अल-इसरा · 110/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इसरा
قُلِ ادْعُوا اللَّهَ أَوِ ادْعُوا الرَّحْمَٰنَ ۖ أَيًّا مَّا تَدْعُوا فَلَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ ۚ وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا وَابْتَغِ بَيْنَ ذَٰلِكَ سَبِيلًا ۝١١٠
Qulid`ul laaha awid`ur Rahmaana ayyam maa tad`oo falahul asmaaa`ul Husnaa; wa laa tajhar bi Salaatika wa laa tukhaafit bihaa wabtaghi baina zaalika sabeela
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम (उनसे) कह दो कि (तुम को एख़तियार है) ख्वाह उसे अल्लाह (कहकर) पुकारो या रहमान कह कर पुकारो (ग़रज़) जिस नाम को भी पुकारो उसके तो सब नाम अच्छे (से अच्छे) हैं और (ऐ रसूल) न तो अपनी नमाज़ बहुत चिल्ला कर पढ़ो न और न बिल्कुल चुपके से बल्कि उसके दरमियान एक औसत तरीका एख्तेयार कर लो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ادْعُوا: पुकारो, प्रार्थना करो।
  • الرَّحْمَٰن: अल्लाह का एक विशेष नाम, जो असीम दया और कृपा को दर्शाता है।
  • أَيًّا مَّا تَدْعُوا: तुम जिस नाम से भी पुकारो।
  • الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ: सबसे सुंदर नाम।
  • لَا تَجْهَرْ: ज़ोर से न पढ़ो (नमाज़ में)।
  • تُخَافِتْ: बहुत धीमे (आवाज़ में) न पढ़ो।
  • ابْتَغِ: तलाश करो, अपनाओ।
  • سَبِيلًا: रास्ता, मार्ग।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे नबी! आप उन लोगों से कह दीजिए जो आपकी प्रार्थना के तरीके पर एतराज़ करते हैं कि तुम अल्लाह के नाम से पुकारो या रहमान के नाम से — दोनों में कोई फर्क नहीं है। क्योंकि ये दोनों उसी एक अल्लाह के नाम हैं, और उसी के लिए हैं सबसे सुंदर नाम। वह एक ही है, उसका कोई साझी नहीं। तुम जिस भी नाम से उसे पुकारोगे, वह सुनता है और जवाब देता है। यह एतराज़ मक्का के मुशरिकों की ओर से था, जब उन्होंने सुना कि नबी ﷺ "या अल्लाह" और "या रहमान" दोनों नामों से दुआ करते हैं, तो उन्होंने समझा कि शायद ये दो अलग-अलग इबादतें हैं। अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि ये दोनों नाम एक ही सत्ता के हैं।

फिर अल्लाह तआला ने नबी ﷺ को नमाज़ में क़िरात (पढ़ने) के बारे में निर्देश दिया: "अपनी नमाज़ में इतनी ऊँची आवाज़ से क़िरात न करो कि मुशरिक सुन लें और तुम्हें या क़ुरआन को गालियाँ दें, और न ही इतनी धीमी आवाज़ में पढ़ो कि तुम्हारे साथ नमाज़ पढ़ने वाले साथी भी न सुन सकें। बल्कि इन दोनों के बीच एक मध्यम रास्ता अपनाओ — इतनी आवाज़ में पढ़ो कि मुसलमान सुन सकें, लेकिन दुश्मनों को सुनाई न दे।"

यह निर्देश केवल नबी ﷺ के लिए नहीं था, बल्कि हर मुसलमान के लिए है कि वह अपनी इबादत में संतुलन बनाए रखे। इसी तरह, जीवन के हर पहलू में — चाहे खर्च हो, बातचीत हो, या इबादत — हमें अति से बचना चाहिए और बीच का रास्ता अपनाना चाहिए।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के नामों में कोई भेदभाव नहीं है — हर नाम उसी की महिमा को दर्शाता है। हम जब भी दुआ करें, तो पूरे विश्वास के साथ करें कि अल्लाह सुन रहा है, चाहे हम उसे किसी भी नाम से पुकारें। यह हमारे लिए कितनी बड़ी रहमत है कि हमारा रब इतना करीब है कि हर नाम पर वह जवाब देता है।

साथ ही, यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम हमेशा संतुलन की तालीम देता है — न अति, न कमी। हमारी इबादत भी ऐसी हो जो दूसरों के लिए रहमत बने, न कि फितना का ज़रिया। यही इस्लाम की खूबसूरती है कि वह हर काम में बीच का रास्ता अपनाने की तरबियत देता है, ताकि हमारी ज़िंदगी हर पहलू में खूबसूरत और संतुलित हो।



📜 आयत 108-111 — सूरा अल-इसरा

108وَيَقُولُونَ سُبْحَانَ رَبِّنَا إِن كَانَ وَعْدُ رَبِّنَا لَمَفْعُولًا
और कहते हैं कि हमारा परवरदिगार (हर ऐब से) पाक व पाकीज़ा है बेशक हमारे परवरदिगार का वायदा पूरा होना ज़रुरी था
109وَيَخِرُّونَ لِلْأَذْقَانِ يَبْكُونَ وَيَزِيدُهُمْ خُشُوعًا ۩
और ये लोग (सजदे के लिए) मुँह के बल गिर पड़तें हैं और रोते चले जाते हैं और ये क़ुरान उन की ख़ाकसारी के बढ़ाता जाता है (109) (सजदा)
110قُلِ ادْعُوا اللَّهَ أَوِ ادْعُوا الرَّحْمَٰنَ ۖ أَيًّا مَّا تَدْعُوا فَلَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ ۚ وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا وَابْتَغِ بَيْنَ ذَٰلِكَ سَبِيلًا
(ऐ रसूल) तुम (उनसे) कह दो कि (तुम को एख़तियार है) ख्वाह उसे अल्लाह (कहकर) पुकारो या रहमान कह कर पुकारो (ग़रज़) जिस नाम को भी पुकारो उसके तो सब नाम अच्छे (से अच्छे) हैं और (ऐ रसूल) न तो अपनी नमाज़ बहुत चिल्ला कर पढ़ो न और न बिल्कुल चुपके से बल्कि उसके दरमियान एक औसत तरीका एख्तेयार कर लो
111وَقُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي لَمْ يَتَّخِذْ وَلَدًا وَلَمْ يَكُن لَّهُ شَرِيكٌ فِي الْمُلْكِ وَلَمْ يَكُن لَّهُ وَلِيٌّ مِّنَ الذُّلِّ ۖ وَكَبِّرْهُ تَكْبِيرًا
और कहो कि हर तरह की तारीफ उसी ख़ुदा को (सज़ावार) है जो न तो कोई औलाद रखता है और न (सारे जहाँन की) सल्तनत में उसका कोई साझेदार है और न उसे किसी तरह की कमज़ोरी है न कोई उसका सरपरस्त हो और उसकी बड़ाई अच्छी तरह करते रहा करो
अल-इसराकुरान सूची
111आयत
मक्कीअवतरण स्थान
110आयत

अनुवाद — अल-इसरा 110

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Friday, October 2, 2026

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