अर-राद · 37/43
अनुवाद उच्चारण — अर-राद
وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَاهُ حُكْمًا عَرَبِيًّا ۚ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُم بَعْدَمَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ مَا لَكَ مِنَ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا وَاقٍ ۝٣٧
Wa kazaalika anzalnaahu hukman `Arabiyyaa; wa la`init taba`ta ahwaaa `ahum ba`da maa jaaa`aka minal `ilmi maa laka minal laahi minw waliyinw wa laa waaq
📖 हिंदी अर्थ
और यूँ हमने उस क़ुरान को अरबी (ज़बान) का फरमान नाज़िल फरमाया और (ऐ रसूल) अगर कहीं तुमने इसके बाद को तुम्हारे पास इल्म (क़ुरान) आ चुका उन की नफसियानी ख्वाहिशों की पैरवी कर ली तो (याद रखो कि) फिर ख़ुदा की तरफ से न कोई तुम्हारा सरपरस्त होगा न कोई बचाने वाला
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حُكْمًا عَرَبِيًّا: अर्थात ऐसा निर्णायक कानून जो अरबी भाषा में उतारा गया हो।
  • أَهْوَاءَهُم: उनकी मनमानी इच्छाएँ और इच्छाएँ।
  • وَلِيٌّ: सहायक, मददगार।
  • وَاقٍ: रक्षक, बचाने वाला।

तफसीर (व्याख्या):

जिस प्रकार हमने पहले के नबियों पर उनकी अपनी क़ौम की भाषा में किताबें उतारीं, उसी प्रकार हमने आप (ऐ नबी) पर यह कुरआन उतारा है — जो एक निर्णायक और स्पष्ट कानून है, अरबी भाषा में, ताकि आप इसके द्वारा लोगों के बीच न्याय करें और उन्हें सत्य का मार्ग दिखाएँ। यह कुरआन अपने में पूर्ण सत्य और स्पष्ट मार्गदर्शन रखता है, और इसमें कोई कमी या भ्रम नहीं है।

फिर अल्लाह तआला आपको चेतावनी देते हुए कहता है: ऐ नबी! यदि आप उन लोगों (मुशरिकों और अहले-किताब) की मनमानी इच्छाओं का अनुसरण करते हैं — चाहे वह आपसे किब्ला बदलने, या किसी अन्य आदेश में हेर-फेर करने की माँग करें — उस सत्य और ज्ञान के बाद जो आपके पास आ चुका है, तो जान लीजिए कि अल्लाह की ओर से आपके लिए न कोई सहायक होगा जो आपकी मदद करे, और न कोई रक्षक जो आपको अल्लाह की यातना से बचा सके। यह बात आपको इस बात की ओर संकेत करती है कि सत्य पर स्थिर रहना ही एकमात्र रास्ता है, और किसी भी प्रकार का समझौता धर्म के मामले में विनाश का कारण बन सकता है।

यह आयत नबी ﷺ को संबोधित करते हुए भी उनके अनुयायियों को सिखाती है कि धर्म के मामले में किसी की इच्छाओं का अनुसरण नहीं करना चाहिए, चाहे वह कितना ही बड़ा या प्रभावशाली क्यों न हो।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. कुरआन की सर्वोच्चता: यह आयत सिखाती है कि कुरआन एक पूर्ण और निर्णायक कानून है, जो अरबी भाषा में उतारा गया ताकि लोग इसे आसानी से समझ सकें और इस पर अमल कर सकें। यह हमारे लिए सबसे बड़ी नेमत है।
  2. सत्य पर स्थिरता: हमें सत्य और सही मार्ग पर स्थिर रहना चाहिए, चाहे लोगों की इच्छाएँ कुछ भी हों। किसी की खुशी के लिए धर्म के मामले में समझौता करना बड़ी भूल है।
  3. अल्लाह पर भरोसा: जब हम सत्य पर चलते हैं, तो अल्लाह हमारा सहायक और रक्षक होता है। लेकिन यदि हम उसके आदेशों से विमुख हो जाएँ, तो कोई हमें उसकी पकड़ से नहीं बचा सकता।
  4. धर्म की रक्षा: यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम के मूल सिद्धांतों की रक्षा करना हर मुसलमान का कर्तव्य है, और किसी भी परिस्थिति में हमें अपने धर्म के सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए।
  5. नबी ﷺ का आदर्श: यह आयत हमें नबी ﷺ की स्थिति का एहसास कराती है कि उन्होंने कितनी कठिन परिस्थितियों में सत्य का साथ दिया, और हमें उनके इस आदर्श का अनुसरण करना चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 35-39 — अर-राद

35۞ مَّثَلُ الْجَنَّةِ الَّتِي وُعِدَ الْمُتَّقُونَ ۖ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ أُكُلُهَا دَائِمٌ وَظِلُّهَا ۚ تِلْكَ عُقْبَى الَّذِينَ اتَّقَوا ۖ وَّعُقْبَى الْكَافِرِينَ النَّارُ
जिस बाग़ (बेहश्त) का परहेज़गारों से वायदा किया गया है उसकी सिफत ये है कि उसके नीचे नहरें जारी होगी उसके मेवे सदाबहार और ऐसे ही उसकी छॉव भी ये अन्जाम है उन लोगों को जो (दुनिया में) परहेज़गार थे और काफिरों का अन्जाम (जहन्नुम की) आग है
36وَالَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَفْرَحُونَ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ ۖ وَمِنَ الْأَحْزَابِ مَن يُنكِرُ بَعْضَهُ ۚ قُلْ إِنَّمَا أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ وَلَا أُشْرِكَ بِهِ ۚ إِلَيْهِ أَدْعُو وَإِلَيْهِ مَآبِ
और (ए रसूल) जिन लोगों को हमने किताब दी है वह तो जो (एहकाम) तुम्हारे पास नाज़िल किए गए हैं सब ही से खुश होते हैं और बाज़ फिरके उसकी बातों से इन्कार करते हैं तुम (उनसे) कह दो कि (तुम मानो या न मानो) मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मै ख़ुदा ही की इबादत करु और किसी को उसका शरीक न बनाऊ मै (सब को) उसी की तरफ बुलाता हूँ और हर शख़्श को हिर फिर कर उसकी तरफ जाना है
37وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَاهُ حُكْمًا عَرَبِيًّا ۚ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُم بَعْدَمَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ مَا لَكَ مِنَ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا وَاقٍ
और यूँ हमने उस क़ुरान को अरबी (ज़बान) का फरमान नाज़िल फरमाया और (ऐ रसूल) अगर कहीं तुमने इसके बाद को तुम्हारे पास इल्म (क़ुरान) आ चुका उन की नफसियानी ख्वाहिशों की पैरवी कर ली तो (याद रखो कि) फिर ख़ुदा की तरफ से न कोई तुम्हारा सरपरस्त होगा न कोई बचाने वाला
38وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلًا مِّن قَبْلِكَ وَجَعَلْنَا لَهُمْ أَزْوَاجًا وَذُرِّيَّةً ۚ وَمَا كَانَ لِرَسُولٍ أَن يَأْتِيَ بِآيَةٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۗ لِكُلِّ أَجَلٍ كِتَابٌ
और हमने तुमसे पहले और (भी) बहुतेरे पैग़म्बर भेजे और हमने उनको बीवियाँ भी दी और औलाद (भी अता की) और किसी पैग़म्बर की ये मजाल न थी कि कोई मौजिज़ा ख़ुदा की इजाज़त के बगैर ला दिखाए हर एक वक्त (मौऊद) के लिए (हमारे यहाँ) एक (क़िस्म की) तहरीर (होती) है
39يَمْحُو اللَّهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ ۖ وَعِندَهُ أُمُّ الْكِتَابِ
फिर इसमें से ख़ुदा जिसको चाहता है मिटा देता है और (जिसको चाहता है बाक़ी रखता है और उसके पास असल किताब (लौहे महफूज़) मौजूद है
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अनुवाद — अर-राद 37

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Tuesday, August 18, 2026

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