आल-इमरान · 129/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ۝١٢٩
Wa lilaahi maa fissamaawaati wa maa fil-ard; yaghfiru limai-yashaaa`u wa yu`azzibu mai-yashaaa`; wallaahu Ghafoorur Raheem
📖 हिंदी अर्थ
और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है सब ख़ुदा ही का है जिसको चाहे बख्शे और जिसको चाहे सज़ा करे और ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबार है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَغْفِرُ: क्षमा करता है।
  • يُعَذِّبُ: दंड देता है।
  • غَفُورٌ: अत्यंत क्षमाशील।
  • رَّحِيمٌ: बड़ा दयालु।

तफ़सीर (व्याख्या):

आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, वह सब अकेले अल्लाह ही का है—उसी की रचना, उसी का प्रबंधन और उसी का राज्य है। वह अपनी बुद्धि और न्याय के अनुसार जिसे चाहता है क्षमा कर देता है, और जिसे चाहता है दंड देता है। उसकी क्षमा उसकी दया और अनुग्रह से होती है, जबकि दंड उसके न्याय और हिकमत (बुद्धिमत्ता) के अनुसार। यह कोई मनमानी नहीं, बल्कि उसके ज्ञान और न्याय पर आधारित है। वह उन लोगों को क्षमा करता है जो तौबा करते हैं और उसकी ओर लौटते हैं, और उन्हें दंड देता है जो अवज्ञा और कुफ्र पर डटे रहते हैं। अल्लाह अपने बंदों के लिए अत्यंत क्षमाशील और दयालु है—उसकी क्षमा और दया उसके क्रोध से कहीं अधिक व्यापक है। इस आयत में मुसलमानों को यह भी सिखाया गया है कि वे काफिरों के लिए जल्दबाज़ी में बुरी दुआ न करें, क्योंकि अल्लाह ने यह तय किया है कि उनमें से कुछ लोग भविष्य में इस्लाम क़बूल करेंगे, और अल्लाह का ज्ञान सब कुछ समेटे हुए है।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह की संप्रभुता: यह आयत हमें याद दिलाती है कि पूरा ब्रह्मांड अल्लाह के अधिकार में है, इसलिए हमें अपने मामलों में केवल उसी पर भरोसा करना चाहिए और उसी से डरना चाहिए।
  2. आशा और भय का संतुलन: अल्लाह की क्षमा और दंड दोनों का उल्लेख हमें सिखाता है कि हम न तो उसकी रहमत से निराश हों और न ही उसकी पकड़ से बेख़बर रहें। यही संतुलन एक सच्चे मुसलमान की पहचान है।
  3. तौबा का द्वार: अल्लाह का "ग़फूर" और "रहीम" होना हमें बताता है कि चाहे कितने ही गुनाह क्यों न हों, तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला है। यह हमें निराशा से बचाकर अल्लाह की ओर लौटने की प्रेरणा देता है।
  4. जल्दबाज़ी से बचाव: यह आयत हमें सिखाती है कि हम दूसरों के बारे में अल्लाह के फैसले की जल्दबाज़ी न करें, क्योंकि अल्लाह हर इंसान के भविष्य को जानता है—हो सकता है कि आज का दुश्मन कल का वली (मित्र) बन जाए। इससे हमारे दिल में रहम और नर्मी पैदा होती है।
  5. अल्लाह की रहमत की व्यापकता: यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की रहमत उसके ग़ज़ब से पहले है, और वह अपने बंदों से मुहब्बत करने वाला है। यही वजह है कि इस्लाम में उम्मीद और मुहब्बत का पैग़ाम सबसे आगे है।
🎧 सुनें

📜 आयत 127-131 — आल-इमरान

127لِيَقْطَعَ طَرَفًا مِّنَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَوْ يَكْبِتَهُمْ فَيَنقَلِبُوا خَائِبِينَ
(और यह मदद की भी तो) इसलिए कि काफ़िरों के एक गिरोह को कम कर दे या ऐसा चौपट कर दे कि (अपना सा) मुंह लेकर नामुराद अपने घर वापस चले जायें
128لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ
(ऐ रसूल) तुम्हारा तो इसमें कुछ बस नहीं चाहे ख़ुदा उनकी तौबा कुबूल करे या उनको सज़ा दे क्योंकि वह ज़ालिम तो ज़रूर हैं
129وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है सब ख़ुदा ही का है जिसको चाहे बख्शे और जिसको चाहे सज़ा करे और ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबार है
130يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَأْكُلُوا الرِّبَا أَضْعَافًا مُّضَاعَفَةً ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
ऐ ईमानदारों सूद दनादन खाते न चले जाओ और ख़ुदा से डरो कि तुम छुटकारा पाओ
131وَاتَّقُوا النَّارَ الَّتِي أُعِدَّتْ لِلْكَافِرِينَ
और जहन्नुम की उस आग से डरो जो काफ़िरों के लिए तैयार की गयी है
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अनुवाद — आल-इमरान 129

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Tuesday, August 18, 2026

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