अल-फतह · 18/29
अनुवाद उच्चारण — अल-फतह
۞ لَّقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا ۝١٨
Laqad radiyal laahu `anil mu`mineena iz yubaayi `oonaka tahtash shajarati fa`alima maa fee quloobihim fa anzalas sakeenata `alaihim wa asaa bahum fat han qareebaa
📖 हिंदी अर्थ
जिस वक्त मोमिनीन तुमसे दरख्त के नीचे (लड़ने मरने) की बैयत कर रहे थे तो ख़ुदा उनसे इस (बात पर) ज़रूर ख़ुश हुआ ग़रज़ जो कुछ उनके दिलों में था ख़ुदा ने उसे देख लिया फिर उन पर तस्सली नाज़िल फरमाई और उन्हें उसके एवज़ में बहुत जल्द फ़तेह इनायत की
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُبَايِعُونَكَ (युबायिऊनक): आपसे बैअत (निष्ठा की प्रतिज्ञा) कर रहे हैं।
  • السَّكِينَةَ (अस-सकीनah): मन की शांति, धैर्य और स्थिरता।
  • فَتْحًا قَرِيبًا (फत्हन करीबन): निकट विजय, जो ख़ैबर की विजय थी।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने उन ईमानवालों से अपनी प्रसन्नता का ऐलान किया, जिन्होंने हुदैबियyah के स्थान पर एक पेड़ के नीचे आप ﷺ के हाथ पर बैअत की — यह वही प्रसिद्ध "बैअत-ए-रिज़वान" है। अल्लाह ने उनके दिलों के भेद को जाना — उनका सच्चा ईमान, उनकी वफ़ादारी और उनका पूर्ण समर्पण। उनके दिलों में जो सच्चाई और निष्ठा थी, अल्लाह ने उसे देखा और उन पर अपनी ओर से सकीनah (शांति और स्थिरता) उतारी, ताकि उनके दिल मज़बूत हों और किसी भी परिस्थिति में वे डगमगाएँ नहीं।

फिर अल्लाह ने उन्हें उस चीज़ का बदला दिया जो उस समय उन्हें नहीं मिली थी — मक्कah में प्रवेश का अवसर हुदैबियyah की संधि के कारण स्थगित हो गया था, तो अल्लाह ने उन्हें एक निकट की विजय अता की — वह ख़ैबर की विजय थी। यह उनके धैर्य, सच्चाई और अल्लाह के रसूल ﷺ के प्रति उनके प्रेम का इनाम था। अल्लाह ने उन्हें यह विजय और उसके साथ ढेरों ग़नीमत (धन-संपत्ति) प्रदान की, और यह सब उनके ईमान और वफ़ादारी का फल था।

यह आयत हमें सिखाती है कि जब हम अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के प्रति सच्चे दिल से निष्ठा और समर्पण दिखाते हैं, तो अल्लाह हमें कभी निराश नहीं करता। वह हमारे दिलों की सच्चाई को जानता है और हमें वह इनाम देता है जो हमारी उम्मीद से भी बढ़कर होता है। यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की प्रसन्नता सबसे बड़ी नेमत है — जब अल्लाह किसी बंदे से राज़ी हो जाता है, तो उसे दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई मिलती है।

आज भी जो मुसलमान अपने दिल को ईमान, सच्चाई और अल्लाह के रसूल ﷺ की मुहब्बत से भर लेता है, वह अल्लाह की रहमत और सकीनah का हक़दार बनता है। अल्लाह उसे मुश्किलों में सब्र और सुकून देता है, और उसके लिए ऐसे रास्ते खोलता है जिनका उसे अंदाज़ा भी नहीं होता। यही ईमान की ताक़त है — कि अल्लाह पर भरोसा करो, उसके रसूल ﷺ की बताई राह पर चलो, और देखो कि अल्लाह कैसे तुम्हारे लिए हर मुश्किल से निकलने का रास्ता बनाता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 16-20 — अल-फतह

16قُل لِّلْمُخَلَّفِينَ مِنَ الْأَعْرَابِ سَتُدْعَوْنَ إِلَىٰ قَوْمٍ أُولِي بَأْسٍ شَدِيدٍ تُقَاتِلُونَهُمْ أَوْ يُسْلِمُونَ ۖ فَإِن تُطِيعُوا يُؤْتِكُمُ اللَّهُ أَجْرًا حَسَنًا ۖ وَإِن تَتَوَلَّوْا كَمَا تَوَلَّيْتُم مِّن قَبْلُ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
कि जो गवॉर पीछे रह गए थे उनसे कह दो कि अनक़रीब ही तुम सख्त जंगजू क़ौम के (साथ लड़ने के लिए) बुलाए जाओगे कि तुम (या तो) उनसे लड़ते ही रहोगे या मुसलमान ही हो जाएँगे पस अगर तुम (ख़ुदा का) हुक्म मानोगे तो ख़ुदा तुमको अच्छा बदला देगा और अगर तुमने जिस तरह पहली दफा सरताबी की थी अब भी सरताबी करोगे तो वह तुमको दर्दनाक अज़ाब की सज़ा देगा
17لَّيْسَ عَلَى الْأَعْمَىٰ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَرِيضِ حَرَجٌ ۗ وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَمَن يَتَوَلَّ يُعَذِّبْهُ عَذَابًا أَلِيمًا
(जेहाद से पीछे रह जाने का) न तो अन्धे ही पर कुछ गुनाह है और न लँगड़े पर गुनाह है और न बीमार पर गुनाह है और जो शख़्श ख़ुदा और उसके रसूल का हुक्म मानेगा तो वह उसको (बेहिश्त के) उन सदाबहार बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें जारी होंगी और जो सरताबी करेगा वह उसको दर्दनाक अज़ाब की सज़ा देगा
18۞ لَّقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا
जिस वक्त मोमिनीन तुमसे दरख्त के नीचे (लड़ने मरने) की बैयत कर रहे थे तो ख़ुदा उनसे इस (बात पर) ज़रूर ख़ुश हुआ ग़रज़ जो कुछ उनके दिलों में था ख़ुदा ने उसे देख लिया फिर उन पर तस्सली नाज़िल फरमाई और उन्हें उसके एवज़ में बहुत जल्द फ़तेह इनायत की
19وَمَغَانِمَ كَثِيرَةً يَأْخُذُونَهَا ۗ وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا
और (इसके अलावा) बहुत सी ग़नीमतें (भी) जो उन्होने हासिल की (अता फरमाई) और ख़ुदा तो ग़ालिब (और) हिकमत वाला है
20وَعَدَكُمُ اللَّهُ مَغَانِمَ كَثِيرَةً تَأْخُذُونَهَا فَعَجَّلَ لَكُمْ هَٰذِهِ وَكَفَّ أَيْدِيَ النَّاسِ عَنكُمْ وَلِتَكُونَ آيَةً لِّلْمُؤْمِنِينَ وَيَهْدِيَكُمْ صِرَاطًا مُّسْتَقِيمًا
ख़ुदा ने तुमसे बहुत सी ग़नीमतों का वायदा फरमाया था कि तुम उन पर काबिज़ हो गए तो उसने तुम्हें ये (ख़ैबर की ग़नीमत) जल्दी से दिलवा दीं और (हुबैदिया से) लोगों की दराज़ी को तुमसे रोक दिया और ग़रज़ ये थी कि मोमिनीन के लिए (क़ुदरत) का नमूना हो और ख़ुदा तुमको सीधी राह पर ले चले
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अनुवाद — अल-फतह 18

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Tuesday, August 18, 2026

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