आल-इमरान · 143/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلَقَدْ كُنتُمْ تَمَنَّوْنَ الْمَوْتَ مِن قَبْلِ أَن تَلْقَوْهُ فَقَدْ رَأَيْتُمُوهُ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ ۝١٤٣
Wa laqad kuntum tamannnawnal mawta min qabli an talqawhu faqad ra aitumoohu wa antum tanzuroon
📖 हिंदी अर्थ
तुम तो मौत के आने से पहले (लड़ाई में) मरने की तमन्ना करते थे बस अब तुमने उसको अपनी ऑख से देख लिया और तुम अब भी देख रहे हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَمَنَّوْنَ الْمَوْتَ: तुम मौत की कामना करते थे, यानी शहादत की तमन्ना रखते थे।
  • مِن قَبْلِ أَن تَلْقَوْهُ: इससे पहले कि तुम उसका सामना करते (यानी जंग और उसकी कठिनाइयों का सामना करने से पहले)।
  • فَقَدْ رَأَيْتُمُوهُ: तो तुमने उसे देख लिया, यानी उसका कारण और उसकी तैयारी को आँखों से देख लिया।
  • وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ: और तुम खुद उसे देख रहे थे, आँखों से साफ़-साफ़।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ ईमानवालों! उहुद की जंग से पहले, जब तुमने बद्र के दिन अपने भाइयों को शहादत का शरफ़ और जन्नत का मुकाम हासिल करते देखा, तो तुममें से कुछ लोगों ने दिल से कामना की कि काश उन्हें भी मौत (शहादत) नसीब होती, ताकि वे भी उसी बुलंदी और इज़्ज़त को पा सकें। तुम लगातार यही तमन्ना करते रहे कि कोई ऐसा दिन आए जब तुम दुश्मन से भिड़ो और अल्लाह की राह में शहीद हो जाओ। फिर अल्लाह ने तुम्हारी इस तमन्ना को पूरा करने के लिए उहुद का दिन मुक़र्रर किया, और तुमने उस जंग का सामना किया। अब जब वह मौत (शहादत) तुम्हारे सामने आई, और तुमने उसके सबब (कारण) को अपनी आँखों से देख लिया — यानी जंग, तलवारें, तीर और दुश्मन की फ़ौजें — तो तुममें से कुछ लोग पीछे हट गए और जंग के मैदान से भाग खड़े हुए। यह तुम्हारे लिए एक इम्तिहान था कि क्या तुम सिर्फ़ ज़बान से शहादत की तमन्ना करते थे, या सच में उसके लिए जान कुर्बान करने के लिए तैयार थे। अल्लाह ने तुम्हें वह चीज़ दिखा दी जो तुम माँगते थे, ताकि तुम्हारी सच्चाई और ईमान की हक़ीक़त ज़ाहिर हो जाए।

फ़ायदे और सबक:

  1. अमल बिना ज़बान के दावे से बेहतर है: सिर्फ़ मौत की तमन्ना करना काफ़ी नहीं, बल्कि जब वह मौत सामने आए तो सब्र और जमाल (दृढ़ता) से काम लेना चाहिए। अल्लाह हमारे दिलों की नीयत को परखता है।
  2. तमन्ना में सच्चाई होनी चाहिए: अगर कोई शख्स शहादत या अच्छे काम की तमन्ना करता है, तो उसे चाहिए कि वह उसके लिए सच्ची तैयारी करे, क्योंकि अल्लाह उसे उसके हाल पर आज़माता है।
  3. मुसीबत में सब्र का इनाम: जो लोग जंग में डटे रहे और पीछे नहीं हटे, उनके लिए अल्लाह के पास बड़ा अज्र है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल वक़्त में ही ईमान की असली परख होती है।
  4. अल्लाह की राह में जान देने की फज़ीलत: यह आयत शहादत की अहमियत और उसके शरफ़ को बयान करती है, जो मुसलमानों को जांबाज़ी और कुर्बानी पर उभारती है।


📜 आयत 141-145 — आल-इमरान

141وَلِيُمَحِّصَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَيَمْحَقَ الْكَافِرِينَ
और ये (भी मंजूर था) कि सच्चे ईमानदारों को (साबित क़दमी की वजह से) निरा खरा अलग कर ले और नाफ़रमानों (भागने वालों) का मटियामेट कर दे
142أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَعْلَمِ اللَّهُ الَّذِينَ جَاهَدُوا مِنكُمْ وَيَعْلَمَ الصَّابِرِينَ
(मुसलमानों) क्या तुम ये समझते हो कि सब के सब बहिश्त में चले ही जाओगे और क्या ख़ुदा ने अभी तक तुममें से उन लोगों को भी नहीं पहचाना जिन्होंने जेहाद किया और न साबित क़दम रहने वालों को ही पहचाना
143وَلَقَدْ كُنتُمْ تَمَنَّوْنَ الْمَوْتَ مِن قَبْلِ أَن تَلْقَوْهُ فَقَدْ رَأَيْتُمُوهُ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ
तुम तो मौत के आने से पहले (लड़ाई में) मरने की तमन्ना करते थे बस अब तुमने उसको अपनी ऑख से देख लिया और तुम अब भी देख रहे हो
144وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِ الرُّسُلُ ۚ أَفَإِن مَّاتَ أَوْ قُتِلَ انقَلَبْتُمْ عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ ۚ وَمَن يَنقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ فَلَن يَضُرَّ اللَّهَ شَيْئًا ۗ وَسَيَجْزِي اللَّهُ الشَّاكِرِينَ
(फिर लड़ाई से जी क्यों चुराते हो) और मोहम्मद तो सिर्फ रसूल हैं (ख़ुदा नहीं) इनसे पहले बहुतेरे पैग़म्बर गुज़र चुके हैं फिर क्या अगर मोहम्मद अपनी मौत से मर जॉए या मार डाले जाएं तो तुम उलटे पॉव (अपने कुफ़्र की तरफ़) पलट जाओगे और जो उलटे पॉव फिरेगा (भी) तो (समझ लो) हरगिज़ ख़ुदा का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा और अनक़रीब ख़ुदा का शुक्र करने वालों को अच्छा बदला देगा
145وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَن تَمُوتَ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ كِتَابًا مُّؤَجَّلًا ۗ وَمَن يُرِدْ ثَوَابَ الدُّنْيَا نُؤْتِهِ مِنْهَا وَمَن يُرِدْ ثَوَابَ الْآخِرَةِ نُؤْتِهِ مِنْهَا ۚ وَسَنَجْزِي الشَّاكِرِينَ
और बगैर हुक्मे ख़ुदा के तो कोई शख्स मर ही नहीं सकता वक्ते मुअय्यन तक हर एक की मौत लिखी हुई है और जो शख्स (अपने किए का) बदला दुनिया में चाहे तो हम उसको इसमें से दे देते हैं और जो शख्स आख़ेरत का बदला चाहे उसे उसी में से देंगे और (नेअमत ईमान के) शुक्र करने वालों को बहुत जल्द हम जज़ाए खैर देंगे
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अनुवाद — आल-इमरान 143

सूरा आल-इमरान आयत 143 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : तुम तो मौत के आने से पहले (लड़ाई में) मरने…

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Tuesday, August 18, 2026

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