Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- الْمُنَافِقُونَ وَالْمُنَافِقَاتُ: मुनाफ़िक़ (दिखावे का ईमान रखने वाले) पुरुष और औरतें।
- بَعْضُهُم مِّن بَعْضٍ: वे एक-दूसरे से हैं, यानी उनका आपस में गहरा रिश्ता और एक जैसी सोच है।
- الْمُنكَرِ: बुराई, कुफ़्र और अल्लाह की नाफ़रमानी।
- الْمَعْرُوفِ: अच्छाई, ईमान और अल्लाह की इताअत।
- يَقْبِضُونَ أَيْدِيَهُمْ: वे अपने हाथ रोक लेते हैं, यानी अल्लाह की राह में ख़र्च नहीं करते।
- نَسُوا اللَّهَ: उन्होंने अल्लाह को भुला दिया, यानी उसकी इताअत और ज़िक्र छोड़ दिया।
- فَنَسِيَهُمْ: अल्लाह ने भी उन्हें भुला दिया, यानी उन्हें अपनी रहमत से महरूम कर दिया।
- الْفَاسِقُونَ: अल्लाह की इताअत से निकल जाने वाले, पूरी तरह से अवज्ञाकारी।
तफ़सीर:
अल्लाह तआला इस आयत में मुनाफ़िक़ीन (दिखावे के मुसलमानों) की हक़ीक़त बयान कर रहे हैं। मुनाफ़िक़ पुरुष और मुनाफ़िक़ औरतें सब एक ही सांचे में ढले हुए हैं — उनका दिल कुफ़्र से भरा है और ज़ुबान पर ईमान का दावा है। वे आपस में एक-दूसरे के साथी और मददगार हैं, लेकिन यह साथीदारी बुराई पर है।
उनकी पहचान यह है कि वे लोगों को बुराई की तरफ बुलाते हैं, कुफ़्र और गुनाह का हुक्म देते हैं, और अच्छाई से रोकते हैं — यानी ईमान, नमाज़, ज़कात और नेक कामों से लोगों को दूर रखते हैं। वे अपने हाथ बंद रखते हैं, यानी अल्लाह की राह में ख़र्च करने से कंजूसी करते हैं, क्योंकि उनके दिलों में अल्लाह की मुहब्बत नहीं होती।
फिर अल्लाह फ़रमाता है कि उन्होंने अल्लाह को भुला दिया — यानी उसकी इताअत, उसका ज़िक्र और उसके हुक्मों को छोड़ दिया — तो अल्लाह ने भी उन्हें भुला दिया, यानी उन्हें अपनी रहमत, हिदायत और तौफ़ीक़ से महरूम कर दिया। यह उनकी सबसे बड़ी सज़ा है कि अल्लाह उन्हें भलाई की तरफ राहत ही नहीं दिखाता।
आख़िर में अल्लाह फ़रमाता है कि मुनाफ़िक़ ही असली फ़ासिक़ (अवज्ञाकारी) हैं — वे पूरी तरह से अल्लाह की इताअत से निकल चुके हैं और गुनाह और गुमराही की राह पर चल रहे हैं।
दावती पहलू:
यह आयत हम मुसलमानों के लिए एक बड़ी नसीहत है कि हम अपने दिलों को साफ़ रखें, अपने अंदर और बाहर को एक जैसा बनाएं। ईमान सिर्फ़ ज़ुबान का दावा नहीं, बल्कि दिल का यक़ीन और अमल का सबूत है। हमें अच्छाई का हुक्म देना चाहिए, बुराई से रोकना चाहिए, और अल्लाह की राह में ख़र्च करने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए। अल्लाह उन्हीं पर रहमत करता है जो उसे याद रखते हैं और उसकी इताअत करते हैं। आओ, हम अपनी ज़िंदगी को ईमान, अमल और सच्चाई की रोशनी में ढालें, ताकि अल्लाह की रहमत और मुहब्बत हमारे शामिल हाल हो।
📜 आयत 65-69 — सूरा अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 67
सूरा अत-तौबा आयत 67 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : मुनाफिक़ मर्द और मुनाफिक़ औरतें एक दूसरे के बाहम जिन्स…सूरा आयत 67/129 — सूरा अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अत-तौबा सुनें, सूरा अत-तौबा अनुवाद, सूरा अत-तौबा mp3, सूरा अत-तौबा pdf. आयत 65–69. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, September 29, 2026
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