अल-क़सस · 16/88
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़सस
قَالَ رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي فَغَفَرَ لَهُ ۚ إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ ۝١٦
Qaala Rabbi innee zalamtu nafsee faghfir lee faghafaralah; innahoo Huwal Ghafoorur Raheem
📖 हिंदी अर्थ
(फिर बारगाहे ख़ुदा में) अर्ज़ की परवरदिगार बेशक मैने अपने ऊपर आप ज़ुल्म किया (कि इस शहर में आया) तो तू मुझे (दुश्मनों से) पोशीदा रख-ग़रज़ ख़ुदा ने उन्हें पोशीदा रखा (इसमें तो शक नहीं कि वह बड़ा पोशीदा रखने वाला मेहरबान है)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ظَلَمْتُ نَفْسِي: मैंने अपने ऊपर अत्याचार किया (अर्थात अपनी आत्मा पर ज़ुल्म किया)
  • فَاغْفِرْ لِي: तो मुझे क्षमा कर दे
  • الْغَفُورُ: अत्यधिक क्षमा करने वाला
  • الرَّحِيمُ: अत्यंत दयालु

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) से यह अनजाने में एक क़िब्ती व्यक्ति की मृत्यु का कारण बन गया, तो उन्होंने तुरंत अपनी गलती को स्वीकार किया और अपने रब की ओर रुजू किया। उन्होंने विनम्रता और पश्चाताप के साथ कहा: "ऐ मेरे रब! मैंने अपनी आत्मा पर ज़ुल्म किया, क्योंकि मैंने उस व्यक्ति को मारा जिसे मारने का मुझे आदेश नहीं था। यह मेरी भूल थी, मेरी कमज़ोरी थी। अतः तू मुझे क्षमा कर दे।"

यह एक अद्भुत दृश्य है—एक नबी अपने रब के सामने इस तरह झुकता है, अपनी गलती स्वीकार करता है, और क्षमा की भीख माँगता है। यह हमें सिखाता है कि इंसान से गलती हो सकती है, लेकिन असली इंसान वही है जो अपनी गलती को स्वीकार करे और अल्लाह से क्षमा माँगे।

अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्सलाम) की दुआ क़बूल की और उन्हें क्षमा कर दिया। यह अल्लाह की रहमत का अद्भुत प्रदर्शन है—वह अपने बंदों की गलतियों को क्षमा करने के लिए हमेशा तैयार है, बशर्ते वे सच्चे दिल से तौबा करें।

इस आयत के अंत में अल्लाह अपने दो खूबसूरत नामों का ज़िक्र करता है: अल-ग़फ़ूर (अत्यधिक क्षमा करने वाला) और अर-रहीम (अत्यंत दयालु)। यह हमें बताता है कि अल्लाह की क्षमा असीमित है और उसकी दया सबसे बढ़कर है।

दावती पहलू:

यह आयत हर उस इंसान के लिए एक बड़ी खुशखबरी है जो गलती कर बैठता है। चाहे गलती कितनी भी बड़ी हो, अल्लाह का दरवाज़ा तौबा के लिए हमेशा खुला है। जिस तरह अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्सलाम) को क्षमा किया, वह हममें से हर उस व्यक्ति को क्षमा करेगा जो सच्चे दिल से उसकी ओर लौटेगा। निराशा शैतान का हथियार है—हमें कभी अल्लाह की रहमत से निराश नहीं होना चाहिए। अल्लाह की क्षमा उसकी दया से भी बड़ी है, और वह अपने बंदों से मुहब्बत करता है। आइए, हम भी मूसा (अलैहिस्सलाम) की तरह अपनी गलतियों को स्वीकार करें और अल्लाह से क्षमा माँगें—वह ज़रूर क्षमा करेगा, क्योंकि वही तो अल-ग़फ़ूर अर-रहीम है।



📜 आयत 14-18 — सूरा अल-क़सस

14وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُ وَاسْتَوَىٰ آتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ
और जब मूसा अपनी जवानी को पहुँचे और (हाथ पाँव निकाल के) दुरुस्त हो गए तो हमने उनको हिकमत और इल्म अता किया और नेकी करने वालों को हम यूँ जज़ाए खैर देते हैं
15وَدَخَلَ الْمَدِينَةَ عَلَىٰ حِينِ غَفْلَةٍ مِّنْ أَهْلِهَا فَوَجَدَ فِيهَا رَجُلَيْنِ يَقْتَتِلَانِ هَٰذَا مِن شِيعَتِهِ وَهَٰذَا مِنْ عَدُوِّهِ ۖ فَاسْتَغَاثَهُ الَّذِي مِن شِيعَتِهِ عَلَى الَّذِي مِنْ عَدُوِّهِ فَوَكَزَهُ مُوسَىٰ فَقَضَىٰ عَلَيْهِ ۖ قَالَ هَٰذَا مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ ۖ إِنَّهُ عَدُوٌّ مُّضِلٌّ مُّبِينٌ
और एक दिन इत्तिफाक़न मूसा शहर में ऐसे वक्त अाए कि वहाँ के लोग (नींद की) ग़फलत में पडे हुए थे तो देखा कि वहाँ दो आदमी आपस में लड़े मरते हैं ये (एक) तो उनकी क़ौम (बनी इसराइल) में का है और वह (दूसरा) उनके दुश्मन की क़ौम (क़िब्ती) का है तो जो शख्स उनकी क़ौम का था उसने उस शख्स से जो उनके दुश्मनों में था (ग़लबा हासिल करने के लिए) मूसा से मदद माँगी ये सुनते ही मूसा ने उसे एक घूसा मारा था कि उसका काम तमाम हो गया फिर (ख्याल करके) कहने लगे ये शैतान का काम था इसमें शक नहीं कि वह दुश्मन और खुल्लम खुल्ला गुमराह करने वाला है
16قَالَ رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي فَغَفَرَ لَهُ ۚ إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ
(फिर बारगाहे ख़ुदा में) अर्ज़ की परवरदिगार बेशक मैने अपने ऊपर आप ज़ुल्म किया (कि इस शहर में आया) तो तू मुझे (दुश्मनों से) पोशीदा रख-ग़रज़ ख़ुदा ने उन्हें पोशीदा रखा (इसमें तो शक नहीं कि वह बड़ा पोशीदा रखने वाला मेहरबान है)
17قَالَ رَبِّ بِمَا أَنْعَمْتَ عَلَيَّ فَلَنْ أَكُونَ ظَهِيرًا لِّلْمُجْرِمِينَ
मूसा ने अर्ज क़ी परवरदिगार चूँकि तूने मुझ पर एहसान किया है मै भी आइन्दा गुनाहगारों का हरगिज़ मदद गार न बनूगाँ
18فَأَصْبَحَ فِي الْمَدِينَةِ خَائِفًا يَتَرَقَّبُ فَإِذَا الَّذِي اسْتَنصَرَهُ بِالْأَمْسِ يَسْتَصْرِخُهُ ۚ قَالَ لَهُ مُوسَىٰ إِنَّكَ لَغَوِيٌّ مُّبِينٌ
ग़रज़ (रात तो जो त्यों गुज़री) सुबह को उम्मीदो बीम की हालत में मूसा शहर में गए तो क्या देखते हैं कि वही शख्स जिसने कल उनसे मदद माँगी थी उनसे (फिर) फरियाद कर रहा है-मूसा ने उससे कहा बेशक तू यक़ीनी खुल्लम खुल्ला गुमराह है
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अनुवाद — अल-क़सस 16

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Friday, October 2, 2026

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