अन-नूर · 6/64
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-नूर
وَالَّذِينَ يَرْمُونَ أَزْوَاجَهُمْ وَلَمْ يَكُن لَّهُمْ شُهَدَاءُ إِلَّا أَنفُسُهُمْ فَشَهَادَةُ أَحَدِهِمْ أَرْبَعُ شَهَادَاتٍ بِاللَّهِ ۙ إِنَّهُ لَمِنَ الصَّادِقِينَ ۝٦
Wallazeena yarmoona azwaajahum wa lam yakul lahum shuhadaaa`u illaaa anfusuhum fashahaadatu ahadihim arb`u shahaadaatim billaahi innahoo laminas saadiqeen
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग अपनी बीवियों पर (ज़िना) का ऐब लगाएँ और (इसके सुबूत में) अपने सिवा उनका कोई गवाह न हो तो ऐसे लोगों में से एक की गवाही चार मरतबा इस तरह होगी कि वह (हर मरतबा) ख़ुदा की क़सम खाकर बयान करे कि वह (अपने दावे में) जरुर सच्चा है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَرْمُونَ أَزْوَاجَهُمْ: अपनी पत्नियों पर (व्यभिचार का) आरोप लगाते हैं।
  • شُهَدَاءُ: गवाह।
  • إِلَّا أَنفُسَهُمْ: स्वयं के अलावा कोई नहीं।
  • فَشَهَادَةُ أَحَدِهِمْ أَرْبَعُ شَهَادَاتٍ بِاللَّهِ: तो उनमें से एक का (अपनी बात साबित करने के लिए) चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही देना है।
  • إِنَّهُ لَمِنَ الصَّادِقِينَ: कि वह (अपने आरोप में) सच्चा है।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस स्थिति का समाधान प्रस्तुत करती है जब एक पति अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाए, लेकिन उसके पास चार गवाह न हों — जो कि इस्लामी क़ानून में ऐसे आरोप के लिए आवश्यक हैं। ऐसे में शरीअत ने एक न्यायसंगत और निष्पक्ष नियम बनाया है: पति को चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही देनी होगी कि वह अपने आरोप में सच्चा है। यह गवाही न्यायाधीश (क़ाज़ी) के सामने होगी। इसके बाद पाँचवीं बार वह यह कहेगा कि यदि वह झूठा है तो उस पर अल्लाह की लानत हो। यह प्रक्रिया उसे झूठी गवाही देने से रोकती है, क्योंकि यह एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी और अल्लाह के सामने जवाबदेही का मामला है।

यह आयत इस्लामी न्याय प्रणाली की सुंदरता और संतुलन को दर्शाती है। एक ओर यह पत्नी की इज़्ज़त की रक्षा करती है कि कोई भी बिना सबूत के उस पर आरोप न लगा सके, और दूसरी ओर यह पति को भी इंसाफ़ दिलाने का रास्ता देती है, ताकि सच्चाई छिपी न रहे। यह क़ुरआन का वह नियम है जो घरेलू जीवन में न्याय, सच्चाई और अल्लाह के भय को स्थापित करता है। अल्लाह तआला ने यह क़ानून इसलिए बनाया ताकि समाज में पवित्रता बनी रहे, झूठ और बदनामी का दरवाज़ा बंद हो, और हर मुसलमान यह समझे कि उसकी हर बात का हिसाब अल्लाह के यहाँ होगा। यह हुक्म हमें सिखाता है कि जीवन के हर मामले में अल्लाह का डर और उसकी रज़ा को मुख्य रखना चाहिए, और दूसरों के अधिकारों का ख़याल रखना चाहिए। यही इस्लाम की रहमत और कामिल इंसाफ़ है, जो हर हाल में सच्चाई और भलाई की तरफ़ रहनुमाई करता है।



📜 आयत 4-8 — सूरा अन-नूर

4وَالَّذِينَ يَرْمُونَ الْمُحْصَنَاتِ ثُمَّ لَمْ يَأْتُوا بِأَرْبَعَةِ شُهَدَاءَ فَاجْلِدُوهُمْ ثَمَانِينَ جَلْدَةً وَلَا تَقْبَلُوا لَهُمْ شَهَادَةً أَبَدًا ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
और जो लोग पाक दामन औरतों पर (ज़िना की) तोहमत लगाएँ फिर (अपने दावे पर) चार गवाह पेश न करें तो उन्हें अस्सी कोड़ें मारो और फिर (आइन्दा) कभी उनकी गवाही कुबूल न करो और (याद रखो कि) ये लोग ख़ुद बदकार हैं
5إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ وَأَصْلَحُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
मगर हाँ जिन लोगों ने उसके बाद तौबा कर ली और अपनी इसलाह की तो बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
6وَالَّذِينَ يَرْمُونَ أَزْوَاجَهُمْ وَلَمْ يَكُن لَّهُمْ شُهَدَاءُ إِلَّا أَنفُسُهُمْ فَشَهَادَةُ أَحَدِهِمْ أَرْبَعُ شَهَادَاتٍ بِاللَّهِ ۙ إِنَّهُ لَمِنَ الصَّادِقِينَ
और जो लोग अपनी बीवियों पर (ज़िना) का ऐब लगाएँ और (इसके सुबूत में) अपने सिवा उनका कोई गवाह न हो तो ऐसे लोगों में से एक की गवाही चार मरतबा इस तरह होगी कि वह (हर मरतबा) ख़ुदा की क़सम खाकर बयान करे कि वह (अपने दावे में) जरुर सच्चा है
7وَالْخَامِسَةُ أَنَّ لَعْنَتَ اللَّهِ عَلَيْهِ إِن كَانَ مِنَ الْكَاذِبِينَ
और पाँचवी (मरतबा) यूँ (कहेगा) अगर वह झूट बोलता हो तो उस पर ख़ुदा की लानत
8وَيَدْرَأُ عَنْهَا الْعَذَابَ أَن تَشْهَدَ أَرْبَعَ شَهَادَاتٍ بِاللَّهِ ۙ إِنَّهُ لَمِنَ الْكَاذِبِينَ
और औरत (के सर से) इस तरह सज़ा टल सकती है कि वह चार मरतबा ख़ुदा की क़सम खा कर बयान कर दे कि ये शख्स (उसका शौहर अपने दावे में) ज़रुर झूठा है
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अनुवाद — अन-नूर 6

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Friday, October 2, 2026

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