अल-हज · 36/78
अनुवाद उच्चारण — अल-हज
وَالْبُدْنَ جَعَلْنَاهَا لَكُم مِّن شَعَائِرِ اللَّهِ لَكُمْ فِيهَا خَيْرٌ ۖ فَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَيْهَا صَوَافَّ ۖ فَإِذَا وَجَبَتْ جُنُوبُهَا فَكُلُوا مِنْهَا وَأَطْعِمُوا الْقَانِعَ وَالْمُعْتَرَّ ۚ كَذَٰلِكَ سَخَّرْنَاهَا لَكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ۝٣٦
Walbudna ja`alnaahaa lakum min sha`aaa`iril laahi lakum feehaa khairun fazkurusmal laahi `alaihaa sawaaff; fa izaa wajabat junoobuhaa fakuloo minhaa wa at`imul qaani`a walmu`tarr; kazaalika sakhkharnaahaa lakum la`allakum tashkuroon
📖 हिंदी अर्थ
और कुरबानी (मोटे गदबदे) ऊँट भी हमने तुम्हारे वास्ते खुदा की निशानियों में से क़रार दिया है इसमें तुम्हारी बहुत सी भलाईयाँ हैं फिर उनका तांते का तांता बाँध कर ज़िबाह करो और उस वक्त उन पर खुदा का नाम लो फिर जब उनके दस्त व बाजू काटकर गिर पड़े तो उन्हीं से तुम खुद भी खाओ और केनाअत पेशा फक़ीरों और माँगने वाले मोहताजों (दोनों) को भी खिलाओ हमने यूँ इन जानवरों को तुम्हारा ताबेए कर दिया ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अल-बुद्न (बुद्न): क़ुरबानी के ऊँट, जिन्हें बड़े शरीर के कारण यह नाम दिया गया है।
  • शआइरिल्लाह: अल्लाह के धर्म के निशान और उसकी इबादत के प्रतीक।
  • सवाफ़्फ़: खड़े हुए, तीन पैरों पर खड़े और चौथा पैर बंधा हुआ।
  • वजबत जुनूबुहा: जब वे ज़मीन पर करवट लेकर गिर जाएँ (यानी मर जाएँ)।
  • अल-क़ानि': वह फ़क़ीर जो संतोषी हो और माँगता नहीं।
  • अल-मु'अत्तर: वह फ़क़ीर जो माँगने के लिए आए या जो सामने आकर माँगे।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने इस आयत में क़ुरबानी के ऊँटों का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया कि हमने इन बड़े जानवरों (ऊँटों) को तुम्हारे लिए अपने धर्म के निशानों और इबादत के प्रतीकों में से बनाया है। ये वही जानवर हैं जिन्हें हज के दौरान बैतुल्लाह की तरफ़ भेजा जाता है और इन्हें "हदी" कहा जाता है। इन्हें "शआइर" इसलिए कहा गया क्योंकि इनके कोहान (कूबड़) पर निशान लगाया जाता है ताकि यह पता चले कि ये अल्लाह की राह में दिए गए हैं।

अल्लाह फ़रमाता है कि इन जानवरों में तुम्हारे लिए भलाई है — दुनिया में भी (जैसे उनका दूध, ऊन, सवारी और गोश्त) और आख़िरत में भी (अल्लाह का सवाब और उसकी रज़ा)। इसलिए जब तुम इन्हें ज़िब्ह करो तो अल्लाह का नाम लो — "बिस्मिल्लाह" कहो। ये ऊँट उस हालत में ज़िब्ह किए जाएँ कि वे खड़े हों, तीन पैरों पर सीधे खड़े हों और उनका बायाँ अगला पैर बंधा हो। जब वे ज़िब्ह होकर ज़मीन पर करवट लेकर गिर जाएँ और उनकी जान निकल जाए, तो उनका गोश्त खाओ — यह इबादत की नियत से हो — और उनमें से उन फ़क़ीरों को भी खिलाओ जो संतोषी हैं और माँगते नहीं, और उन्हें भी जो माँगने आते हैं या सामने आकर अपनी ज़रूरत ज़ाहिर करते हैं।

फिर अल्लाह तआला अपनी कुदरत और एहसान की याद दिलाते हुए फ़रमाता है: हमने इन बड़े और ताक़तवर जानवरों को तुम्हारे लिए वश में कर दिया — इतने बड़े जानवर, जो जंगल में खूँख्वार होते हैं, तुम्हारे काबू में हैं और तुम्हारे हुक्म से चलते हैं — ताकि तुम अल्लाह का शुक्र अदा करो और उसकी नेमतों को पहचानो।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की राह में खर्च करना और उसकी इबादत के लिए अपने माल को क़ुर्बान करना कितनी बड़ी सआदत है। जब हम अपनी प्यारी चीज़ें अल्लाह की राह में देते हैं, तो अल्लाह हमें उससे कहीं बेहतर बदला देता है। यह भी सीख मिलती है कि क़ुर्बानी सिर्फ़ गोश्त खाने का ज़रिया नहीं, बल्कि अल्लाह की याद, उसका शुक्र और ग़रीबों की मदद का ज़रिया है। इसलिए हमें चाहिए कि क़ुर्बानी के मौक़े पर अल्लाह का नाम लें, उसका शुक्र अदा करें और अपने आस-पास के ज़रूरतमंदों को खिलाएँ — चाहे वे माँगें या न माँगें। यही असली इबादत है जो दिलों को पाक करती है और समाज में मुहब्बत पैदा करती है।

🎧 सुनें

📜 आयत 34-38 — अल-हज

34وَلِكُلِّ أُمَّةٍ جَعَلْنَا مَنسَكًا لِّيَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَىٰ مَا رَزَقَهُم مِّن بَهِيمَةِ الْأَنْعَامِ ۗ فَإِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ فَلَهُ أَسْلِمُوا ۗ وَبَشِّرِ الْمُخْبِتِينَ
और हमने तो हर उम्मत के वास्ते क़ुरबानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर दिया है ताकि जो मवेशी चारपाए खुदा ने उन्हें अता किए हैं उन पर (ज़िबाह के वक्त) ख़ुदा का नाम ले ग़रज़ तुम लोगों का माबूद (वही) यकता खुदा है तो उसी के फरमाबरदार बन जाओ
35الَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَالصَّابِرِينَ عَلَىٰ مَا أَصَابَهُمْ وَالْمُقِيمِي الصَّلَاةِ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
और (ऐ रसूल हमारे) गिड़गिड़ाने वाले बन्दों को (बेहश्त की) खुशख़बरी दे दो ये वह हैं कि जब (उनके सामने) खुदा का नाम लिया जाता है तो उनके दिल सहम जाते हैं और जब उनपर कोई मुसीबत आ पड़े तो सब्र करते हैं और नमाज़ पाबन्दी से अदा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है उसमें से (राहे खुदा में) ख़र्च करते हैं
36وَالْبُدْنَ جَعَلْنَاهَا لَكُم مِّن شَعَائِرِ اللَّهِ لَكُمْ فِيهَا خَيْرٌ ۖ فَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَيْهَا صَوَافَّ ۖ فَإِذَا وَجَبَتْ جُنُوبُهَا فَكُلُوا مِنْهَا وَأَطْعِمُوا الْقَانِعَ وَالْمُعْتَرَّ ۚ كَذَٰلِكَ سَخَّرْنَاهَا لَكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
और कुरबानी (मोटे गदबदे) ऊँट भी हमने तुम्हारे वास्ते खुदा की निशानियों में से क़रार दिया है इसमें तुम्हारी बहुत सी भलाईयाँ हैं फिर उनका तांते का तांता बाँध कर ज़िबाह करो और उस वक्त उन पर खुदा का नाम लो फिर जब उनके दस्त व बाजू काटकर गिर पड़े तो उन्हीं से तुम खुद भी खाओ और केनाअत पेशा फक़ीरों और माँगने वाले मोहताजों (दोनों) को भी खिलाओ हमने यूँ इन जानवरों को तुम्हारा ताबेए कर दिया ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो
37لَن يَنَالَ اللَّهَ لُحُومُهَا وَلَا دِمَاؤُهَا وَلَٰكِن يَنَالُهُ التَّقْوَىٰ مِنكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ سَخَّرَهَا لَكُمْ لِتُكَبِّرُوا اللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَاكُمْ ۗ وَبَشِّرِ الْمُحْسِنِينَ
खुदा तक न तो हरगिज़ उनके गोश्त ही पहुँचेगे और न खून मगर (हाँ) उस तक तुम्हारी परहेज़गारी अलबत्ता पहुँचेगी ख़ुदा ने जानवरों को (इसलिए) यूँ तुम्हारे क़ाबू में कर दिया है ताकि जिस तरह खुदा ने तुम्हें बनाया है उसी तरह उसकी बड़ाई करो
38۞ إِنَّ اللَّهَ يُدَافِعُ عَنِ الَّذِينَ آمَنُوا ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ خَوَّانٍ كَفُورٍ
और (ऐ रसूल) नेकी करने वालों को (हमेशा की) ख़ुशख़बरी दे दो इसमें शक नहीं कि खुदा ईमानवालों से कुफ्फ़ार को दूर दफा करता रहता है खुदा किसी बददयानत नाशुक्रे को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता
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अनुवाद — अल-हज 36

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Tuesday, August 18, 2026

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