अल-कहफ · 40/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
فَعَسَىٰ رَبِّي أَن يُؤْتِيَنِ خَيْرًا مِّن جَنَّتِكَ وَيُرْسِلَ عَلَيْهَا حُسْبَانًا مِّنَ السَّمَاءِ فَتُصْبِحَ صَعِيدًا زَلَقًا ۝٤٠
Fa`asaa Rabeee any yu`tiyani khairam min jannatika wa yursila `alaihaa husbaanam minas samaaa`i fatusbiha sa`eedan zalaqaa
📖 हिंदी अर्थ
तो अनक़ीरब ही मेरा परवरदिगार मुझे वह बाग़ अता फरमाएगा जो तेरे बाग़ से कहीं बेहतर होगा और तेरे बाग़ पर कोई ऐसी आफत आसमान से नाज़िल करे कि (ख़ाक सियाह) होकर चटियल चिकना सफ़ाचट मैदान हो जाए
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حُسْبَانًا: आसमान से आने वाला अज़ाब (आपदा), जैसे आग, पत्थर या बिजली।
  • صَعِيدًا زَلَقًا: चिकनी और फिसलन भरी ज़मीन, जिस पर कोई चीज़ उग न सके और पैर न जम सके।

तफ़सीर:

यह वह मौक़ा है जब एक ईमानदार और नेक इंसान अपने उस दोस्त से बात कर रहा था जो दुनियावी माल-दौलत और औलाद पर इतरा रहा था। उसने अपने बाग़ पर नाज़ करते हुए कहा था कि यह मेरी कमाई है और मैं इसे हमेशा के लिए अपना मानता हूँ। इस पर उस नेक इंसान ने उसे नसीहत की और कहा: "जब तू अपने बाग़ में दाखिल हुआ और उसे खूबसूरत देखा, तो तुझे अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए था और कहना चाहिए था: 'माशा अल्लाह! यह सब अल्लाह की मर्ज़ी से है, और मेरी कोई ताक़त नहीं बग़ैर अल्लाह की मदद के।' लेकिन तूने अपनी क़ुदरत और कमाई पर भरोसा किया और अल्लाह को भूल गया।"

फिर उस नेक इंसान ने उसे ख़ुदा की क़ुदरत की याद दिलाते हुए कहा: "अगर तू मुझे अपने माल और औलाद में कम समझता है, तो यह कोई बड़ी बात नहीं। मुझे उम्मीद है कि मेरा रब मुझे तेरे इस बाग़ से बेहतर इनाम देगा—चाहे दुनिया में या आख़िरत में। और जहाँ तक तेरे इस बाग़ का सवाल है, तो अल्लाह चाहे तो उस पर आसमान से ऐसा अज़ाब भेज दे (जैसे बिजली, आग या पत्थर) कि वह एक चिकनी और फिसलन भरी ज़मीन बन जाए, जहाँ न कोई पौधा उगे और न पैर टिक सके। या फिर उसका पानी ज़मीन में धँस जाए और तू उसे कभी निकाल न सके।"

यह बात उस नेक इंसान ने महज़ डराने के लिए नहीं कही, बल्कि उसे यक़ीन था कि अल्लाह की क़ुदरत हर चीज़ पर हावी है। वह चाहता था कि उसका दोस्त दुनिया के झूठे भरोसे से निकलकर अल्लाह की तरफ़ रुजू करे और समझे कि असली मालिक सिर्फ़ अल्लाह है। यह सबक़ हमारे लिए भी है कि हम अपनी कमाई, हैसियत और औलाद पर नाज़ न करें, बल्कि हर नेमत को अल्लाह की तरफ़ से समझें और उसका शुक्र अदा करें। अल्लाह जब चाहता है, किसी को ऊँचा उठाता है और जब चाहता है, गिरा देता है। इसलिए हमें हमेशा उसकी रहमत की उम्मीद रखनी चाहिए और उसके अज़ाब से डरना चाहिए। याद रखिए, दुनिया की चमक-दमक कभी क़ायम नहीं रहती, लेकिन अल्लाह का इनाम हमेशा रहने वाला है।

🎧 सुनें

📜 आयत 38-42 — अल-कहफ

38لَّٰكِنَّا هُوَ اللَّهُ رَبِّي وَلَا أُشْرِكُ بِرَبِّي أَحَدًا
हम तो (कहते हैं कि) वही ख़ुदा मेरा परवरदिगार है और मै तो अपने परवरदिगार का किसी को शरीक नहीं बनाता
39وَلَوْلَا إِذْ دَخَلْتَ جَنَّتَكَ قُلْتَ مَا شَاءَ اللَّهُ لَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ ۚ إِن تَرَنِ أَنَا أَقَلَّ مِنكَ مَالًا وَوَلَدًا
और जब तू अपने बाग़ में आया तो (ये) क्यों न कहा कि ये सब (माशा अल्लाह ख़ुदा ही के चाहने से हुआ है (मेरा कुछ भी नहीं क्योंकि) बग़ैर ख़ुदा की (मदद) के (किसी में) कुछ सकत नहीं अगर माल और औलाद की राह से तू मुझे कम समझता है
40فَعَسَىٰ رَبِّي أَن يُؤْتِيَنِ خَيْرًا مِّن جَنَّتِكَ وَيُرْسِلَ عَلَيْهَا حُسْبَانًا مِّنَ السَّمَاءِ فَتُصْبِحَ صَعِيدًا زَلَقًا
तो अनक़ीरब ही मेरा परवरदिगार मुझे वह बाग़ अता फरमाएगा जो तेरे बाग़ से कहीं बेहतर होगा और तेरे बाग़ पर कोई ऐसी आफत आसमान से नाज़िल करे कि (ख़ाक सियाह) होकर चटियल चिकना सफ़ाचट मैदान हो जाए
41أَوْ يُصْبِحَ مَاؤُهَا غَوْرًا فَلَن تَسْتَطِيعَ لَهُ طَلَبًا
उसका पानी नीचे उतर (के खुश्क) हो जाए फिर तो उसको किसी तरह तलब न कर सके
42وَأُحِيطَ بِثَمَرِهِ فَأَصْبَحَ يُقَلِّبُ كَفَّيْهِ عَلَىٰ مَا أَنفَقَ فِيهَا وَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا وَيَقُولُ يَا لَيْتَنِي لَمْ أُشْرِكْ بِرَبِّي أَحَدًا
(चुनान्चे अज़ाब नाज़िल हुआ) और उसके (बाग़ के) फल (आफत में) घेर लिए गए तो उस माल पर जो बाग़ की तैयारी में सर्फ (ख़र्च) किया था (अफसोस से) हाथ मलने लगा और बाग़ की ये हालत थी कि अपनी टहनियों पर औंधा गिरा हुआ पड़ा था तो कहने लगा काश मै अपने परवरदिगार का किसी को शरीक न बनाता
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अनुवाद — अल-कहफ 40

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Tuesday, August 18, 2026

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