आल-इमरान · 29/200
अनुवाद उच्चारण — सूरा आल-इमरान
قُلْ إِن تُخْفُوا مَا فِي صُدُورِكُمْ أَوْ تُبْدُوهُ يَعْلَمْهُ اللَّهُ ۗ وَيَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ۝٢٩
Qul in tukhfoo maa fee sudoorikum aw tubdoohu ya`lamhul laah; wa ya`lamu maa fis samaawaati wa maa fil ard; wallaahu `alaa kulli shai`in Qadeer
📖 हिंदी अर्थ
ऐ रसूल तुम उन (लोगों से) कह दो किजो कुछ तुम्हारे दिलों में है तो ख्वाह उसे छिपाओ या ज़ाहिर करो (बहरहाल) ख़ुदा तो उसे जानता है और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में वह (सब कुछ) जानता है और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تُخْفُوا – छिपाओ, गुप्त रखो
  • صُدُورِكُمْ – तुम्हारे सीने, तुम्हारे दिल
  • تُبْدُوهُ – उसे प्रकट करो, ज़ाहिर करो
  • يَعْلَمْهُ – वह उसे जान लेगा
  • قَدِيرٌ – सर्वशक्तिमान, हर चीज़ पर पूर्ण सामर्थ्य रखने वाला

विस्तृत व्याख्या:

हे नबी! आप मुसलमानों से कह दीजिए कि चाहे तुम अपने दिलों की बातों को छिपाओ या उन्हें प्रकट करो, अल्लाह उन सबको खूब जानता है। यह आयत उस स्थिति के संदर्भ में उतरी जब कुछ मुसलमान अपने दिलों में काफिरों के प्रति मित्रता और सहानुभूति रखते थे, लेकिन उसे छिपाते थे। अल्लाह उन्हें चेतावनी दे रहा है कि उसके ज्ञान से कोई भी बात छिपी नहीं है—न वह जो सीने में दबी है, न वह जो ज़ुबान पर आती है।

अल्लाह का ज्ञान केवल इंसानों के दिलों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ को जानता है। कोई कण, कोई गति, कोई विचार, कोई इरादा—सब कुछ उसके ज्ञान के दायरे में है। जब वह पूरे ब्रह्मांड की हर छोटी-बड़ी चीज़ से अवगत है, तो उससे तुम्हारे दिलों की बातें कैसे छिप सकती हैं?

और अल्लाह हर चीज़ पर पूर्ण सामर्थ्य रखता है। उसकी शक्ति असीम है—वह चाहे तो तुम्हें तुम्हारे छिपे इरादों का बदला दे, चाहे तो माफ कर दे। उसकी कुदरत से कोई चीज़ बाहर नहीं है। इसलिए मोमिनों को चाहिए कि वे अपने दिलों को काफिरों की मुहब्बत से पाक रखें, क्योंकि अल्लाह के सामने दिल का हाल साफ़ है।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. अल्लाह का ज्ञान हर चीज़ पर छाया हुआ है – यह आयत हमें सिखाती है कि हमारे दिल की सबसे गहरी बातें भी अल्लाह से छिपी नहीं हैं। इसलिए हमें अपने विचारों और इरादों को भी पाक और सच्चा रखना चाहिए।
  2. दिल की पवित्रता ईमान का हिस्सा है – इस्लाम सिर्फ़ ज़ुबान और अमल का धर्म नहीं, बल्कि दिल की नीयत और भावनाओं का भी धर्म है। एक सच्चा मुसलमान वह है जो अपने दिल में भी अल्लाह की नाफ़रमानी से बचता है।
  3. अल्लाह की शक्ति पर भरोसा – जब हम जानते हैं कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है, तो हमें किसी इंसान से डरने या उसकी खुशामद करने की ज़रूरत नहीं। हमारा भरोसा सिर्फ़ अल्लाह पर होना चाहिए।
  4. मोमिनों की पहचान – यह आयत मुसलमानों को यह सिखाती है कि वे काफिरों से दिली मुहब्बत न रखें, क्योंकि यह ईमान के खिलाफ़ है। दिल की सफ़ाई ही असली कामयाबी है।
  5. जवाबदेही का एहसास – यह जानना कि अल्लाह हमारे हर विचार और इरादे को जानता है, हमें गुनाहों से दूर रखता है और नेक कामों की तरफ़ रागिब करता है। यह हमारे अंदर तक़वा (परहेज़गारी) पैदा करता है।


📜 आयत 27-31 — सूरा आल-इमरान

27تُولِجُ اللَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَتُولِجُ النَّهَارَ فِي اللَّيْلِ ۖ وَتُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَتُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ ۖ وَتَرْزُقُ مَن تَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ
तू ही रात को (बढ़ा के) दिन में दाख़िल कर देता है (तो) रात बढ़ जाती है और तू ही दिन को (बढ़ा के) रात में दाख़िल करता है (तो दिन बढ़ जाता है) तू ही बेजान (अन्डा नुत्फ़ा वगैरह) से जानदार को पैदा करता है और तू ही जानदार से बेजान नुत्फ़ा (वगैरहा) निकालता है और तू ही जिसको चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है
28لَّا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۖ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ فِي شَيْءٍ إِلَّا أَن تَتَّقُوا مِنْهُمْ تُقَاةً ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَإِلَى اللَّهِ الْمَصِيرُ
मोमिनीन मोमिनीन को छोड़ के काफ़िरों को अपना सरपरस्त न बनाऐं और जो ऐसा करेगा तो उससे ख़ुदा से कुछ सरोकार नहीं मगर (इस क़िस्म की तदबीरों से) किसी तरह उन (के शर) से बचना चाहो तो (ख़ैर) और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है
29قُلْ إِن تُخْفُوا مَا فِي صُدُورِكُمْ أَوْ تُبْدُوهُ يَعْلَمْهُ اللَّهُ ۗ وَيَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
ऐ रसूल तुम उन (लोगों से) कह दो किजो कुछ तुम्हारे दिलों में है तो ख्वाह उसे छिपाओ या ज़ाहिर करो (बहरहाल) ख़ुदा तो उसे जानता है और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में वह (सब कुछ) जानता है और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
30يَوْمَ تَجِدُ كُلُّ نَفْسٍ مَّا عَمِلَتْ مِنْ خَيْرٍ مُّحْضَرًا وَمَا عَمِلَتْ مِن سُوءٍ تَوَدُّ لَوْ أَنَّ بَيْنَهَا وَبَيْنَهُ أَمَدًا بَعِيدًا ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَاللَّهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ
(और उस दिन को याद रखो) जिस दिन हर शख्स जो कुछ उसने (दुनिया में) नेकी की है और जो कुछ बुराई की है उसको मौजूद पाएगा (और) आरज़ू करेगा कि काश उस की बदी और उसके दरमियान में ज़मानए दराज़ (हाएल) हो जाता और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा अपने बन्दों पर बड़ा शफ़ीक़ और (मेहरबान भी) है
31قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
(ऐ रसूल) उन लोगों से कह दो कि अगर तुम ख़ुदा को दोस्त रखते हो तो मेरी पैरवी करो कि ख़ुदा (भी) तुमको दोस्त रखेगा और तुमको तुम्हारे गुनाह बख्श देगा और खुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
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अनुवाद — आल-इमरान 29

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Wednesday, September 30, 2026

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