आल-इमरान · 127/200
अनुवाद उच्चारण — सूरा आल-इमरान
لِيَقْطَعَ طَرَفًا مِّنَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَوْ يَكْبِتَهُمْ فَيَنقَلِبُوا خَائِبِينَ ۝١٢٧
Laiyaqta`a tarafam minal lazeena kafarooo aw yakbitahum fayanqaliboo khaaa`ibeen
📖 हिंदी अर्थ
(और यह मदद की भी तो) इसलिए कि काफ़िरों के एक गिरोह को कम कर दे या ऐसा चौपट कर दे कि (अपना सा) मुंह लेकर नामुराद अपने घर वापस चले जायें

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لِيَقْطَعَ: काट देने के लिए, नष्ट करने के लिए।
  • طَرَفًا: एक हिस्सा, एक समूह।
  • يَكْبِتَهُمْ: उन्हें अपमानित करे, उन्हें रौंदे, उनके दिलों को जलाए (ग़म और शर्मिंदगी से भर दे)।
  • خَائِبِينَ: निराश, असफल, जो अपने मक़सद में कामयाब न हुए।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस नस्र (मदद) और फ़तह (विजय) के हिकमत (उद्देश्य) को बयान कर रही है जो अल्लाह ने मुसलमानों को बद्र के मैदान में अता की। अल्लाह ने यह जीत इसलिए दी ताकि कुफ़्फ़ार (इनकार करने वालों) के एक बड़े हिस्से को जड़ से खत्म कर दे — और बद्र में उनके सत्तर सरदार मारे गए — या उन्हें ऐसी ज़िल्लत और रुसवाई में डाले कि उनके दिल टूट जाएं, उनका ग़ुरूर चूर-चूर हो जाए, और वे अपनी सारी ताक़त और साज़िशों के बावजूद नाकामयाब और मायूस होकर लौटें। उन्होंने मुसलमानों को खत्म करने और इस्लाम की रोशनी बुझाने की ठानी थी, लेकिन अल्लाह ने उन्हें उल्टा सबक सिखाया — कुछ को मौत के घाट उतारा और बाकी को ऐसी हार दी कि वे अपनी जान बचाकर भागे, लेकिन दिल में ग़म और रुसवाई लेकर। यह अल्लाह की क़ुदरत का नमूना था कि जो लोग अल्लाह के दीन के दुश्मन थे, उन्हें उसने इतनी ज़लील हालत में डाला कि उनकी शान-ओ-शौकत मिट्टी में मिल गई।

फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह अपने नेक बंदों की मदद करता है और उन्हें दुश्मनों पर ग़ालिब बनाता है, बशर्ते वे सब्र और तक़्वा पर क़ायम रहें।
  2. जीत का असली मक़सद सिर्फ़ दुश्मन को हराना नहीं, बल्कि अल्लाह के दीन की सरबुलंदी और बातिल (झूठ) का खात्मा है।
  3. अल्लाह की मदद का नतीजा हमेशा इंसाफ़ और हक़ की बुलंदी होता है, और यह मोमिन के दिल को सुकून और इत्मीनान देता है।
  4. यह आयत मुसलमानों को हिम्मत देती है कि दुश्मन चाहे कितना भी ताक़तवर क्यों न हो, अल्लाह पर भरोसा रखने वालों को वह कभी नाकाम नहीं कर सकता।
  5. कुफ़्र और ज़ुल्म की बुनियादें भले ही मज़बूत दिखें, लेकिन अल्लाह की मर्ज़ी से वे पल भर में ढह सकती हैं — यही इस्लाम की ताक़त और सच्चाई का सबूत है।


📜 आयत 125-129 — सूरा आल-इमरान

125بَلَىٰ ۚ إِن تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا وَيَأْتُوكُم مِّن فَوْرِهِمْ هَٰذَا يُمْدِدْكُمْ رَبُّكُم بِخَمْسَةِ آلَافٍ مِّنَ الْمَلَائِكَةِ مُسَوِّمِينَ
बल्कि अगर तुम साबित क़दम रहो और (रसूल की मुख़ालेफ़त से) बचो और कुफ्फ़ार अपने (जोश में) तुमपर चढ़ भी आये तो तुम्हारा परवरदिगार ऐसे पॉच हज़ार फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करेगा जो निशाने जंग लगाए हुए डटे होंगे और ख़ुदा ने ये मदद सिर्फ तुम्हारी ख़ुशी के लिए की है
126وَمَا جَعَلَهُ اللَّهُ إِلَّا بُشْرَىٰ لَكُمْ وَلِتَطْمَئِنَّ قُلُوبُكُم بِهِ ۗ وَمَا النَّصْرُ إِلَّا مِنْ عِندِ اللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ
और ताकि इससे तुम्हारे दिल की ढारस हो और (ये तो ज़ाहिर है कि) मदद जब होती है तो ख़ुदा ही की तरफ़ से जो सब पर ग़ालिब (और) हिकमत वाला है
127لِيَقْطَعَ طَرَفًا مِّنَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَوْ يَكْبِتَهُمْ فَيَنقَلِبُوا خَائِبِينَ
(और यह मदद की भी तो) इसलिए कि काफ़िरों के एक गिरोह को कम कर दे या ऐसा चौपट कर दे कि (अपना सा) मुंह लेकर नामुराद अपने घर वापस चले जायें
128لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ
(ऐ रसूल) तुम्हारा तो इसमें कुछ बस नहीं चाहे ख़ुदा उनकी तौबा कुबूल करे या उनको सज़ा दे क्योंकि वह ज़ालिम तो ज़रूर हैं
129وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है सब ख़ुदा ही का है जिसको चाहे बख्शे और जिसको चाहे सज़ा करे और ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबार है
आल-इमरानकुरान सूची
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अनुवाद — आल-इमरान 127

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Friday, October 2, 2026

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