अज़-ज़ुमर · 55/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
وَاتَّبِعُوا أَحْسَنَ مَا أُنزِلَ إِلَيْكُم مِّن رَّبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَكُمُ الْعَذَابُ بَغْتَةً وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ ۝٥٥
Wattabi`ooo ahsana maaa unzila ilaikum mir Rabbikum min qabli aiyaatiyakumal `azaabu baghtatanw wa antum laa tash`uroon
📖 हिंदी अर्थ
और जो जो अच्छी बातें तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर नाज़िल हई हैं उन पर चलो (मगर) उसके क़ब्ल कि तुम पर एक बारगी अज़ाब नाज़िल हो और तुमको उसकी ख़बर भी न हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अहसन – सबसे अच्छा, सबसे उत्तम
  • उन्ज़िला – उतारा गया
  • बग़तन – अचानक, एकाएक
  • ला तश'उरून – तुम्हें इसका एहसास भी नहीं होगा

तफ़सीर:

अल्लाह तआला अपने बंदों से बड़ी ही मुहब्बत और शफ़्क़त के साथ फ़रमा रहा है कि उस चीज़ की पैरवी करो जो तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास उतारी गई है, और वह है यह क़ुरआन-ए-करीम। यह क़ुरआन ही वह बेहतरीन किताब है जो अल्लाह ने अपने रसूल ﷺ पर नाज़िल की है। इसकी हर बात भलाई और हिदायत से भरी हुई है। इसलिए इसके हुक्मों पर अमल करो और इसकी मना की हुई चीज़ों से बचो।

यह पैरवी और अमल उस वक़्त से पहले कर लो, जब तक तुम्हारे पास अज़ाब न आ जाए। क्योंकि अल्लाह का अज़ाब जब आता है तो अचानक आता है, बग़ैर किसी पेशीनगी के। लोग अपने दुनियावी कामों और मशग़लियों में ऐसे डूबे होते हैं कि उन्हें इसका ज़रा भी एहसास नहीं होता कि अज़ाब कब आ जाएगा। जब वह आ जाता है, तो न तो तौबा का मौक़ा मिलता है और न ही कोई मदद पहुँचती है।

यह आयत हमें बड़ी अहम नसीहत देती है कि हमें क़ुरआन को सिर्फ़ पढ़ने और सजाने तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उस पर अमल करना चाहिए। क़ुरआन की तालीमात ही वह रास्ता है जो हमें दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई तक पहुँचाती है। जो शख्स क़ुरआन की पैरवी करता है, वह कभी गुमराह नहीं हो सकता और न ही उसे किसी बुराई का डर होता है।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह मौक़ा हमारे पास आज है, कल का हमें कोई भरोसा नहीं। मौत और अज़ाब का वक़्त किसी को मालूम नहीं। इसलिए आज ही अपनी ज़िंदगी को क़ुरआन के नियमों के मुताबिक ढाल लें। क़ुरआन की हर आयत हमारे लिए रहनुमा है, हर हुक्म हमारी भलाई के लिए है। अल्लाह तआला ने क़ुरआन को "अहसन" (सबसे अच्छा) कहकर यह बताया है कि इससे बेहतर कोई रास्ता, कोई ज़िंदगी का तरीक़ा और कोई हिदायत नहीं है।

अल्लाह से दुआ है कि वह हमें क़ुरआन को समझने, उस पर अमल करने और उसे अपनी ज़िंदगी में नफ़ाज़ देने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 53-57 — अज़-ज़ुमर

53۞ قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعًا ۚ إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ मेरे (ईमानदार) बन्दों जिन्होने (गुनाह करके) अपनी जानों पर ज्यादतियाँ की हैं तुम लोग ख़ुदा की रहमत से नाउम्मीद न होना बेशक ख़ुदा (तुम्हारे) कुल गुनाहों को बख्श देगा वह बेशक बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
54وَأَنِيبُوا إِلَىٰ رَبِّكُمْ وَأَسْلِمُوا لَهُ مِن قَبْلِ أَن يَأْتِيَكُمُ الْعَذَابُ ثُمَّ لَا تُنصَرُونَ
और अपने परवरदिगार की तरफ रूजू करो और उसी के फरमाबरदार बन जाओ (मगर) उस वक्त क़े क़ब्ल ही कि तुम पर जब अज़ाब आ नाज़िल हो (और) फिर तुम्हारी मदद न की जा सके
55وَاتَّبِعُوا أَحْسَنَ مَا أُنزِلَ إِلَيْكُم مِّن رَّبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَكُمُ الْعَذَابُ بَغْتَةً وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ
और जो जो अच्छी बातें तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर नाज़िल हई हैं उन पर चलो (मगर) उसके क़ब्ल कि तुम पर एक बारगी अज़ाब नाज़िल हो और तुमको उसकी ख़बर भी न हो
56أَن تَقُولَ نَفْسٌ يَا حَسْرَتَا عَلَىٰ مَا فَرَّطتُ فِي جَنبِ اللَّهِ وَإِن كُنتُ لَمِنَ السَّاخِرِينَ
(कहीं ऐसा न हो कि) (तुममें से) कोई शख्स कहने लगे कि हाए अफ़सोस मेरी इस कोताही पर जो मैने ख़ुदा (की बारगाह) का तक़र्रुब हासिल करने में की और मैं तो बस उन बातों पर हँसता ही रहा
57أَوْ تَقُولَ لَوْ أَنَّ اللَّهَ هَدَانِي لَكُنتُ مِنَ الْمُتَّقِينَ
या ये कहने लगे कि अगर ख़ुदा मेरी हिदायत करता तो मैं ज़रूर परहेज़गारों में से होता
अज़-ज़ुमरकुरान सूची
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अनुवाद — अज़-ज़ुमर 55

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Tuesday, August 18, 2026

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