अल-इसरा · 109/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
وَيَخِرُّونَ لِلْأَذْقَانِ يَبْكُونَ وَيَزِيدُهُمْ خُشُوعًا ۩ ۝١٠٩
Wa yakhirroona lil azqaani yabkoona wa yazeeduhum khushoo`aa
📖 हिंदी अर्थ
और ये लोग (सजदे के लिए) मुँह के बल गिर पड़तें हैं और रोते चले जाते हैं और ये क़ुरान उन की ख़ाकसारी के बढ़ाता जाता है (109) (सजदा)
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَخِرُّونَ (गिरते हैं) – यानी सजदे में गिर जाते हैं।
  • لِلْأَذْقَانِ (ठोड़ियों के बल) – यानी अपनी ठुड्डियों (चेहरे) के बल ज़मीन पर गिरते हैं।
  • يَبْكُونَ (रोते हैं) – ख़ौफ़ और ख़ुशू (विनम्रता) से आँसू बहाते हैं।
  • خُشُوعًا (ख़ुशू) – अल्लाह के सामने पूर्ण विनम्रता, दिल का झुकना और अदब।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन सच्चे बंदों का वर्णन करती है जो जब क़ुरआन की आयतें सुनते हैं, तो उनके दिल पिघल जाते हैं और वे अल्लाह के सामने सजदे में गिर पड़ते हैं। वे अपनी ठोड़ियों (चेहरे) के बल ज़मीन पर गिरते हैं—यह उनके अत्यधिक समर्पण और अदब की निशानी है। वे रोते हैं, क्योंकि अल्लाह की आयतें उनके दिलों को छू जाती हैं, उन्हें अपनी कमज़ोरी और अल्लाह की बड़ाई का एहसास कराती हैं। यह रोना दुख का नहीं, बल्कि अल्लाह के डर, मोहब्बत और शुक्र का रोना होता है।

इन बंदों की खासियत यह है कि क़ुरआन सुनकर उनका ख़ुशू (विनम्रता) और बढ़ जाता है। हर बार जब वे क़ुरआन सुनते हैं, उनका दिल और नरम हो जाता है, उनका ईमान मज़बूत होता है और अल्लाह के सामने झुकाव और गहरा हो जाता है। यह उनके लिए अल्लाह की तरफ से एक बड़ी नेमत है कि क़ुरआन उनके दिलों को सख्त नहीं करता, बल्कि हर बार नई रोशनी और सुकून देता है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि क़ुरआन सिर्फ़ पढ़ने की चीज़ नहीं, बल्कि दिल से जुड़ने की चीज़ है। जो लोग इसे सच्चे दिल से सुनते हैं और समझते हैं, उनके दिलों में अल्लाह का डर और मोहब्बत पैदा होती है। आज हमें चाहिए कि क़ुरआन को सिर्फ़ तिलावत के लिए न रखें, बल्कि उसके मानी पर ग़ौर करें, उस पर अमल करें और उससे अपने दिलों को जगाएँ। जब दिल क़ुरआन से जुड़ेगा, तो आँखों से आँसू भी निकलेंगे और सीना भी ठंडा होगा। अल्लाह उन बंदों से मुहब्बत करता है जो उसके कलाम के सामने झुकते हैं, रोते हैं और अपने ख़ुशू को बढ़ाते हैं। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया की बेचैनियों से निकालकर सुकून की मंज़िल तक पहुँचाता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 107-111 — अल-इसरा

107قُلْ آمِنُوا بِهِ أَوْ لَا تُؤْمِنُوا ۚ إِنَّ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ مِن قَبْلِهِ إِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ يَخِرُّونَ لِلْأَذْقَانِ سُجَّدًا
और (इसी वजह से) हमने उसको रफ्ता रफ्ता नाज़िल किया तुम कह दो कि ख्वाह तुम इस पर ईमान लाओ या न लाओ इसमें शक़ नहीं कि जिन लोगों को उसके क़ब्ल ही (आसमानी किताबों का इल्म अता किया गया है उनके सामने जब ये पढ़ा जाता है तो ठुडडियों से (मुँह के बल) सजदे में गिर पड़तें हैं
108وَيَقُولُونَ سُبْحَانَ رَبِّنَا إِن كَانَ وَعْدُ رَبِّنَا لَمَفْعُولًا
और कहते हैं कि हमारा परवरदिगार (हर ऐब से) पाक व पाकीज़ा है बेशक हमारे परवरदिगार का वायदा पूरा होना ज़रुरी था
109وَيَخِرُّونَ لِلْأَذْقَانِ يَبْكُونَ وَيَزِيدُهُمْ خُشُوعًا ۩
और ये लोग (सजदे के लिए) मुँह के बल गिर पड़तें हैं और रोते चले जाते हैं और ये क़ुरान उन की ख़ाकसारी के बढ़ाता जाता है (109) (सजदा)
110قُلِ ادْعُوا اللَّهَ أَوِ ادْعُوا الرَّحْمَٰنَ ۖ أَيًّا مَّا تَدْعُوا فَلَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ ۚ وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا وَابْتَغِ بَيْنَ ذَٰلِكَ سَبِيلًا
(ऐ रसूल) तुम (उनसे) कह दो कि (तुम को एख़तियार है) ख्वाह उसे अल्लाह (कहकर) पुकारो या रहमान कह कर पुकारो (ग़रज़) जिस नाम को भी पुकारो उसके तो सब नाम अच्छे (से अच्छे) हैं और (ऐ रसूल) न तो अपनी नमाज़ बहुत चिल्ला कर पढ़ो न और न बिल्कुल चुपके से बल्कि उसके दरमियान एक औसत तरीका एख्तेयार कर लो
111وَقُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي لَمْ يَتَّخِذْ وَلَدًا وَلَمْ يَكُن لَّهُ شَرِيكٌ فِي الْمُلْكِ وَلَمْ يَكُن لَّهُ وَلِيٌّ مِّنَ الذُّلِّ ۖ وَكَبِّرْهُ تَكْبِيرًا
और कहो कि हर तरह की तारीफ उसी ख़ुदा को (सज़ावार) है जो न तो कोई औलाद रखता है और न (सारे जहाँन की) सल्तनत में उसका कोई साझेदार है और न उसे किसी तरह की कमज़ोरी है न कोई उसका सरपरस्त हो और उसकी बड़ाई अच्छी तरह करते रहा करो
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अनुवाद — अल-इसरा 109

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Tuesday, August 18, 2026

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