अर-राद · 29/43
अनुवाद उच्चारण — सूरा अर-राद
الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ طُوبَىٰ لَهُمْ وَحُسْنُ مَآبٍ ۝٢٩
Allazeena aamanoo w a`amilus saalihaati toobaa lahum wa husnu ma aab
📖 हिंदी अर्थ
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उनके वास्ते (बेहश्त में) तूबा (दरख्त) और ख़ुशहाली और अच्छा अन्जाम है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • طُوبَىٰ: खुशी, आनंद, अच्छी ज़िंदगी, या वह पेड़ जो जन्नत में होगा। कुछ मुफ़स्सिरीन ने इसे "खुशहाली और आराम" से ताबीर किया है।
  • مَآب: लौटने की जगह, अंतिम ठिकाना, पनाहगाह।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों के बारे में है जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) पर ईमान लाया और अपने ईमान को सिर्फ ज़ुबानी नहीं रखा, बल्कि उसे अच्छे कर्मों — नमाज़, रोज़ा, ज़कात, सच्चाई, नेकी, और लोगों की भलाई — के साथ जोड़ा। ऐसे लोगों के लिए अल्लाह ने "طُوبَىٰ" का वादा किया है, जिसका मतलब है हर तरह की खुशी, दिल की तसल्ली, और ऐसी ज़िंदगी जिसमें कोई ग़म और परेशानी न हो। यह खुशी दुनिया में भी उन्हें मिलती है — क्योंकि ईमान और नेकी से दिल को सुकून मिलता है — और आख़िरत में भी उनका अंजाम बेहतरीन होगा।

"وَحُسْنُ مَآبٍ" का मतलब है कि उनका आख़िरी ठिकाना जन्नत होगी, जो हर तरह की नेमतों, रहमत और अल्लाह की रज़ा से भरा हुआ है। यानी उनका सफ़र दुनिया से आख़िरत तक खुशी और कामयाबी पर ख़त्म होगा। यह उन लोगों के लिए एक बड़ी ख़ुशख़बरी है जो अल्लाह पर भरोसा रखते हैं और अच्छे काम करते हैं।

फ़ायदे (सबक):

  1. ईमान और अच्छे कर्मों का जोड़ ही असली कामयाबी की कुंजी है। सिर्फ ईमान का दावा काफी नहीं, बल्कि उसे अमल से साबित करना ज़रूरी है।
  2. अल्लाह अपने नेक बंदों को दुनिया में भी दिल का सुकून और खुशी देता है, भले ही उनके पास माल कम हो — क्योंकि असली खुशी दिल की सफाई और अल्लाह की रज़ा में है।
  3. यह आयत मोमिनों को उम्मीद देती है कि उनकी मेहनत और नेकियाँ बेकार नहीं जाएँगी; आख़िरत में उनका इंतज़ार बेहतरीन जगह कर रही है।
  4. इससे पता चलता है कि इस्लाम में दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई का ख़याल रखा गया है — नेकी से दुनिया भी अच्छी बनती है और आख़िरत भी।
  5. "طُوبَىٰ" का ज़िक्र बताता है कि अल्लाह की रहमत इतनी वसीह है कि वह अपने बंदों को सिर्फ जन्नत ही नहीं, बल्कि उससे पहले ही खुशी और आनंद की ज़िंदगी का वादा करता है — यह उसके प्यार और करम की निशानी है।


📜 आयत 27-31 — सूरा अर-राद

27وَيَقُولُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْلَا أُنزِلَ عَلَيْهِ آيَةٌ مِّن رَّبِّهِ ۗ قُلْ إِنَّ اللَّهَ يُضِلُّ مَن يَشَاءُ وَيَهْدِي إِلَيْهِ مَنْ أَنَابَ
और जिन लोगों ने कुफ्र एख़तियार किया वह कहते हैं कि उस (शख्स यानि तुम) पर हमारी ख्वाहिश के मुवाफिक़ कोई मौजिज़ा उसके परवरदिगार की तरफ से क्यों नहीं नाज़िल होता तुम उनसे कह दो कि इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा जिसे चाहता है गुमराही में छोड़ देता है
28الَّذِينَ آمَنُوا وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُم بِذِكْرِ اللَّهِ ۗ أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ
और जिसने उसकी तरफ रुज़ू की उसे अपनी तरफ पहुँचने की राह दिखाता है (ये) वह लोग हैं जिन्होंने ईमान कुबूल किया और उनके दिलों को ख़ुदा की चाह से तसल्ली हुआ करती है
29الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ طُوبَىٰ لَهُمْ وَحُسْنُ مَآبٍ
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उनके वास्ते (बेहश्त में) तूबा (दरख्त) और ख़ुशहाली और अच्छा अन्जाम है
30كَذَٰلِكَ أَرْسَلْنَاكَ فِي أُمَّةٍ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهَا أُمَمٌ لِّتَتْلُوَ عَلَيْهِمُ الَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ وَهُمْ يَكْفُرُونَ بِالرَّحْمَٰنِ ۚ قُلْ هُوَ رَبِّي لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ مَتَابِ
(ऐ रसूल जिस तरह हमने और पैग़म्बर भेजे थे) उसी तरह हमने तुमको उस उम्मत में भेजा है जिससे पहले और भी बहुत सी उम्मते गुज़र चुकी हैं -ताकि तुम उनके सामने जो क़ुरान हमने वही के ज़रिए से तुम्हारे पास भेजा है उन्हें पढ़ कर सुना दो और ये लोग (कुछ तुम्हारे ही नहीं बल्कि सिरे से) ख़ुदा ही के मुन्किर हैं तुम कह दो कि वही मेरा परवरदिगार है उसके सिवा कोई माबूद नहीं मै उसी पर भरोसा रखता हूँ और उसी तरफ रुज़ू करता हूँ
31وَلَوْ أَنَّ قُرْآنًا سُيِّرَتْ بِهِ الْجِبَالُ أَوْ قُطِّعَتْ بِهِ الْأَرْضُ أَوْ كُلِّمَ بِهِ الْمَوْتَىٰ ۗ بَل لِّلَّهِ الْأَمْرُ جَمِيعًا ۗ أَفَلَمْ يَيْأَسِ الَّذِينَ آمَنُوا أَن لَّوْ يَشَاءُ اللَّهُ لَهَدَى النَّاسَ جَمِيعًا ۗ وَلَا يَزَالُ الَّذِينَ كَفَرُوا تُصِيبُهُم بِمَا صَنَعُوا قَارِعَةٌ أَوْ تَحُلُّ قَرِيبًا مِّن دَارِهِمْ حَتَّىٰ يَأْتِيَ وَعْدُ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُخْلِفُ الْمِيعَادَ
और अगर कोई ऐसा क़ुरान (भी नाज़िल होता) जिसकी बरकत से पहाड़ (अपनी जगह) चल खड़े होते या उसकी वजह से ज़मीन (की मुसाफ़त (दूरी)) तय की जाती और उसकी बरकत से मुर्दे बोल उठते (तो भी ये लोग मानने वाले न थे) बल्कि सच यूँ है कि सब काम का एख्तेयार ख़ुदा ही को है तो क्या अभी तक ईमानदारों को चैन नहीं आया कि अगर ख़ुदा चाहता तो सब लोगों की हिदायत कर देता और जिन लोगों ने कुफ्र एख्तेयार किया उन पर उनकी करतूत की सज़ा में कोई (न कोई) मुसीबत पड़ती ही रहेगी या (उन पर पड़ी) तो उनके घरों के आस पास (ग़रज़) नाज़िल होगी (ज़रुर) यहाँ तक कि ख़ुदा का वायदा (फतेह मक्का) पूरा हो कर रहे और इसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा हरगिज़ ख़िलाफ़े वायदा नहीं करता
अर-रादकुरान सूची
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29आयत

अनुवाद — अर-राद 29

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Thursday, October 1, 2026

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