आल-इमरान · 27/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
تُولِجُ اللَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَتُولِجُ النَّهَارَ فِي اللَّيْلِ ۖ وَتُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَتُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ ۖ وَتَرْزُقُ مَن تَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ ۝٢٧
Toolijul laila fin nahaari wa toolijun nahaara fil laili wa tukhrijul haiya minalmaiyiti wa tukhrijulo maiyita minal haiyi wa tarzuqu man tashaaa`u bighari hisab
📖 हिंदी अर्थ
तू ही रात को (बढ़ा के) दिन में दाख़िल कर देता है (तो) रात बढ़ जाती है और तू ही दिन को (बढ़ा के) रात में दाख़िल करता है (तो दिन बढ़ जाता है) तू ही बेजान (अन्डा नुत्फ़ा वगैरह) से जानदार को पैदा करता है और तू ही जानदार से बेजान नुत्फ़ा (वगैरहा) निकालता है और तू ही जिसको चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تُولِجُ: तुम दाखिल करते हो, प्रवेश कराते हो।
  • الْحَيَّ: जीवित को।
  • الْمَيِّتِ: मृत को।
  • بِغَيْرِ حِسَابٍ: बिना किसी हिसाब-किताब के, अर्थात असीमित और बिना किसी रोक-टोक के।

व्याख्या:

यह आयत अल्लाह तआला की असीम शक्ति और कुदरत के अद्भुत नमूनों को बयान करती है। अल्लाह ही है जो रात को दिन में दाखिल करता है और दिन को रात में दाखिल करता है। इसका अर्थ यह है कि वह दिन और रात की अवधि को घटाता-बढ़ाता है; जब दिन लंबा होता है तो रात छोटी हो जाती है, और जब रात लंबी होती है तो दिन छोटा हो जाता है। यह बदलाव ऋतुओं के अनुसार लगातार होता रहता है, जो अल्लाह की पूर्ण योजना और प्रबंधन को दर्शाता है।

इसी प्रकार, अल्लाह जीवित को मृत से निकालता है, जैसे बीज से पौधा, अंडे से चूज़ा, और अंधेरे कब्र जैसे स्थानों से जीवन का प्रकट होना। वह मृत को जीवित से भी निकालता है, जैसे मुर्गी से अंडा, पेड़ से बीज, और एक इंसान से निर्जीव वस्तुओं का उत्पन्न होना। यहाँ एक और उदाहरण दिया गया है कि ईमानवाला (मोमिन) काफ़िर से पैदा होता है और काफ़िर मोमिन से, जो अल्लाह की इच्छा और कुदरत के आगे सब कुछ समर्पित है।

अंत में, अल्लाह कहता है कि वह जिसे चाहता है, बिना किसी हिसाब के रिज़्क़ (आजीविका) प्रदान करता है। यानी उसकी देन ऐसी है जिसे कोई सीमा या गणना में नहीं बाँध सकता; वह जिसे चाहता है, अपार और असीमित रूप से देता है, बिना किसी शर्त या प्रयास के।

फ़ायदे:

  1. यह आयत अल्लाह की कुदरत और उसके नियंत्रण पर गहरा ईमान लाने की तरफ़ ले जाती है। जो व्यक्ति दिन-रात के इस बदलाव और जीवन-मृत्यु के चक्र को देखता है, उसका दिल अल्लाह की अज़मत के सामने झुक जाता है।
  2. इससे यह सीख मिलती है कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है; वह विपरीत चीज़ों को भी एक-दूसरे से पैदा कर सकता है। यह हमें सिखाता है कि कभी निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि अल्लाह मुश्किल से आसान, ग़म से ख़ुशी और मौत के बाद ज़िंदगी पैदा कर सकता है।
  3. रिज़्क़ में बिना हिसाब के देने का ज़िक्र हमें सिखाता है कि रिज़्क़ अल्लाह के हाथ में है, और उसकी देन किसी के प्रयास या योग्यता पर निर्भर नहीं, बल्कि उसकी मर्ज़ी पर है। इससे इंसान का भरोसा अल्लाह पर मज़बूत होता है और वह लालच, ईर्ष्या और दूसरों के पास देखकर जलने से बचता है।
  4. यह आयत मुसलमान को हर हाल में अल्लाह की तारीफ़ और उसके प्रति कृतज्ञता का पाठ पढ़ाती है, क्योंकि उसकी नेमतें और कुदरत के नमूने हर पल हमारे सामने हैं।


📜 आयत 25-29 — आल-इमरान

25فَكَيْفَ إِذَا جَمَعْنَاهُمْ لِيَوْمٍ لَّا رَيْبَ فِيهِ وَوُفِّيَتْ كُلُّ نَفْسٍ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
फ़िर उनकी क्या गत होगी जब हम उनको एक दिन (क़यामत) जिसके आने में कोई शुबहा नहीं इक्ट्ठा करेंगे और हर शख्स को उसके किए का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा और उनकी किसी तरह हक़तल्फ़ी नहीं की जाएगी
26قُلِ اللَّهُمَّ مَالِكَ الْمُلْكِ تُؤْتِي الْمُلْكَ مَن تَشَاءُ وَتَنزِعُ الْمُلْكَ مِمَّن تَشَاءُ وَتُعِزُّ مَن تَشَاءُ وَتُذِلُّ مَن تَشَاءُ ۖ بِيَدِكَ الْخَيْرُ ۖ إِنَّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
(ऐ रसूल) तुम तो यह दुआ मॉगों कि ऐ ख़ुदा तमाम आलम के मालिक तू ही जिसको चाहे सल्तनत दे और जिससे चाहे सल्तनत छीन ले और तू ही जिसको चाहे इज्ज़त दे और जिसे चाहे ज़िल्लत दे हर तरह की भलाई तेरे ही हाथ में है बेशक तू ही हर चीज़ पर क़ादिर है
27تُولِجُ اللَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَتُولِجُ النَّهَارَ فِي اللَّيْلِ ۖ وَتُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَتُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ ۖ وَتَرْزُقُ مَن تَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ
तू ही रात को (बढ़ा के) दिन में दाख़िल कर देता है (तो) रात बढ़ जाती है और तू ही दिन को (बढ़ा के) रात में दाख़िल करता है (तो दिन बढ़ जाता है) तू ही बेजान (अन्डा नुत्फ़ा वगैरह) से जानदार को पैदा करता है और तू ही जानदार से बेजान नुत्फ़ा (वगैरहा) निकालता है और तू ही जिसको चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है
28لَّا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۖ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ فِي شَيْءٍ إِلَّا أَن تَتَّقُوا مِنْهُمْ تُقَاةً ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَإِلَى اللَّهِ الْمَصِيرُ
मोमिनीन मोमिनीन को छोड़ के काफ़िरों को अपना सरपरस्त न बनाऐं और जो ऐसा करेगा तो उससे ख़ुदा से कुछ सरोकार नहीं मगर (इस क़िस्म की तदबीरों से) किसी तरह उन (के शर) से बचना चाहो तो (ख़ैर) और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है
29قُلْ إِن تُخْفُوا مَا فِي صُدُورِكُمْ أَوْ تُبْدُوهُ يَعْلَمْهُ اللَّهُ ۗ وَيَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
ऐ रसूल तुम उन (लोगों से) कह दो किजो कुछ तुम्हारे दिलों में है तो ख्वाह उसे छिपाओ या ज़ाहिर करो (बहरहाल) ख़ुदा तो उसे जानता है और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में वह (सब कुछ) जानता है और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
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अनुवाद — आल-इमरान 27

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Tuesday, August 18, 2026

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