अल-बकरा · 86/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا بِالْآخِرَةِ ۖ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ ۝٨٦
Ulaaa`ikal lazeenash tarawul hayaatad dunyaa bil aakhirati falaa yukhaffafu `anhumul `azaabu wa laa hum yunsaroon
📖 हिंदी अर्थ
यही वह लोग हैं जिन्होंने आख़ेरत के बदले दुनिया की ज़िन्दगी ख़रीद पस न उनके अज़ाब ही में तख्फ़ीफ़ (कमी) की जाएगी और न वह लोग किसी तरह की मदद दिए जाएँगे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اشْتَرَوُا: उन्होंने खरीदा, यानी बदला किया, एक चीज़ को दूसरी के बदले में लिया।
  • الْحَيَاةَ الدُّنْيَا: दुनिया की ज़िंदगी, जो फ़ानी (नाशवान) है।
  • بِالْآخِرَةِ: आख़िरत के बदले में, यानी हमेशा रहने वाली ज़िंदगी।
  • فَلَا يُخَفَّفُ: तो हल्का नहीं किया जाएगा।
  • الْعَذَابُ: अज़ाब, दर्दनाक सज़ा।
  • وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ: और न ही उनकी मदद की जाएगी, न कोई उन्हें बचाने वाला होगा।

तफ़सीर (व्याख्या):

ये वो लोग हैं जिन्होंने दुनिया की इस छोटी सी, फ़ानी ज़िंदगी को आख़िरत की हमेशा रहने वाली और बेहतर ज़िंदगी पर तरजीह दी। उन्होंने अपनी असली कामयाबी और सच्ची भलाई को बेच दिया और उसके बदले में दुनिया के कुछ दिनों के सुख-चैन को खरीद लिया। उन्होंने अपनी इच्छाओं और ख्वाहिशों की पैरवी की, हक़ को छोड़ दिया और बातिल को अपना लिया।

ऐसे लोगों के लिए अंजाम बहुत बुरा है। क़यामत के दिन उनसे अज़ाब हल्का नहीं किया जाएगा, न तो उसमें कोई कमी की जाएगी और न ही उन्हें कोई राहत दी जाएगी। वे हमेशा उस अज़ाब में पड़े रहेंगे। और जब वे मदद माँगेंगे, तो कोई उनकी मदद करने वाला नहीं होगा। न कोई दोस्त, न कोई रिश्तेदार, न कोई शरीक — अल्लाह के अज़ाब से बचाने वाला कोई नहीं होगा।

दावती पहलू:

ये आयत हमें बड़ी सीख देती है कि हमें अपनी ज़िंदगी का सही इस्तेमाल करना चाहिए। दुनिया की चमक-दमक और मोहब्बत हमें आख़िरत की तैयारी से ग़ाफ़िल न कर दे। याद रखिए, दुनिया की ज़िंदगी बहुत छोटी है, लेकिन आख़िरत हमेशा रहने वाली है। जिसने दुनिया के लिए आख़िरत बेच दी, उसने बड़ा घाटे का सौदा किया। लेकिन जो लोग अल्लाह की राह में अपनी दुनिया की ख्वाहिशों को कुर्बान कर देते हैं, अल्लाह उन्हें दोनों जहान की भलाई देता है। आओ, हम अपने अमल को सुधारें, अपनी नीयत को साफ़ करें और उस दिन की तैयारी करें जब कोई किसी की मदद नहीं कर सकेगा, सिवाय उसके जो अल्लाह के सामने सच्चे दिल से हाज़िर होगा। अल्लाह हमें दुनिया की मोहब्बत से बचाए और आख़िरत की भलाई हासिल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 84-88 — सूरा अल-बकरा

84وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَاقَكُمْ لَا تَسْفِكُونَ دِمَاءَكُمْ وَلَا تُخْرِجُونَ أَنفُسَكُم مِّن دِيَارِكُمْ ثُمَّ أَقْرَرْتُمْ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ
और (वह वक्त याद करो) जब हमने तुम (तुम्हारे बुर्ज़ुगों) से अहद लिया था कि आपस में खूरेज़ियाँ न करना और न अपने लोगों को शहर बदर करना तो तुम (तुम्हारे बुर्जुग़ों) ने इक़रार किया था और तुम भी उसकी गवाही देते हो
85ثُمَّ أَنتُمْ هَٰؤُلَاءِ تَقْتُلُونَ أَنفُسَكُمْ وَتُخْرِجُونَ فَرِيقًا مِّنكُم مِّن دِيَارِهِمْ تَظَاهَرُونَ عَلَيْهِم بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَإِن يَأْتُوكُمْ أُسَارَىٰ تُفَادُوهُمْ وَهُوَ مُحَرَّمٌ عَلَيْكُمْ إِخْرَاجُهُمْ ۚ أَفَتُؤْمِنُونَ بِبَعْضِ الْكِتَابِ وَتَكْفُرُونَ بِبَعْضٍ ۚ فَمَا جَزَاءُ مَن يَفْعَلُ ذَٰلِكَ مِنكُمْ إِلَّا خِزْيٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ يُرَدُّونَ إِلَىٰ أَشَدِّ الْعَذَابِ ۗ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
(कि हाँ ऐसा हुआ था) फिर वही लोग तो तुम हो कि आपस में एक दूसरे को क़त्ल करते हो और अपनों से एक जत्थे के नाहक़ और ज़बरदस्ती हिमायती बनकर दूसरे को शहर बदर करते हो (और लुत्फ़ तो ये है कि) अगर वही लोग क़ैदी बनकर तम्हारे पास (मदद माँगने) आए तो उनको तावान देकर छुड़ा लेते हो हालाँकि उनका निकालना ही तुम पर हराम किया गया था तो फिर क्या तुम (किताबे खुदा की) बाज़ बातों पर ईमान रखते हो और बाज़ से इन्कार करते हो पस तुम में से जो लोग ऐसा करें उनकी सज़ा इसके सिवा और कुछ नहीं कि ज़िन्दगी भर की रूसवाई हो और (आख़िरकार) क़यामत के दिन सख्त अज़ाब की तरफ लौटा दिये जाए और जो कुछ तुम लोग करते हो खुदा उससे ग़ाफ़िल नहीं है
86أُولَٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا بِالْآخِرَةِ ۖ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
यही वह लोग हैं जिन्होंने आख़ेरत के बदले दुनिया की ज़िन्दगी ख़रीद पस न उनके अज़ाब ही में तख्फ़ीफ़ (कमी) की जाएगी और न वह लोग किसी तरह की मदद दिए जाएँगे
87وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ وَقَفَّيْنَا مِن بَعْدِهِ بِالرُّسُلِ ۖ وَآتَيْنَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ الْبَيِّنَاتِ وَأَيَّدْنَاهُ بِرُوحِ الْقُدُسِ ۗ أَفَكُلَّمَا جَاءَكُمْ رَسُولٌ بِمَا لَا تَهْوَىٰ أَنفُسُكُمُ اسْتَكْبَرْتُمْ فَفَرِيقًا كَذَّبْتُمْ وَفَرِيقًا تَقْتُلُونَ
और ये हक़ीक़ी बात है कि हमने मूसा को किताब (तौरेत) दी और उनके बाद बहुत से पैग़म्बरों को उनके क़दम ब क़दम ले चलें और मरियम के बेटे ईसा को (भी बहुत से) वाजेए व रौशन मौजिजे दिए और पाक रूह जिबरील के ज़रिये से उनकी मदद की क्या तुम उस क़दर बददिमाग़ हो गए हो कि जब कोई पैग़म्बर तुम्हारे पास तुम्हारी ख्वाहिशे नफ़सानी के ख़िलाफ कोई हुक्म लेकर आया तो तुम अकड़ बैठे फिर तुमने बाज़ पैग़म्बरों को तो झुठलाया और बाज़ को जान से मार डाला
88وَقَالُوا قُلُوبُنَا غُلْفٌ ۚ بَل لَّعَنَهُمُ اللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَلِيلًا مَّا يُؤْمِنُونَ
और कहने लगे कि हमारे दिलों पर ग़िलाफ चढ़ा हुआ है (ऐसा नहीं) बल्कि उनके कुफ्र की वजह से खुदा ने उनपर लानत की है पस कम ही लोग ईमान लाते हैं
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीअवतरण स्थान
86आयत

अनुवाद — अल-बकरा 86

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Tuesday, September 29, 2026

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