تَمَنَّوْنَ الْمَوْتَ: तुम मौत की कामना करते थे, यानी शहादत की तमन्ना रखते थे।
مِن قَبْلِ أَن تَلْقَوْهُ: इससे पहले कि तुम उसका सामना करते (यानी जंग और उसकी कठिनाइयों का सामना करने से पहले)।
فَقَدْ رَأَيْتُمُوهُ: तो तुमने उसे देख लिया, यानी उसका कारण और उसकी तैयारी को आँखों से देख लिया।
وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ: और तुम खुद उसे देख रहे थे, आँखों से साफ़-साफ़।
तफसीर (व्याख्या):
ऐ ईमानवालों! उहुद की जंग से पहले, जब तुमने बद्र के दिन अपने भाइयों को शहादत का शरफ़ और जन्नत का मुकाम हासिल करते देखा, तो तुममें से कुछ लोगों ने दिल से कामना की कि काश उन्हें भी मौत (शहादत) नसीब होती, ताकि वे भी उसी बुलंदी और इज़्ज़त को पा सकें। तुम लगातार यही तमन्ना करते रहे कि कोई ऐसा दिन आए जब तुम दुश्मन से भिड़ो और अल्लाह की राह में शहीद हो जाओ। फिर अल्लाह ने तुम्हारी इस तमन्ना को पूरा करने के लिए उहुद का दिन मुक़र्रर किया, और तुमने उस जंग का सामना किया। अब जब वह मौत (शहादत) तुम्हारे सामने आई, और तुमने उसके सबब (कारण) को अपनी आँखों से देख लिया — यानी जंग, तलवारें, तीर और दुश्मन की फ़ौजें — तो तुममें से कुछ लोग पीछे हट गए और जंग के मैदान से भाग खड़े हुए। यह तुम्हारे लिए एक इम्तिहान था कि क्या तुम सिर्फ़ ज़बान से शहादत की तमन्ना करते थे, या सच में उसके लिए जान कुर्बान करने के लिए तैयार थे। अल्लाह ने तुम्हें वह चीज़ दिखा दी जो तुम माँगते थे, ताकि तुम्हारी सच्चाई और ईमान की हक़ीक़त ज़ाहिर हो जाए।
फ़ायदे और सबक:
अमल बिना ज़बान के दावे से बेहतर है: सिर्फ़ मौत की तमन्ना करना काफ़ी नहीं, बल्कि जब वह मौत सामने आए तो सब्र और जमाल (दृढ़ता) से काम लेना चाहिए। अल्लाह हमारे दिलों की नीयत को परखता है।
तमन्ना में सच्चाई होनी चाहिए: अगर कोई शख्स शहादत या अच्छे काम की तमन्ना करता है, तो उसे चाहिए कि वह उसके लिए सच्ची तैयारी करे, क्योंकि अल्लाह उसे उसके हाल पर आज़माता है।
मुसीबत में सब्र का इनाम: जो लोग जंग में डटे रहे और पीछे नहीं हटे, उनके लिए अल्लाह के पास बड़ा अज्र है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल वक़्त में ही ईमान की असली परख होती है।
अल्लाह की राह में जान देने की फज़ीलत: यह आयत शहादत की अहमियत और उसके शरफ़ को बयान करती है, जो मुसलमानों को जांबाज़ी और कुर्बानी पर उभारती है।
(मुसलमानों) क्या तुम ये समझते हो कि सब के सब बहिश्त में चले ही जाओगे और क्या ख़ुदा ने अभी तक तुममें से उन लोगों को भी नहीं पहचाना जिन्होंने जेहाद किया और न साबित क़दम रहने वालों को ही पहचाना
(फिर लड़ाई से जी क्यों चुराते हो) और मोहम्मद तो सिर्फ रसूल हैं (ख़ुदा नहीं) इनसे पहले बहुतेरे पैग़म्बर गुज़र चुके हैं फिर क्या अगर मोहम्मद अपनी मौत से मर जॉए या मार डाले जाएं तो तुम उलटे पॉव (अपने कुफ़्र की तरफ़) पलट जाओगे और जो उलटे पॉव फिरेगा (भी) तो (समझ लो) हरगिज़ ख़ुदा का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा और अनक़रीब ख़ुदा का शुक्र करने वालों को अच्छा बदला देगा
और बगैर हुक्मे ख़ुदा के तो कोई शख्स मर ही नहीं सकता वक्ते मुअय्यन तक हर एक की मौत लिखी हुई है और जो शख्स (अपने किए का) बदला दुनिया में चाहे तो हम उसको इसमें से दे देते हैं और जो शख्स आख़ेरत का बदला चाहे उसे उसी में से देंगे और (नेअमत ईमान के) शुक्र करने वालों को बहुत जल्द हम जज़ाए खैर देंगे
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