सबा · 21/54
अनुवाद उच्चारण — सबा
وَمَا كَانَ لَهُ عَلَيْهِم مِّن سُلْطَانٍ إِلَّا لِنَعْلَمَ مَن يُؤْمِنُ بِالْآخِرَةِ مِمَّنْ هُوَ مِنْهَا فِي شَكٍّ ۗ وَرَبُّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ حَفِيظٌ ۝٢١
Wa maa kaana lahoo `alaihim min sultaanin illaa lina`lama mai yu minu bil Aakhirati mimman huwa minhaa fee shakk; wa Rabbuka `alaa kulli shai`in Hafeez
📖 हिंदी अर्थ
और शैतान का उन लोगों पर कुछ क़ाबू तो था नहीं मगर ये (मतलब था) कि हम उन लोगों को जो आख़ेरत का यक़ीन रखते हैं उन लोगों से अलग देख लें जो उसके बारे में शक में (पड़े) हैं और तुम्हारा परवरदिगार तो हर चीज़ का निगरॉ है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • सुल्तान: अधिकार, प्रभुत्व, शक्ति
  • लि-न'अलम: ताकि हम जान लें (अर्थात, ताकि प्रकट हो जाए)
  • शक्क: संदेह, भ्रम
  • हफ़ीज़: रक्षक, देखभाल करने वाला, निगरानी रखने वाला

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला हमें बताता है कि शैतान (इब्लीस) का उन लोगों पर कोई वास्तविक अधिकार या ताक़त नहीं थी जिससे वह उन्हें ज़बरदस्ती कुफ़्र और गुमराही की ओर धकेल सके। शैतान के पास सिर्फ़ वसवसा (बुरे ख़यालात) डालने और बहकाने की कोशिश करने की इजाज़त थी, लेकिन उसे यह शक्ति कभी नहीं दी गई कि वह किसी को मजबूर कर दे।

अल्लाह ने शैतान को इंसानों को बहकाने की आज़माइश के तौर पर छोड़ रखा है, ताकि यह साफ़ हो जाए कि कौन सच्चे दिल से आख़िरत (क़यामत के दिन) पर ईमान रखता है और कौन उसके बारे में संदेह में पड़ा हुआ है। यह एक इम्तिहान है — जो लोग अपने ईमान में पक्के हैं, वे शैतान के बहकावे के बावजूद अल्लाह की राह पर क़ायम रहते हैं, और जिनके दिलों में आख़िरत के बारे में शक है, वे उसकी बातों में आकर गुमराह हो जाते हैं।

यानी शैतान सिर्फ़ एक वसीला (ज़रिया) है जिससे अल्लाह लोगों के दिलों की हालत ज़ाहिर करता है — कौन सच्चा मोमिन है और कौन शक्की। यह अल्लाह की हिकमत (बुद्धिमत्ता) का हिस्सा है कि ईमान और कुफ़्र की असली हक़ीक़त सामने आ जाए।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: "और तेरा रब हर चीज़ पर हफ़ीज़ है" — यानी अल्लाह हर चीज़ की निगरानी कर रहा है, वह हर इंसान के अमल (कर्म) को देख रहा है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। वह सब कुछ अपने हिफ़्ज़ (संरक्षण) में रखता है और हर किसी को उसके कर्मों का पूरा बदला देगा।

यह आयत हमें सिखाती है कि शैतान से डरने की ज़रूरत नहीं, बल्कि अल्लाह से डरना चाहिए। शैतान की कोई असली ताक़त नहीं, वह सिर्फ़ वसवसा डालता है। असली ताक़त तो अल्लाह के हाथ में है। जो लोग अल्लाह पर भरोसा करते हैं और अपने ईमान में मज़बूत रहते हैं, उन पर शैतान का कोई असर नहीं हो सकता।

और यह भी याद रखें कि अल्लाह हर चीज़ का हाफ़िज़ है — वह हमारे हर अच्छे और बुरे काम को देख रहा है, और क़यामत के दिन हमें उसका पूरा हिसाब देना होगा। यही सच्चा ईमान है — आख़िरत पर यक़ीन रखना और यह जानना कि अल्लाह की निगरानी हर वक़्त हम पर है। यही ईमान इंसान को गुनाहों से बचाता है और नेक राह पर चलने की तौफ़ीक़ देता है।



📜 आयत 19-23 — सबा

19فَقَالُوا رَبَّنَا بَاعِدْ بَيْنَ أَسْفَارِنَا وَظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ فَجَعَلْنَاهُمْ أَحَادِيثَ وَمَزَّقْنَاهُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ
तो वह लोग ख़ुद कहने लगे परवरदिगार (क़रीब के सफर में लुत्फ नहीं) तो हमारे सफ़रों में दूरी पैदा कर दे और उन लोगों ने खुद अपने ऊपर ज़ुल्म किया तो हमने भी उनको (तबाह करके उनके) अफसाने बना दिए - और उनकी धज्जियाँ उड़ा के उनको तितिर बितिर कर दिया बेशक उनमें हर सब्र व शुक्र करने वालोंके वास्ते बड़ी इबरते हैं
20وَلَقَدْ صَدَّقَ عَلَيْهِمْ إِبْلِيسُ ظَنَّهُ فَاتَّبَعُوهُ إِلَّا فَرِيقًا مِّنَ الْمُؤْمِنِينَ
और शैतान ने अपने ख्याल को (जो उनके बारे में किया था) सच कर दिखाया तो उन लोगों ने उसकी पैरवी की मगर ईमानवालों का एक गिरोह (न भटका)
21وَمَا كَانَ لَهُ عَلَيْهِم مِّن سُلْطَانٍ إِلَّا لِنَعْلَمَ مَن يُؤْمِنُ بِالْآخِرَةِ مِمَّنْ هُوَ مِنْهَا فِي شَكٍّ ۗ وَرَبُّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ حَفِيظٌ
और शैतान का उन लोगों पर कुछ क़ाबू तो था नहीं मगर ये (मतलब था) कि हम उन लोगों को जो आख़ेरत का यक़ीन रखते हैं उन लोगों से अलग देख लें जो उसके बारे में शक में (पड़े) हैं और तुम्हारा परवरदिगार तो हर चीज़ का निगरॉ है
22قُلِ ادْعُوا الَّذِينَ زَعَمْتُم مِّن دُونِ اللَّهِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ وَمَا لَهُمْ فِيهِمَا مِن شِرْكٍ وَمَا لَهُ مِنْهُم مِّن ظَهِيرٍ
(ऐ रसूल इनसे) कह दो कि जिन लोगों को तुम खुद ख़ुदा के सिवा (माबूद) समझते हो पुकारो (तो मालूम हो जाएगा कि) वह लोग ज़र्रा बराबर न आसमानों में कुछ इख़तेयार रखते हैं और न ज़मीन में और न उनकी उन दोनों में शिरकत है और न उनमें से कोई खुदा का (किसी चीज़ में) मद्दगार है
23وَلَا تَنفَعُ الشَّفَاعَةُ عِندَهُ إِلَّا لِمَنْ أَذِنَ لَهُ ۚ حَتَّىٰ إِذَا فُزِّعَ عَن قُلُوبِهِمْ قَالُوا مَاذَا قَالَ رَبُّكُمْ ۖ قَالُوا الْحَقَّ ۖ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ
जिसके लिए वह खुद इजाज़त अता फ़रमाए उसके सिवा कोई सिफारिश उसकी बारगाह में काम न आएगी (उसके दरबार की हैबत) यहाँ तक (है) कि जब (शिफ़ाअत का) हुक्म होता है तो शिफ़ाअत करने वाले बेहोश हो जाते हैं फिर तब उनके दिलों की घबराहट दूर कर दी जाती है तो पूछते हैं कि तुम्हारे परवरदिगार ने क्या हुक्म दिया
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अनुवाद — सबा 21

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Tuesday, August 18, 2026

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