Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- ادْعُوا: पुकारो, प्रार्थना करो।
- الرَّحْمَٰن: अल्लाह का एक विशेष नाम, जो असीम दया और कृपा को दर्शाता है।
- أَيًّا مَّا تَدْعُوا: तुम जिस नाम से भी पुकारो।
- الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ: सबसे सुंदर नाम।
- لَا تَجْهَرْ: ज़ोर से न पढ़ो (नमाज़ में)।
- تُخَافِتْ: बहुत धीमे (आवाज़ में) न पढ़ो।
- ابْتَغِ: तलाश करो, अपनाओ।
- سَبِيلًا: रास्ता, मार्ग।
तफ़सीर (व्याख्या):
हे नबी! आप उन लोगों से कह दीजिए जो आपकी प्रार्थना के तरीके पर एतराज़ करते हैं कि तुम अल्लाह के नाम से पुकारो या रहमान के नाम से — दोनों में कोई फर्क नहीं है। क्योंकि ये दोनों उसी एक अल्लाह के नाम हैं, और उसी के लिए हैं सबसे सुंदर नाम। वह एक ही है, उसका कोई साझी नहीं। तुम जिस भी नाम से उसे पुकारोगे, वह सुनता है और जवाब देता है। यह एतराज़ मक्का के मुशरिकों की ओर से था, जब उन्होंने सुना कि नबी ﷺ "या अल्लाह" और "या रहमान" दोनों नामों से दुआ करते हैं, तो उन्होंने समझा कि शायद ये दो अलग-अलग इबादतें हैं। अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि ये दोनों नाम एक ही सत्ता के हैं।
फिर अल्लाह तआला ने नबी ﷺ को नमाज़ में क़िरात (पढ़ने) के बारे में निर्देश दिया: "अपनी नमाज़ में इतनी ऊँची आवाज़ से क़िरात न करो कि मुशरिक सुन लें और तुम्हें या क़ुरआन को गालियाँ दें, और न ही इतनी धीमी आवाज़ में पढ़ो कि तुम्हारे साथ नमाज़ पढ़ने वाले साथी भी न सुन सकें। बल्कि इन दोनों के बीच एक मध्यम रास्ता अपनाओ — इतनी आवाज़ में पढ़ो कि मुसलमान सुन सकें, लेकिन दुश्मनों को सुनाई न दे।"
यह निर्देश केवल नबी ﷺ के लिए नहीं था, बल्कि हर मुसलमान के लिए है कि वह अपनी इबादत में संतुलन बनाए रखे। इसी तरह, जीवन के हर पहलू में — चाहे खर्च हो, बातचीत हो, या इबादत — हमें अति से बचना चाहिए और बीच का रास्ता अपनाना चाहिए।
दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के नामों में कोई भेदभाव नहीं है — हर नाम उसी की महिमा को दर्शाता है। हम जब भी दुआ करें, तो पूरे विश्वास के साथ करें कि अल्लाह सुन रहा है, चाहे हम उसे किसी भी नाम से पुकारें। यह हमारे लिए कितनी बड़ी रहमत है कि हमारा रब इतना करीब है कि हर नाम पर वह जवाब देता है।
साथ ही, यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम हमेशा संतुलन की तालीम देता है — न अति, न कमी। हमारी इबादत भी ऐसी हो जो दूसरों के लिए रहमत बने, न कि फितना का ज़रिया। यही इस्लाम की खूबसूरती है कि वह हर काम में बीच का रास्ता अपनाने की तरबियत देता है, ताकि हमारी ज़िंदगी हर पहलू में खूबसूरत और संतुलित हो।
📜 आयत 108-111 — सूरा अल-इसरा
अनुवाद — अल-इसरा 110
सूरा अल-इसरा आयत 110 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) तुम (उनसे) कह दो कि (तुम को एख़तियार…सूरा आयत 110/111 — सूरा अल-इसरा الإسراء (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-इसरा सुनें, सूरा अल-इसरा अनुवाद, सूरा अल-इसरा mp3, सूरा अल-इसरा pdf. आयत 108–111. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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