अज़-ज़ुखरुफ · 54/89
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुखरुफ
فَاسْتَخَفَّ قَوْمَهُ فَأَطَاعُوهُ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا فَاسِقِينَ ۝٥٤
Fastakhaffa qawmahoo fa ataa`ooh; innahum kaanoo qawman faasiqeen
📖 हिंदी अर्थ
ग़रज़ फिरऔन ने (बातें बनाकर) अपनी क़ौम की अक़ल मार दी और वह लोग उसके ताबेदार बन गये बेशक वह लोग बदकार थे ही

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَاسْتَخَفَّ – उन्हें हल्का (कमज़ोर) समझा, उनकी अक़्लों को हल्का किया, यानी उन्हें अपने वश में कर लिया।
  • فَأَطَاعُوهُ – तो उन्होंने उसकी बात मान ली।
  • فَاسِقِينَ – आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, अल्लाह की राह से निकल जाने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला फ़िरऔन के हाल का ज़िक्र कर रहे हैं। फ़िरऔन ने अपनी क़ौम को हल्का समझा और उनकी अक़्लों को इस तरह अपने क़ाबू में किया कि उन्होंने उसकी हर बात मान ली। उसने उन्हें गुमराही की तरफ़ बुलाया और वे उसके पीछे-पीछे चल पड़े, यहाँ तक कि उन्होंने मूसा (अलैहिस्सलाम) की सच्ची दावत को भी झुठला दिया।

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि यह सब इसलिए हुआ क्योंकि वे लोग फ़ासिक़ थे, यानी अल्लाह की आज्ञा से निकल चुके थे और सीधी राह पर चलने वाले नहीं थे। जब दिलों में अल्लाह का डर नहीं होता और नफ़्स की ख़्वाहिशें हावी हो जाती हैं, तो इंसान किसी भी गुमराह की बात मान लेता है, चाहे वह कितनी ही बुरी क्यों न हो।

यह आयत हमारे लिए एक बड़ी सबक़ है। यह बताती है कि जो लोग अल्लाह से दूर हो जाते हैं और अपने दीन को कमज़ोर समझते हैं, वे किसी भी झूठे नेता या गुमराह करने वाले के पीछे चल पड़ते हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने ईमान को मज़बूत रखें, अल्लाह की किताब और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत को अपना रहनुमा बनाएँ, और किसी भी ऐसे इंसान की बात न मानें जो हमें अल्लाह की राह से भटकाना चाहे।

याद रखिए, सच्ची इज़्ज़त और कामयाबी अल्लाह की आज्ञा मानने में है, न कि किसी इंसान की अंधी पैरवी में। अल्लाह तआला हमें सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 52-56 — सूरा अज़-ज़ुखरुफ

52أَمْ أَنَا خَيْرٌ مِّنْ هَٰذَا الَّذِي هُوَ مَهِينٌ وَلَا يَكَادُ يُبِينُ
या (सूझता है कि) मैं इस शख़्श (मूसा) से जो एक ज़लील आदमी है और (हकले पन की वजह से) साफ़ गुफ्तगू भी नहीं कर सकता
53فَلَوْلَا أُلْقِيَ عَلَيْهِ أَسْوِرَةٌ مِّن ذَهَبٍ أَوْ جَاءَ مَعَهُ الْمَلَائِكَةُ مُقْتَرِنِينَ
कहीं बहुत बेहतर हूँ (अगर ये बेहतर है तो इसके लिए सोने के कंगन) (ख़ुदा के हॉ से) क्यों नहीं उतारे गये या उसके साथ फ़रिश्ते जमा होकर आते
54فَاسْتَخَفَّ قَوْمَهُ فَأَطَاعُوهُ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا فَاسِقِينَ
ग़रज़ फिरऔन ने (बातें बनाकर) अपनी क़ौम की अक़ल मार दी और वह लोग उसके ताबेदार बन गये बेशक वह लोग बदकार थे ही
55فَلَمَّا آسَفُونَا انتَقَمْنَا مِنْهُمْ فَأَغْرَقْنَاهُمْ أَجْمَعِينَ
ग़रज़ जब उन लोगों ने हमको झुझंला दिया तो हमने भी उनसे बदला लिया तो हमने उन सब (के सब) को डुबो दिया
56فَجَعَلْنَاهُمْ سَلَفًا وَمَثَلًا لِّلْآخِرِينَ
फिर हमने उनको गया गुज़रा और पिछलों के वास्ते इबरत बना दिया
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीअवतरण स्थान
54आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 54

सूरा अज़-ज़ुखरुफ आयत 54 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : ग़रज़ फिरऔन ने (बातें बनाकर) अपनी क़ौम की अक़ल मार…

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Saturday, October 3, 2026

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