अल-हज · 37/78
अनुवाद उच्चारण — अल-हज
لَن يَنَالَ اللَّهَ لُحُومُهَا وَلَا دِمَاؤُهَا وَلَٰكِن يَنَالُهُ التَّقْوَىٰ مِنكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ سَخَّرَهَا لَكُمْ لِتُكَبِّرُوا اللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَاكُمْ ۗ وَبَشِّرِ الْمُحْسِنِينَ ۝٣٧
Lany yanaalal laaha luhoo muhaa wa laa dimaaa`uhaa wa laakiny yanaaluhut taqwaa minkum; kazaalika sakhkharhaa lakum litukabbirul laaha `alaa ma hadaakum; wa bashshirul muhsineen
📖 हिंदी अर्थ
खुदा तक न तो हरगिज़ उनके गोश्त ही पहुँचेगे और न खून मगर (हाँ) उस तक तुम्हारी परहेज़गारी अलबत्ता पहुँचेगी ख़ुदा ने जानवरों को (इसलिए) यूँ तुम्हारे क़ाबू में कर दिया है ताकि जिस तरह खुदा ने तुम्हें बनाया है उसी तरह उसकी बड़ाई करो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَن يَنَالَ اللَّهَ: अल्लाह तक नहीं पहुँचेगा, न ही उसके पास ऊपर उठेगा।
  • لُحُومُهَا: इन (क़ुर्बानी के जानवरों) का गोश्त।
  • وَلَا دِمَاؤُهَا: और न ही इनका ख़ून।
  • التَّقْوَىٰ: अल्लाह का डर, नेकनीयती, और ख़ालिस इरादा।
  • سَخَّرَهَا: उन्हें (जानवरों को) तुम्हारे लिए वश में किया।
  • لِتُكَبِّرُوا اللَّهَ: ताकि तुम अल्लाह की बड़ाई करो।
  • الْمُحْسِنِينَ: नेकी करने वाले, जो अल्लाह की इबादत में और लोगों के साथ भलाई में पूर्णता दिखाते हैं।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में हमें एक बहुत बड़ी हक़ीक़त समझा रहे हैं कि क़ुर्बानी के जानवरों का गोश्त और ख़ून अल्लाह तक नहीं पहुँचता, न ही उसके पास ऊपर उठता है। अल्लाह को न तो गोश्त की ज़रूरत है और न ख़ून की, वह तो बेनियाज़ है। अल्लाह तक जो चीज़ पहुँचती है, वह तुम्हारा तक़वा है—यानी तुम्हारी नेकनीयती, तुम्हारा ख़ालिस इरादा, और अल्लाह का डर। असल मक़सद यह है कि तुम क़ुर्बानी सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए करो, उसका नाम लेकर, उसी की इबादत के तौर पर, और उसी की बड़ाई के लिए।

ज़ाहिर है कि अल्लाह ने इन जानवरों को तुम्हारे लिए वश में किया है—वे तुम्हारे हुक्म में हैं, तुम उन्हें जब चाहो और जिस तरह चाहो क़ुर्बानी के लिए तैयार कर सकते हो। यह अल्लाह की बड़ी मेहरबानी है कि उसने इन जानवरों को तुम्हारे क़ाबू में कर दिया, ताकि तुम उसकी बड़ाई करो और उसका शुक्र अदा करो, क्योंकि उसने तुम्हें सीधा रास्ता दिखाया और हिदायत दी। यह हिदायत ही सबसे बड़ी नेमत है, और इसी नेमत के एहतिराम में क़ुर्बानी की जाती है।

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को हुक्म दे रहे हैं कि वे उन लोगों को ख़ुशख़बरी सुनाएँ जो मुहसिन हैं—यानी जो अल्लाह की इबादत में पूर्णता दिखाते हैं, उसकी रज़ा के लिए सब कुछ करते हैं, और अपने बंदों के साथ भलाई करते हैं। उनके लिए हर भलाई, हर कामयाबी और जन्नत की ख़ुशख़बरी है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के दीन में शक्ल-सूरत से ज़्यादा दिल की हालत अहम है। क़ुर्बानी का असल मक़सद सिर्फ़ जानवर काटना नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा और उसकी बड़ाई है। जब हम क़ुर्बानी करें तो दिल में यही इरादा हो कि हम अल्लाह के करीब हो रहे हैं, उसकी नेमतों का शुक्र अदा कर रहे हैं, और उसकी राह में अपनी सबसे प्यारी चीज़ क़ुर्बान करने की तैयारी दिखा रहे हैं। यही तक़वा हमें अल्लाह के करीब लाता है और हमारे आमाल को क़बूल करवाता है। अल्लाह हमें सच्चे दिल से इबादत करने और मुहसिन बनने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 35-39 — अल-हज

35الَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَالصَّابِرِينَ عَلَىٰ مَا أَصَابَهُمْ وَالْمُقِيمِي الصَّلَاةِ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
और (ऐ रसूल हमारे) गिड़गिड़ाने वाले बन्दों को (बेहश्त की) खुशख़बरी दे दो ये वह हैं कि जब (उनके सामने) खुदा का नाम लिया जाता है तो उनके दिल सहम जाते हैं और जब उनपर कोई मुसीबत आ पड़े तो सब्र करते हैं और नमाज़ पाबन्दी से अदा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है उसमें से (राहे खुदा में) ख़र्च करते हैं
36وَالْبُدْنَ جَعَلْنَاهَا لَكُم مِّن شَعَائِرِ اللَّهِ لَكُمْ فِيهَا خَيْرٌ ۖ فَاذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَيْهَا صَوَافَّ ۖ فَإِذَا وَجَبَتْ جُنُوبُهَا فَكُلُوا مِنْهَا وَأَطْعِمُوا الْقَانِعَ وَالْمُعْتَرَّ ۚ كَذَٰلِكَ سَخَّرْنَاهَا لَكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
और कुरबानी (मोटे गदबदे) ऊँट भी हमने तुम्हारे वास्ते खुदा की निशानियों में से क़रार दिया है इसमें तुम्हारी बहुत सी भलाईयाँ हैं फिर उनका तांते का तांता बाँध कर ज़िबाह करो और उस वक्त उन पर खुदा का नाम लो फिर जब उनके दस्त व बाजू काटकर गिर पड़े तो उन्हीं से तुम खुद भी खाओ और केनाअत पेशा फक़ीरों और माँगने वाले मोहताजों (दोनों) को भी खिलाओ हमने यूँ इन जानवरों को तुम्हारा ताबेए कर दिया ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो
37لَن يَنَالَ اللَّهَ لُحُومُهَا وَلَا دِمَاؤُهَا وَلَٰكِن يَنَالُهُ التَّقْوَىٰ مِنكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ سَخَّرَهَا لَكُمْ لِتُكَبِّرُوا اللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَاكُمْ ۗ وَبَشِّرِ الْمُحْسِنِينَ
खुदा तक न तो हरगिज़ उनके गोश्त ही पहुँचेगे और न खून मगर (हाँ) उस तक तुम्हारी परहेज़गारी अलबत्ता पहुँचेगी ख़ुदा ने जानवरों को (इसलिए) यूँ तुम्हारे क़ाबू में कर दिया है ताकि जिस तरह खुदा ने तुम्हें बनाया है उसी तरह उसकी बड़ाई करो
38۞ إِنَّ اللَّهَ يُدَافِعُ عَنِ الَّذِينَ آمَنُوا ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ خَوَّانٍ كَفُورٍ
और (ऐ रसूल) नेकी करने वालों को (हमेशा की) ख़ुशख़बरी दे दो इसमें शक नहीं कि खुदा ईमानवालों से कुफ्फ़ार को दूर दफा करता रहता है खुदा किसी बददयानत नाशुक्रे को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता
39أُذِنَ لِلَّذِينَ يُقَاتَلُونَ بِأَنَّهُمْ ظُلِمُوا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ نَصْرِهِمْ لَقَدِيرٌ
जिन (मुसलमानों) से (कुफ्फ़ार) लड़ते थे चूँकि वह (बहुत) सताए गए उस वजह से उन्हें भी (जिहाद) की इजाज़त दे दी गई और खुदा तो उन लोगों की मदद पर यक़ीनन क़ादिर (वत वाना) है
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अनुवाद — अल-हज 37

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Tuesday, August 18, 2026

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