हूद · 61/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
۞ وَإِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَالِحًا ۚ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ هُوَ أَنشَأَكُم مِّنَ الْأَرْضِ وَاسْتَعْمَرَكُمْ فِيهَا فَاسْتَغْفِرُوهُ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ ۚ إِنَّ رَبِّي قَرِيبٌ مُّجِيبٌ ۝٦١
Wa ilaa Samooda akhaahum Saalihaa; qaala yaa qawmi` budul laaha maa lakum min ilaahim ghairuhoo Huwa ansha akum minal ardi wasta` marakum feehaa fastaghfiroohu summa toobooo ilaih; inna Rabbee Qareebum Mujeeb
📖 हिंदी अर्थ
और (हमने) क़ौमे समूद के पास उनके भाई सालेह को (पैग़म्बर बनाकर भेजा) तो उन्होंने (अपनी क़ौम से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा ही की परसतिश करो उसके सिवा कोई तुम्हारा माबूद नहीं उसी ने तुमको ज़मीन (की मिट्टी) से पैदा किया और तुमको उसमें बसाया तो उससे मग़फिरत की दुआ मॉगों फिर उसकी बारगाह में तौबा करो (बेशक मेरा परवरदिगार (हर शख़्श के) क़रीब और सबकी सुनता और दुआ क़ुबूल करता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَنشَأَكُم: उत्पन्न किया, पैदा किया।
  • اسْتَعْمَرَكُمْ: तुम्हें आबाद करने वाला बनाया, यानी ज़मीन को आबाद करने की ताकत और ज़िम्मेदारी दी।
  • اسْتَغْفِرُوهُ: उससे अपने गुनाहों की माफ़ी माँगो।
  • تُوبُوا إِلَيْهِ: उसी की तरफ़ रुजू करो, सच्ची तौबा करो।
  • قَرِيبٌ مُجِيبٌ: (वह) बहुत करीब है, दुआओं का सुनने वाला और क़बूल करने वाला है।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने क़ौमे समूद की तरफ़ उनके भाई नबी सालिह (अलैहिस्सलाम) को भेजा। उन्होंने अपनी क़ौम को पुकारा और कहा: "ऐ मेरी क़ौम! सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद (पूज्य) नहीं है जो इबादत के लायक़ हो। उसी को अपना रब और मालिक मानो, और उसी के आगे झुको।"

फिर उन्होंने अपनी क़ौम को उसकी सबसे बड़ी नेमत की याद दिलाई: "उसी ने तुम्हें ज़मीन से पैदा किया — तुम्हारे बाप आदम को मिट्टी से बनाया, और फिर तुम्हें ज़मीन पर फैलाया। उसी ने तुम्हें ज़मीन का ख़लीफ़ा और आबाद करने वाला बनाया, ताकि तुम उसमें खेती करो, घर बनाओ, और उसकी नेमतों से फ़ायदा उठाओ। ये सब कुछ उसी की मेहरबानी है।"

इसलिए नबी सालिह ने उन्हें दो चीज़ों की हिदायत दी: पहले अपने गुनाहों की माफ़ी माँगो (इस्तिग़फ़ार करो), फिर सच्चे दिल से अल्लाह की तरफ़ पलटो (तौबा करो) — यानी गुनाह छोड़ो, नेक अमल करो, और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ ढालो। ये तौबा सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि दिल और अमल से होनी चाहिए।

आख़िर में नबी सालिह ने उन्हें ख़ुशख़बरी दी: "मेरा रब बहुत करीब है — वो उन लोगों के करीब है जो उसकी इबादत में सच्चे हैं, और वो हर पुकारने वाले की दुआ सुनता है और क़बूल करता है।" यानी अल्लाह से दूरी का कोई ठिकाना नहीं — वो हमसे हमारी शहरग (गर्दन) की नस से भी ज़्यादा करीब है। बस ज़रूरत है सच्चे दिल से उसकी तरफ़ रुजू करने की।

दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

ये आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह हमारा ख़ालिक (पैदा करने वाला) ही नहीं, बल्कि हमारा मालिक और मेहरबान भी है। उसने हमें ज़मीन पर इज़्ज़त दी, हमें आबाद करने की ताक़त दी — ये उसकी मुहब्बत की निशानी है। जब वो इतना करीब है और हर दुआ सुनता है, तो हमें क्यों न उसकी तरफ़ पलटना चाहिए? चाहे हमसे कितने भी गुनाह हुए हों, उसका दरवाज़ा खुला है। वो सिर्फ़ ये चाहता है कि हम सच्चे दिल से उसकी तरफ़ आएँ, माफ़ी माँगें, और अपनी ज़िंदगी को सुधारें। अल्लाह की रहमत से कभी निराश न हों — वो क़रीब है, सुनता है, और क़बूल करता है।



📜 आयत 59-63 — हूद

59وَتِلْكَ عَادٌ ۖ جَحَدُوا بِآيَاتِ رَبِّهِمْ وَعَصَوْا رُسُلَهُ وَاتَّبَعُوا أَمْرَ كُلِّ جَبَّارٍ عَنِيدٍ
(ऐ रसूल) ये हालात क़ौमे आद के हैं जिन्होंने अपने परवरदिगार की आयतों से इन्कार किया और उसके पैग़म्बरों की नाफ़रमानी की और हर सरकश (दुश्मने ख़ुदा) के हुक्म पर चलते रहें
60وَأُتْبِعُوا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ أَلَا إِنَّ عَادًا كَفَرُوا رَبَّهُمْ ۗ أَلَا بُعْدًا لِّعَادٍ قَوْمِ هُودٍ
और इस दुनिया में भी लानत उनके पीछे लगा दी गई और क़यामत के दिन भी (लगी रहेगी) देख क़ौमे आद ने अपने परवरदिगार का इन्कार किया देखो हूद की क़ौमे आद (हमारी बारगाह से) धुत्कारी पड़ी है
61۞ وَإِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَالِحًا ۚ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ هُوَ أَنشَأَكُم مِّنَ الْأَرْضِ وَاسْتَعْمَرَكُمْ فِيهَا فَاسْتَغْفِرُوهُ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ ۚ إِنَّ رَبِّي قَرِيبٌ مُّجِيبٌ
और (हमने) क़ौमे समूद के पास उनके भाई सालेह को (पैग़म्बर बनाकर भेजा) तो उन्होंने (अपनी क़ौम से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा ही की परसतिश करो उसके सिवा कोई तुम्हारा माबूद नहीं उसी ने तुमको ज़मीन (की मिट्टी) से पैदा किया और तुमको उसमें बसाया तो उससे मग़फिरत की दुआ मॉगों फिर उसकी बारगाह में तौबा करो (बेशक मेरा परवरदिगार (हर शख़्श के) क़रीब और सबकी सुनता और दुआ क़ुबूल करता है
62قَالُوا يَا صَالِحُ قَدْ كُنتَ فِينَا مَرْجُوًّا قَبْلَ هَٰذَا ۖ أَتَنْهَانَا أَن نَّعْبُدَ مَا يَعْبُدُ آبَاؤُنَا وَإِنَّنَا لَفِي شَكٍّ مِّمَّا تَدْعُونَا إِلَيْهِ مُرِيبٍ
वह लोग कहने लगे ऐ सालेह इसके पहले तो तुमसे हमारी उम्मीदें वाबस्ता थी तो क्या अब तुम जिस चीज़ की परसतिश हमारे बाप दादा करते थे उसकी परसतिश से हमें रोकते हो और जिस दीन की तरफ तुम हमें बुलाते हो हम तो उसकी निस्बत ऐसे शक़ में पड़े हैं
63قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّي وَآتَانِي مِنْهُ رَحْمَةً فَمَن يَنصُرُنِي مِنَ اللَّهِ إِنْ عَصَيْتُهُ ۖ فَمَا تَزِيدُونَنِي غَيْرَ تَخْسِيرٍ
कि उसने हैरत में डाल दिया है सालेह ने जवाब दिया ऐ मेरी क़ौम भला देखो तो कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे अपनी (बारगाह) मे रहमत (नबूवत) अता की है इस पर भी अगर मै उसकी नाफ़रमानी करुँ तो ख़ुदा (के अज़ाब से बचाने में) मेरी मदद कौन करेगा-फिर तुम सिवा नुक़सान के मेरा कुछ बढ़ा दोगे नहीं
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अनुवाद — हूद 61

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Tuesday, August 18, 2026

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