضُونَ أَيْدِيَهُمْ ۚ نَسُوا اللَّهَ فَنَسِيَهُمْ ۗ إِنَّ الْمُنَافِقِينَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
मुनाफिक़ मर्द और मुनाफिक़ औरतें एक दूसरे के बाहम जिन्स हैं कि (लोगों को) बुरे काम का तो हुक्म करते हैं और नेक कामों से रोकते हैं और अपने हाथ (राहे ख़ुदा में ख़र्च करने से) बन्द रखते हैं (सच तो यह है कि) ये लोग ख़ुदा को भूल बैठे तो ख़ुदा ने भी (गोया) उन्हें भुला दिया बेशक मुनाफ़िक़ बदचलन है
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अनुवाद — अत-तौबा 65

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सूरा आयत 65/129 — अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अत-तौबा सुनें, अत-तौबा अनुवाद, अत-तौबा mp3, अत-तौबा pdf. आयत 63–67. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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