अर-राद · 38/43
अनुवाद उच्चारण — सूरा अर-राद
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلًا مِّن قَبْلِكَ وَجَعَلْنَا لَهُمْ أَزْوَاجًا وَذُرِّيَّةً ۚ وَمَا كَانَ لِرَسُولٍ أَن يَأْتِيَ بِآيَةٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۗ لِكُلِّ أَجَلٍ كِتَابٌ ۝٣٨
Wa laqad arsalnaa Rusulam min qablika wa ja`alnaa lahum azwaajanw wa zurriyyah; wa maa kaana lirasoolin ai yaatiya bi aayatin illaa bi iznil laah; likulli ajalin kitaab
📖 हिंदी अर्थ
और हमने तुमसे पहले और (भी) बहुतेरे पैग़म्बर भेजे और हमने उनको बीवियाँ भी दी और औलाद (भी अता की) और किसी पैग़म्बर की ये मजाल न थी कि कोई मौजिज़ा ख़ुदा की इजाज़त के बगैर ला दिखाए हर एक वक्त (मौऊद) के लिए (हमारे यहाँ) एक (क़िस्म की) तहरीर (होती) है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَزْوَاجًا: पत्नियाँ।
  • ذُرِّيَّةً: संतान, बच्चे।
  • آيَةٍ: चमत्कार, निशानी।
  • أَجَلٍ: नियत समय, अवधि।
  • كِتَابٌ: लिखित आदेश, तय किया हुआ फैसला।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ नबी! जब मक्का के मुशरिकीन और यहूद आपकी शादियों पर आपत्ति जताते थे और कहते थे कि आप एक आम इंसान की तरह शादी क्यों करते हैं, और साथ ही वे आपसे ऐसे चमत्कारों की माँग करते थे जो उन्होंने अपनी जिद से तय किए थे, तो अल्लाह ने यह आयत उतारी।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने आपसे पहले भी कई रसूल भेजे, और वे सभी इंसान थे। हमने उन्हें भी पत्नियाँ दीं और संतान दी। वे फ़रिश्ते नहीं थे जो शादी और बच्चों से दूर हों। यह अल्लाह की सुन्नत (रीति) रही है कि रसूल इंसान ही होते हैं, और उनका जीवन आम इंसानों जैसा होता है ताकि लोग उनसे सीख सकें और उनके साथ रह सकें। इसलिए आपका शादी करना और संतान रखना आपके नबूवत के खिलाफ नहीं, बल्कि पिछले नबियों की सुन्नत के अनुरूप है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है कि किसी भी रसूल के बस में नहीं है कि वह अपनी मर्जी से कोई चमत्कार ले आए। चमत्कार तो केवल अल्लाह के हुक्म से ही प्रकट होता है। अल्लाह जब चाहता है और जिस हिकमत से चाहता है, वह अपने रसूल के हाथ पर कोई निशानी दिखाता है। यह रसूल का काम नहीं कि वह हर माँग पर चमत्कार पेश करे।

आखिर में अल्लाह फ़रमाता है कि हर चीज़ के लिए एक नियत समय और एक लिखित फैसला है। जो कुछ भी होना है, वह अल्लाह के लिखे हुए समय पर ही होगा। न वह पहले आ सकता है और न बाद में। चमत्कार, अज़ाब, फतह, सब कुछ अल्लाह के तय किए हुए वक़्त पर ही आता है।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. नबियों की ज़िंदगी में शादी और संतान होना इस बात का सबूत है कि इस्लाम फ़ितरत (प्राकृतिक स्वभाव) का दीन है। यह न तो दुनिया से दूर भागने की तालीम देता है और न ही शादी को बुरा समझता है। नबी खुद शादी करते थे और अपनी उम्मत को भी इसकी तरग़ीब देते थे।
  2. चमत्कार अल्लाह के इख्तियार में हैं, किसी इंसान के नहीं। इसलिए हमें अपने दीन की सच्चाई पर यकीन रखना चाहिए, भले ही लोग अपनी जिद के लिए निशानियाँ माँगें। सबसे बड़ा चमत्कार तो कुरआन है जो हमेशा के लिए मौजूद है।
  3. हर चीज़ का एक वक़्त है। अल्लाह की तरफ से जो फैसला आता है, वह अपने समय पर ही आता है। इसलिए हमें सब्र करना चाहिए और अल्लाह के फैसले पर भरोसा रखना चाहिए। जल्दबाज़ी और बेचैनी इंसान को नुकसान पहुँचाती है।
  4. इस आयत में नबी ﷺ की शान में तसल्ली है कि आप अकेले नहीं हैं, बल्कि आप अल्लाह के उन्हीं रसूलों की कड़ी हैं जो इंसान थे और आम ज़िंदगी गुज़ारते थे। यह हमारे लिए भी सबक है कि दीनदारी का मतलब दुनिया छोड़ देना नहीं, बल्कि दुनिया में रहकर अल्लाह के हुक्मों पर चलना है।


📜 आयत 36-40 — सूरा अर-राद

36وَالَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَفْرَحُونَ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ ۖ وَمِنَ الْأَحْزَابِ مَن يُنكِرُ بَعْضَهُ ۚ قُلْ إِنَّمَا أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ وَلَا أُشْرِكَ بِهِ ۚ إِلَيْهِ أَدْعُو وَإِلَيْهِ مَآبِ
और (ए रसूल) जिन लोगों को हमने किताब दी है वह तो जो (एहकाम) तुम्हारे पास नाज़िल किए गए हैं सब ही से खुश होते हैं और बाज़ फिरके उसकी बातों से इन्कार करते हैं तुम (उनसे) कह दो कि (तुम मानो या न मानो) मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मै ख़ुदा ही की इबादत करु और किसी को उसका शरीक न बनाऊ मै (सब को) उसी की तरफ बुलाता हूँ और हर शख़्श को हिर फिर कर उसकी तरफ जाना है
37وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَاهُ حُكْمًا عَرَبِيًّا ۚ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُم بَعْدَمَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ مَا لَكَ مِنَ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا وَاقٍ
और यूँ हमने उस क़ुरान को अरबी (ज़बान) का फरमान नाज़िल फरमाया और (ऐ रसूल) अगर कहीं तुमने इसके बाद को तुम्हारे पास इल्म (क़ुरान) आ चुका उन की नफसियानी ख्वाहिशों की पैरवी कर ली तो (याद रखो कि) फिर ख़ुदा की तरफ से न कोई तुम्हारा सरपरस्त होगा न कोई बचाने वाला
38وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلًا مِّن قَبْلِكَ وَجَعَلْنَا لَهُمْ أَزْوَاجًا وَذُرِّيَّةً ۚ وَمَا كَانَ لِرَسُولٍ أَن يَأْتِيَ بِآيَةٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۗ لِكُلِّ أَجَلٍ كِتَابٌ
और हमने तुमसे पहले और (भी) बहुतेरे पैग़म्बर भेजे और हमने उनको बीवियाँ भी दी और औलाद (भी अता की) और किसी पैग़म्बर की ये मजाल न थी कि कोई मौजिज़ा ख़ुदा की इजाज़त के बगैर ला दिखाए हर एक वक्त (मौऊद) के लिए (हमारे यहाँ) एक (क़िस्म की) तहरीर (होती) है
39يَمْحُو اللَّهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ ۖ وَعِندَهُ أُمُّ الْكِتَابِ
फिर इसमें से ख़ुदा जिसको चाहता है मिटा देता है और (जिसको चाहता है बाक़ी रखता है और उसके पास असल किताब (लौहे महफूज़) मौजूद है
40وَإِن مَّا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ الَّذِي نَعِدُهُمْ أَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلَاغُ وَعَلَيْنَا الْحِسَابُ
और (ए रसूल) जो जो वायदे (अज़ाब वगैरह के) हम उन कुफ्फारों से करते हैं चाहे, उनमें से बाज़ तुम्हारे सामने पूरे कर दिखाएँ या तुम्हें उससे पहले उठा लें बहर हाल तुम पर तो सिर्फ एहकाम का पहुचा देना फर्ज है
अर-रादकुरान सूची
43आयत
मदनीअवतरण स्थान
38आयत

अनुवाद — अर-राद 38

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Friday, October 2, 2026

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