Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- أَسْوِرَةٌ (अस्विरह): सोने के कंगन (कड़े), जो उस समय के रिवाज के अनुसार किसी को सम्मानित या प्रमुख बनाने के लिए पहनाए जाते थे।
- مُقْتَرِنِينَ (मुक्तरिनीन): एक के पीछे एक आते हुए, लगातार, जोड़े बनाकर या एक साथ मिलकर।
तफसीर (व्याख्या):
यह आयत उस समय के काफिरों और मक्का के मुशरिकों की उस बात का उत्तर है, जो उन्होंने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के बारे में कही थी। जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने फिरौन और उसकी कौम के सामने अपनी रिसालत (पैग़म्बरी) का दावा पेश किया और उन्हें अल्लाह की तौहीद की तरफ बुलाया, तो फिरौन ने अपनी कौम को भड़काते हुए कहा कि अगर मूसा सच में अल्लाह का भेजा हुआ रसूल है, तो उस पर सोने के कंगन क्यों नहीं डाले गए? यानी उसे सोने के ज़ेवरात और शाही ठाठ-बाठ क्यों नहीं दिए गए? और उसके साथ फ़रिश्ते क्यों नहीं आए जो उसकी सच्चाई की गवाही देते?
अल्लाह तआला ने इस आयत में फिरौन की इस बात को बयान किया है कि उसने कहा: "क्यों नहीं डाले गए उस (मूसा) पर सोने के कंगन, या क्यों नहीं आए उसके साथ फ़रिश्ते एक साथ (लगातार)?"
यह फिरौन की सोच थी, जो दुनियावी शान-ओ-शौकत और दिखावे पर आधारित थी। उसका ख़याल था कि अगर कोई अल्लाह का रसूल होता, तो उसे दुनिया की दौलत और फ़रिश्तों की मौजूदगी से नवाज़ा जाता। लेकिन अल्लाह तआला की सुन्नत (रीति) यह नहीं है। अल्लाह अपने रसूलों को दुनियावी दौलत और दिखावे से नहीं भेजता, बल्कि उन्हें सच्चाई, हिकमत (समझदारी) और मोजिज़ों (चमत्कारों) के साथ भेजता है, ताकि लोग उनकी बात को समझें और उनके पैग़ाम को क़बूल करें।
फिरौन की यह बात उसकी जहालत और अकड़ को दिखाती है। वह सच्चाई को मानने के बजाय दुनियावी चीज़ों को देख रहा था। वह नहीं समझता था कि अल्लाह के रसूलों की सच्चाई का सबूत उनके मोजिज़े और उनकी पाकीज़ा ज़िंदगी है, न कि सोने के कंगन या फ़रिश्तों का साथ। अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को ऐसे मोजिज़े दिए थे (जैसे असा का साँप बनना, हाथ का चमकना) जो फिरौन की इन बातों से कहीं बड़े और हैरतअंगेज़ थे, लेकिन फिरौन ने हक़ (सच्चाई) को न मानकर ये बहाने बनाए।
इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि सच्चाई को मापने का पैमाना दुनियावी दौलत या दिखावा नहीं है। अल्लाह के दीन की सच्चाई उसके सबूतों और उसकी रोशनी से ज़ाहिर होती है। हमें चाहिए कि हम अल्लाह के रसूलों और उनके पैग़ाम को उनके सच्चे निशानों से पहचानें, न कि दुनियावी चीज़ों से। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह तआला अपने बंदों को उनकी ज़रूरत के हिसाब से हिदायत देता है और उन पर अपनी रहमत और फज़ल से नवाज़ता है, चाहे वह दुनियावी दौलत के रूप में हो या इल्म और हिकमत के रूप में। हमें अल्लाह के फैसलों पर भरोसा रखना चाहिए और उसकी हिकमत पर यक़ीन करना चाहिए।
📜 आयत 51-55 — सूरा अज़-ज़ुखरुफ
अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 53
सूरा अज़-ज़ुखरुफ आयत 53 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : कहीं बहुत बेहतर हूँ (अगर ये बेहतर है तो इसके…सूरा आयत 53/89 — सूरा अज़-ज़ुखरुफ الزخرف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अज़-ज़ुखरुफ सुनें, सूरा अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, सूरा अज़-ज़ुखरुफ mp3, सूरा अज़-ज़ुखरुफ pdf. आयत 51–55. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अज़-ज़ुखरुफ
पवित्र क़ुरआन
Saturday, October 3, 2026
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