Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- फ़ित्ना: यहाँ इसका अर्थ शिर्क (बहुदेववाद) और कुफ़्र (अधर्म) तथा अल्लाह के मार्ग से रोकना है।
- दीन: अर्थात आज्ञाकारिता, इबादत और बन्दगी।
- उद्वान: अत्याचार, हद से आगे बढ़ना, या बदला लेने की कार्यवाही।
- ज़ालिमीन: वे लोग जो कुफ़्र और फ़ित्ना पर क़ायम रहें और अल्लाह के मार्ग से रोकते रहें।
तफ़सीर (व्याख्या):
हे ईमानवालो! तुम मुशरिकों और अत्याचारियों से युद्ध जारी रखो, जब तक कि फ़ित्ना (शिर्क और अल्लाह के मार्ग से रोकने की कोशिश) समाप्त न हो जाए और पूरी इबादत और बन्दगी केवल अल्लाह ही के लिए न हो जाए। अर्थात यह हालत पैदा हो जाए कि लोग केवल अल्लाह की इबादत करें, उसके साथ किसी को साझी न बनाएँ, और धर्म पूर्ण रूप से अल्लाह का हो जाए।
फिर यदि वे शिर्क और कुफ़्र से तौबा करके इस्लाम में दाखिल हो जाएँ और तुम्हें धर्म के मामले में तंग न करें, तो तुम भी उनसे युद्ध करना बंद कर दो। क्योंकि अत्याचार और हद से बढ़ने की सज़ा केवल उन्हीं अत्याचारियों को दी जाती है जो कुफ़्र और फ़ित्ना पर डटे रहें और अल्लाह के मार्ग से रोकते रहें। जो लोग बाज़ आ जाएँ, उन पर कोई कार्यवाही नहीं होगी। यहाँ "उद्वान" (अत्याचार) का शब्द उन पर लागू किया गया है जो सज़ा के हक़दार हैं, क्योंकि बदला लेने की कार्यवाही को भी उसी शब्द से पुकारा गया है, हालाँकि वह वास्तव में अत्याचार नहीं है, बल्कि न्याय है।
फ़ायदे (सीख):
- इस आयत से पता चलता है कि इस्लाम में युद्ध का उद्देश्य केवल अल्लाह का कलाम (वचन) बुलंद करना और फ़ित्ना (शिर्क व अत्याचार) को मिटाना है, न कि दुनिया का माल हासिल करना या लोगों को अपना ग़ुलाम बनाना।
- इस्लाम एक ऐसा दीन है जो शांति और सह-अस्तित्व को बढ़ावा देता है। जैसे ही दुश्मन हिंसा और शिर्क से बाज़ आएँ, मुसलमानों को भी युद्ध रोक देना चाहिए। यह इस्लाम की रहमत और इंसाफ़ की तस्वीर है।
- यह आयत बताती है कि अल्लाह के यहाँ बदला केवल अत्याचारियों से लिया जाता है, और जो लोग सुधर जाएँ उनके साथ नरमी और क्षमा का बर्ताव किया जाता है। यह न्याय और दया का बेहतरीन संतुलन है।
- मुसलमानों को यह सिखाया गया है कि वे कभी भी हद से आगे न बढ़ें और न ही किसी पर ज़ुल्म करें, चाहे दुश्मन ही क्यों न हो। यही इस्लाम की उच्च नैतिक शिक्षा है।
📜 आयत 191-195 — सूरा अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 193
सूरा अल-बकरा आयत 193 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और उन से लड़े जाओ यहाँ तक कि फ़साद बाक़ी…सूरा आयत 193/286 — सूरा अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-बकरा सुनें, सूरा अल-बकरा अनुवाद, सूरा अल-बकरा mp3, सूरा अल-बकरा pdf. आयत 191–195. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Wednesday, September 30, 2026
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