हूद · 62/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
قَالُوا يَا صَالِحُ قَدْ كُنتَ فِينَا مَرْجُوًّا قَبْلَ هَٰذَا ۖ أَتَنْهَانَا أَن نَّعْبُدَ مَا يَعْبُدُ آبَاؤُنَا وَإِنَّنَا لَفِي شَكٍّ مِّمَّا تَدْعُونَا إِلَيْهِ مُرِيبٍ ۝٦٢
Qaaloo yaa Saalihu qad kunta feenaa marjuwwan qabla haazaaa atanhaanaaa an na`bu da maa ya`budu aabaaa`unaa wa innanaa lafee shakkim mimmaa tad`oonaaa ilaihi mureeb
📖 हिंदी अर्थ
वह लोग कहने लगे ऐ सालेह इसके पहले तो तुमसे हमारी उम्मीदें वाबस्ता थी तो क्या अब तुम जिस चीज़ की परसतिश हमारे बाप दादा करते थे उसकी परसतिश से हमें रोकते हो और जिस दीन की तरफ तुम हमें बुलाते हो हम तो उसकी निस्बत ऐसे शक़ में पड़े हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَرْجُوًّا: जिससे अच्छी उम्मीदें जुड़ी हों, सम्मानित और प्रतिष्ठित व्यक्ति।
  • مُرِيبٍ: संदेह पैदा करने वाला, जो मन को बेचैन कर दे और जिससे मन को शांति न मिले।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब नबी सालिह अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम समूद को एक ईश्वर की इबादत और बुतों को छोड़ने की दावत दी, तो उनकी क़ौम ने हैरानी और इनकार के अंदाज़ में कहा: "ऐ सालिह! इस दावत से पहले तू हमारे बीच एक ऐसा व्यक्ति था जिससे हमें बड़ी उम्मीदें थीं। हम तुझे अपना नेता, सरदार और समझदार इंसान मानते थे, और तेरी राय को महत्व देते थे। लेकिन अब तू हमें उन देवताओं की इबादत से रोकता है जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते आए हैं? क्या तू हमें हमारे पूर्वजों के रास्ते से हटाना चाहता है? और हमें तो तेरी उस दावत पर गहरा संदेह है जिसमें तू हमें सिर्फ अल्लाह की इबादत की ओर बुलाता है। हमारा दिल इस बात को कबूल नहीं करता, और हमें लगता है कि तू झूठ बोल रहा है।"

यानी उन्होंने दो बातें कहीं: पहली यह कि वे सालिह अलैहिस्सलाम की पिछली अच्छी स्थिति को स्वीकार कर रहे थे, लेकिन इस दावत को उनके सम्मान के खिलाफ समझ रहे थे। दूसरी यह कि वे तौहीद (एकेश्वरवाद) की दावत को संदेह की नज़र से देख रहे थे और उसे सच्चाई से दूर समझ रहे थे। उनका यह रवैया अहंकार, पूर्वजों की अंधी पैरवी और सच्चाई को कबूल न करने पर आधारित था।

फ़ायदे (सबक):

  1. इंसान को चाहिए कि वह सच्चाई को किसी व्यक्ति की पिछली स्थिति से नापे, बल्कि दलील और सबूत से परखे। किसी की अच्छी शख्सियत का मतलब यह नहीं कि उसकी हर बात सच हो, और न ही उसके बदलने का मतलब यह है कि वह गलत है।
  2. पूर्वजों की अंधी पैरवी इंसान को हक़ से दूर कर देती है। अगर बाप-दादा गलत रास्ते पर हों, तो उनकी पैरवी करना बुद्धिमानी नहीं है।
  3. नबियों और दावत देने वालों को चाहिए कि वे लोगों की तरफ से आने वाले इनकार और तंज़ का सामना सब्र और हिकमत से करें, क्योंकि यह अल्लाह के रसूलों का तरीका रहा है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई को कबूल करने में संदेह और झिझक इंसान को हिदायत से महरूम कर सकती है। दिल को साफ रखना और सच्चाई के आगे झुक जाना ही कामयाबी की कुंजी है।
  5. इस्लाम में इंसान की इज़्ज़त उसके ईमान और अमल से है, न कि उसके पूर्वजों या सामाजिक हैसियत से। नबी सालिह अलैहिस्सलाम की दावत इसी उसूल पर थी।


📜 आयत 60-64 — हूद

60وَأُتْبِعُوا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ أَلَا إِنَّ عَادًا كَفَرُوا رَبَّهُمْ ۗ أَلَا بُعْدًا لِّعَادٍ قَوْمِ هُودٍ
और इस दुनिया में भी लानत उनके पीछे लगा दी गई और क़यामत के दिन भी (लगी रहेगी) देख क़ौमे आद ने अपने परवरदिगार का इन्कार किया देखो हूद की क़ौमे आद (हमारी बारगाह से) धुत्कारी पड़ी है
61۞ وَإِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَالِحًا ۚ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ هُوَ أَنشَأَكُم مِّنَ الْأَرْضِ وَاسْتَعْمَرَكُمْ فِيهَا فَاسْتَغْفِرُوهُ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ ۚ إِنَّ رَبِّي قَرِيبٌ مُّجِيبٌ
और (हमने) क़ौमे समूद के पास उनके भाई सालेह को (पैग़म्बर बनाकर भेजा) तो उन्होंने (अपनी क़ौम से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा ही की परसतिश करो उसके सिवा कोई तुम्हारा माबूद नहीं उसी ने तुमको ज़मीन (की मिट्टी) से पैदा किया और तुमको उसमें बसाया तो उससे मग़फिरत की दुआ मॉगों फिर उसकी बारगाह में तौबा करो (बेशक मेरा परवरदिगार (हर शख़्श के) क़रीब और सबकी सुनता और दुआ क़ुबूल करता है
62قَالُوا يَا صَالِحُ قَدْ كُنتَ فِينَا مَرْجُوًّا قَبْلَ هَٰذَا ۖ أَتَنْهَانَا أَن نَّعْبُدَ مَا يَعْبُدُ آبَاؤُنَا وَإِنَّنَا لَفِي شَكٍّ مِّمَّا تَدْعُونَا إِلَيْهِ مُرِيبٍ
वह लोग कहने लगे ऐ सालेह इसके पहले तो तुमसे हमारी उम्मीदें वाबस्ता थी तो क्या अब तुम जिस चीज़ की परसतिश हमारे बाप दादा करते थे उसकी परसतिश से हमें रोकते हो और जिस दीन की तरफ तुम हमें बुलाते हो हम तो उसकी निस्बत ऐसे शक़ में पड़े हैं
63قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّي وَآتَانِي مِنْهُ رَحْمَةً فَمَن يَنصُرُنِي مِنَ اللَّهِ إِنْ عَصَيْتُهُ ۖ فَمَا تَزِيدُونَنِي غَيْرَ تَخْسِيرٍ
कि उसने हैरत में डाल दिया है सालेह ने जवाब दिया ऐ मेरी क़ौम भला देखो तो कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे अपनी (बारगाह) मे रहमत (नबूवत) अता की है इस पर भी अगर मै उसकी नाफ़रमानी करुँ तो ख़ुदा (के अज़ाब से बचाने में) मेरी मदद कौन करेगा-फिर तुम सिवा नुक़सान के मेरा कुछ बढ़ा दोगे नहीं
64وَيَا قَوْمِ هَٰذِهِ نَاقَةُ اللَّهِ لَكُمْ آيَةً فَذَرُوهَا تَأْكُلْ فِي أَرْضِ اللَّهِ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابٌ قَرِيبٌ
ऐ मेरी क़ौम ये ख़ुदा की (भेजी हुई) ऊँटनी है तुम्हारे वास्ते (मेरी नबूवत का) एक मौजिज़ा है तो इसको (उसके हाल पर) छोड़ दो कि ख़ुदा की ज़मीन में (जहाँ चाहे) खाए और उसे कोई तकलीफ न पहुँचाओ
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अनुवाद — हूद 62

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Tuesday, August 18, 2026

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