आल-इमरान · 28/200
अनुवाद उच्चारण — सूरा आल-इमरान
لَّا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۖ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ فِي شَيْءٍ إِلَّا أَن تَتَّقُوا مِنْهُمْ تُقَاةً ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَإِلَى اللَّهِ الْمَصِيرُ ۝٢٨
Laa yattakhizil mu`minoonal kaafireena awliyaaa`a min doonil mu`mineena wa mai yaf`al zaalika falaisa minal laahi fee shai`in illaaa an tattaqoo minhum tuqaah; wa yuhazzirukumul laahu nafsah; wa ilal laahil maseer
📖 हिंदी अर्थ
मोमिनीन मोमिनीन को छोड़ के काफ़िरों को अपना सरपरस्त न बनाऐं और जो ऐसा करेगा तो उससे ख़ुदा से कुछ सरोकार नहीं मगर (इस क़िस्म की तदबीरों से) किसी तरह उन (के शर) से बचना चाहो तो (ख़ैर) और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَوْلِيَاءَ: मित्र, सहायक, संरक्षक।
  • مِن دُونِ: को छोड़कर, के अतिरिक्त।
  • تُقَاةً: डर या भय के कारण बचाव, यानी दुश्मन के नुकसान से बचने के लिए सतर्कता और सावधानी बरतना।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मोमिनों को स्पष्ट रूप से निर्देश देता है कि वे काफिरों को अपना मित्र, सहायक और संरक्षक न बनाएं, जबकि मोमिन भाई उनके बीच मौजूद हैं। मोमिनों को चाहिए कि वे आपस में ही एक-दूसरे के सहारे बनें, क्योंकि काफिर अल्लाह के दुश्मन हैं और उनसे दोस्ती रखना अल्लाह की दुश्मनी को अपनाना है। जो कोई भी ऐसा करेगा—यानी काफिरों को मोमिनों को छोड़कर अपना मित्र बनाएगा—वह अल्लाह के धर्म और उसकी सुरक्षा से बाहर हो जाएगा, और अल्लाह भी उससे बरी हो जाएगा।

हालाँकि, अल्लाह ने एक रियायत दी है: यदि मोमिन किसी ऐसी स्थिति में हों जहाँ उन्हें काफिरों के अत्याचार या नुकसान का डर हो, और वे कमज़ोर हों, तो उन्हें अनुमति है कि वे अपनी जान बचाने के लिए उनसे नरमी से पेश आएँ, मीठी बात करें, या दिखावे के लिए कुछ सहयोग दिखाएँ—लेकिन यह केवल ज़ाहिरी (बाहरी) होगा, दिल में उनकी दुश्मनी और नफरत बनी रहेगी। यह उनके नुकसान से बचने का एक उपाय है, जब तक कि मोमिनों की ताकत न बढ़ जाए।

फिर अल्लाह तआला मोमिनों को अपने गज़ब (प्रकोप) से डराता है और कहता है कि वह स्वयं उन्हें सावधान कर रहा है—यानी काफिरों की मोहब्बत और उनसे दोस्ती रखने से बचो, वरना अल्लाह का क्रोध भुगतना पड़ेगा। अंत में अल्लाह कहता है कि सबको एक दिन उसी की ओर लौटना है, और वहीं हर किसी को उसके कर्मों का बदला मिलेगा। यह एक और चेतावनी है कि इस दुनिया में काफिरों से दोस्ती करने का नतीजा आख़िरत में बहुत बुरा होगा।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. मोमिन की पहचान यह है कि वह अल्लाह और उसके दीन को सबसे ज़्यादा प्यार करता है, और इसी प्यार की बुनियाद पर वह अपने रिश्ते बनाता है। काफिरों से दोस्ती रखना इस प्यार के खिलाफ है।
  2. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि मुश्किल समय में भी हमें अपने ईमान और अल्लाह पर भरोसा नहीं छोड़ना चाहिए। अल्लाह ने ज़रूरत के वक़्त सतर्कता की इजाज़त दी है, लेकिन दिल हमेशा ईमान पर क़ायम रहना चाहिए।
  3. अल्लाह का डर ही वह चीज़ है जो इंसान को गलत रास्तों पर जाने से रोकती है। जब हमें यकीन हो कि अल्लाह हमें देख रहा है और हमें उसी के सामने जवाब देना है, तो हम अपने आपको गुनाहों से बचा सकते हैं।
  4. यह आयत मोमिनों को एकजुट रहने और आपसी भाईचारे की ताकत बढ़ाने की तरफ़ बुलाती है, ताकि वे किसी बाहरी ताकत के मोहताज न हों। इस्लाम हमें सिखाता है कि सच्ची इज़्ज़त और ताकत अल्लाह की राह में एकजुट होने में है।


📜 आयत 26-30 — सूरा आल-इमरान

26قُلِ اللَّهُمَّ مَالِكَ الْمُلْكِ تُؤْتِي الْمُلْكَ مَن تَشَاءُ وَتَنزِعُ الْمُلْكَ مِمَّن تَشَاءُ وَتُعِزُّ مَن تَشَاءُ وَتُذِلُّ مَن تَشَاءُ ۖ بِيَدِكَ الْخَيْرُ ۖ إِنَّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
(ऐ रसूल) तुम तो यह दुआ मॉगों कि ऐ ख़ुदा तमाम आलम के मालिक तू ही जिसको चाहे सल्तनत दे और जिससे चाहे सल्तनत छीन ले और तू ही जिसको चाहे इज्ज़त दे और जिसे चाहे ज़िल्लत दे हर तरह की भलाई तेरे ही हाथ में है बेशक तू ही हर चीज़ पर क़ादिर है
27تُولِجُ اللَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَتُولِجُ النَّهَارَ فِي اللَّيْلِ ۖ وَتُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَتُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ ۖ وَتَرْزُقُ مَن تَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ
तू ही रात को (बढ़ा के) दिन में दाख़िल कर देता है (तो) रात बढ़ जाती है और तू ही दिन को (बढ़ा के) रात में दाख़िल करता है (तो दिन बढ़ जाता है) तू ही बेजान (अन्डा नुत्फ़ा वगैरह) से जानदार को पैदा करता है और तू ही जानदार से बेजान नुत्फ़ा (वगैरहा) निकालता है और तू ही जिसको चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है
28لَّا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۖ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ فِي شَيْءٍ إِلَّا أَن تَتَّقُوا مِنْهُمْ تُقَاةً ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَإِلَى اللَّهِ الْمَصِيرُ
मोमिनीन मोमिनीन को छोड़ के काफ़िरों को अपना सरपरस्त न बनाऐं और जो ऐसा करेगा तो उससे ख़ुदा से कुछ सरोकार नहीं मगर (इस क़िस्म की तदबीरों से) किसी तरह उन (के शर) से बचना चाहो तो (ख़ैर) और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है
29قُلْ إِن تُخْفُوا مَا فِي صُدُورِكُمْ أَوْ تُبْدُوهُ يَعْلَمْهُ اللَّهُ ۗ وَيَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
ऐ रसूल तुम उन (लोगों से) कह दो किजो कुछ तुम्हारे दिलों में है तो ख्वाह उसे छिपाओ या ज़ाहिर करो (बहरहाल) ख़ुदा तो उसे जानता है और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में वह (सब कुछ) जानता है और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
30يَوْمَ تَجِدُ كُلُّ نَفْسٍ مَّا عَمِلَتْ مِنْ خَيْرٍ مُّحْضَرًا وَمَا عَمِلَتْ مِن سُوءٍ تَوَدُّ لَوْ أَنَّ بَيْنَهَا وَبَيْنَهُ أَمَدًا بَعِيدًا ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَاللَّهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ
(और उस दिन को याद रखो) जिस दिन हर शख्स जो कुछ उसने (दुनिया में) नेकी की है और जो कुछ बुराई की है उसको मौजूद पाएगा (और) आरज़ू करेगा कि काश उस की बदी और उसके दरमियान में ज़मानए दराज़ (हाएल) हो जाता और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा अपने बन्दों पर बड़ा शफ़ीक़ और (मेहरबान भी) है
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अनुवाद — आल-इमरान 28

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Monday, September 28, 2026

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