अज़-ज़ुमर · 54/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
وَأَنِيبُوا إِلَىٰ رَبِّكُمْ وَأَسْلِمُوا لَهُ مِن قَبْلِ أَن يَأْتِيَكُمُ الْعَذَابُ ثُمَّ لَا تُنصَرُونَ ۝٥٤
Wa aneebooo ilaa Rabbikum wa aslimoo lahoo min qabli ai yaatiyakumul `azaabu summ laa tunsaroon
📖 हिंदी अर्थ
और अपने परवरदिगार की तरफ रूजू करो और उसी के फरमाबरदार बन जाओ (मगर) उस वक्त क़े क़ब्ल ही कि तुम पर जब अज़ाब आ नाज़िल हो (और) फिर तुम्हारी मदद न की जा सके

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अनीबू (وَأَنِيبُوا): रुजू होना, लौटना, तौबा करके अल्लाह की ओर झुकना।
  • अस्लिमू (وَأَسْلِمُوا): आत्मसमर्पण करना, अपने आप को अल्लाह के हवाले कर देना, उसकी आज्ञा के आगे सर झुका देना।
  • अज़ाब (الْعَذَابُ): यातना, दंड, अल्लाह की तरफ से आने वाली सज़ा।
  • ला तुन्सरून (لَا تُنصَرُونَ): तुम्हें कोई मदद नहीं मिलेगी, कोई तुम्हें बचाने वाला नहीं होगा।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ लोगों! अपने रब की ओर लौट आओ। अपने गुनाहों पर नादिम होकर, दिल से तौबा करते हुए उसकी तरफ रुजू हो जाओ। और उसके सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दो—अपने आप को, अपनी इच्छाओं को, अपने कामों को उसकी रज़ा के हवाले कर दो। उसकी इबादत को खालिस कर दो, सिर्फ उसी के लिए। यह काम उस वक़्त से पहले कर लो, जब अज़ाब आ जाए—चाहे वह दुनिया में आने वाली मुसीबत हो या आख़िरत का अज़ाब। क्योंकि जब अज़ाब आ जाएगा, तो फिर कोई मददगार नहीं होगा। न तुम्हारे बुत, न तुम्हारे रिश्तेदार, न तुम्हारे साथी—कोई भी तुम्हें अल्लाह की पकड़ से नहीं बचा सकेगा।

याद रखो, अल्लाह का दरवाज़ा हमेशा खुला है। वह रहमत वाला है, माफ़ करने वाला है। जब तक साँसें चल रही हैं, तौबा का मौक़ा मौजूद है। लेकिन यह मौक़ा हमेशा नहीं रहेगा। जिस दिन फ़ैसला हो जाएगा, उस दिन न तो तौबा क़ुबूल होगी और न ही कोई सिफ़ारिश काम आएगी।

तो आज ही, इसी पल, अपने रब की तरफ पलटो। उसकी रहमत की तरफ दौड़ो। वह तुम्हारे गुनाह माफ़ करने को तैयार है। उसकी मोहब्बत और मग़फिरत का दरवाज़ा तुम्हारे लिए खुला है। बस एक क़दम उठाओ—तौबा की तरफ, अल्लाह की तरफ। यही तुम्हारी कामयाबी है, यही तुम्हारी नजात है।



📜 आयत 52-56 — अज़-ज़ुमर

52أَوَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
क्या उन लोगों को इतनी बात भी मालूम नहीं कि ख़ुदा ही जिसके लिए चाहता है रोज़ी फराख़ करता है और (जिसके लिए चाहता है) तंग करता है इसमें शक नहीं कि क्या इसमें ईमानदार लोगों के (कुदरत की) बहुत सी निशानियाँ हैं
53۞ قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعًا ۚ إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ मेरे (ईमानदार) बन्दों जिन्होने (गुनाह करके) अपनी जानों पर ज्यादतियाँ की हैं तुम लोग ख़ुदा की रहमत से नाउम्मीद न होना बेशक ख़ुदा (तुम्हारे) कुल गुनाहों को बख्श देगा वह बेशक बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
54وَأَنِيبُوا إِلَىٰ رَبِّكُمْ وَأَسْلِمُوا لَهُ مِن قَبْلِ أَن يَأْتِيَكُمُ الْعَذَابُ ثُمَّ لَا تُنصَرُونَ
और अपने परवरदिगार की तरफ रूजू करो और उसी के फरमाबरदार बन जाओ (मगर) उस वक्त क़े क़ब्ल ही कि तुम पर जब अज़ाब आ नाज़िल हो (और) फिर तुम्हारी मदद न की जा सके
55وَاتَّبِعُوا أَحْسَنَ مَا أُنزِلَ إِلَيْكُم مِّن رَّبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَكُمُ الْعَذَابُ بَغْتَةً وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ
और जो जो अच्छी बातें तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर नाज़िल हई हैं उन पर चलो (मगर) उसके क़ब्ल कि तुम पर एक बारगी अज़ाब नाज़िल हो और तुमको उसकी ख़बर भी न हो
56أَن تَقُولَ نَفْسٌ يَا حَسْرَتَا عَلَىٰ مَا فَرَّطتُ فِي جَنبِ اللَّهِ وَإِن كُنتُ لَمِنَ السَّاخِرِينَ
(कहीं ऐसा न हो कि) (तुममें से) कोई शख्स कहने लगे कि हाए अफ़सोस मेरी इस कोताही पर जो मैने ख़ुदा (की बारगाह) का तक़र्रुब हासिल करने में की और मैं तो बस उन बातों पर हँसता ही रहा
अज़-ज़ुमरकुरान सूची
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मक्कीRevelation
54आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुमर 54

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Tuesday, August 18, 2026

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