Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ: तुम्हारे अधिकार में इस मामले का कुछ भी नहीं है।
- أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ: या वह (अल्लाह) उन पर दया करके उन्हें तौबा (पश्चाताप) की तौफ़ीक़ दे।
- أَوْ يُعَذِّبَهُمْ: या वह उन्हें यातना (अज़ाब) दे।
- فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ: क्योंकि वे अत्याचारी (ज़ालिम) हैं।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब उहुद की जंग में मुशरिकों (बहुदेववादियों) के सरगनाओं ने मुसलमानों पर बहुत ज़ुल्म किए और नबी (ﷺ) ने उनके खिलाफ़ बद्दुआ (प्रार्थना) की, तो अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी। इसका मतलब यह है कि ऐ नबी (ﷺ)! इन बंदों के मामले का फ़ैसला तुम्हारे हाथ में नहीं है, बल्कि पूरा अधिकार सिर्फ़ अल्लाह के पास है। वही जानता है कि किसके साथ क्या सलूक करना है। यह बात अल्लाह ने अपने नबी को सिखाने के लिए कही, ताकि वह पूरी तरह अल्लाह के हुक्म के सामने सर झुका दें और यह समझें कि हिदायत और गुमराही का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इन ज़ालिमों का मामला दो ही चीज़ों पर ख़त्म होगा: या तो अल्लाह उन्हें तौबा की तौफ़ीक़ दे और वे इस्लाम क़बूल कर लें, तो उन पर रहमत होगी और वे माफ़ कर दिए जाएँगे; या फिर वे अपनी ज़िद और कुफ़्र पर क़ायम रहेंगे, तो अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत में अज़ाब देगा। यह अज़ाब उनके अपने ज़ुल्म और सरकशी की वजह से है, क्योंकि उन्होंने अल्लाह के रसूलों को झुठलाया, अल्लाह की आयतों का इनकार किया और मुसलमानों पर ज़ुल्म किए। वे इस अज़ाब के पूरी तरह हक़दार हैं।
इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी (ﷺ) को तसल्ली दे रहा है कि आप पर सिर्फ़ पैग़ाम पहुँचाने और जिहाद की ज़िम्मेदारी है, फ़ैसला करना मेरा काम है। यह हमारे लिए भी एक बड़ी सीख है कि हमें अपने मामलों को अल्लाह के सुपुर्द कर देना चाहिए और उसकी रहमत से उम्मीद रखनी चाहिए। अल्लाह जब चाहता है, किसी दुश्मन को भी अपना दोस्त बना लेता है, और जब चाहता है, किसी को उसकी ज़िद की वजह से पकड़ लेता है। हमें चाहिए कि हम अल्लाह से हमेशा दुआ करें कि वह हमें और हमारे दुश्मनों को भी हिदायत दे, क्योंकि हिदायत देना उसी के हाथ में है। यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में इंसाफ़ और रहमत का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए, और अल्लाह के फ़ैसले पर पूरा यक़ीन रखना चाहिए।
📜 आयत 126-130 — सूरा आल-इमरान
अनुवाद — आल-इमरान 128
सूरा आल-इमरान आयत 128 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) तुम्हारा तो इसमें कुछ बस नहीं चाहे ख़ुदा…सूरा आयत 128/200 — सूरा आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा आल-इमरान सुनें, सूरा आल-इमरान अनुवाद, सूरा आल-इमरान mp3, सूरा आल-इमरान pdf. आयत 126–130. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा आल-इमरान
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
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