अल-फतह · 24/29
अनुवाद उच्चारण — अल-फतह
وَهُوَ الَّذِي كَفَّ أَيْدِيَهُمْ عَنكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ عَنْهُم بِبَطْنِ مَكَّةَ مِن بَعْدِ أَنْ أَظْفَرَكُمْ عَلَيْهِمْ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا ۝٢٤
Wa Huwal lazee kaffa aydiyahum `ankum wa aydiyakum `anhum bibatni Makkata mim ba`di an azfarakum `alaihim; wa kaanal laahu bimaa ta`maloona Baseera
📖 हिंदी अर्थ
और वह वही तो है जिसने तुमको उन कुफ्फ़ार पर फ़तेह देने के बाद मक्के की सरहद पर उनके हाथ तुमसे और तुम्हारे हाथ उनसे रोक दिए और तुम लोग जो कुछ भी करते थे ख़ुदा उसे देख रहा था

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • كَفَّ – रोक दिया, हटा दिया
  • أَيْدِيَهُمْ – उनके हाथ
  • بِبَطْنِ مَكَّةَ – मक्का के भीतरी भाग में (हुदैबिया के क्षेत्र में)
  • أَظْفَرَكُمْ – तुम्हें विजयी बनाया, तुम्हें उन पर प्रभुत्व दिया
  • بَصِيرًا – सब कुछ देखने वाला, पूर्ण दृष्टा

तफ़सीर:

यह आयत उस महान ईश्वरीय कृपा का वर्णन करती है जो अल्लाह ने हुदैबिया के अवसर पर मुसलमानों पर की। अल्लाह ही वह है जिसने काफिरों के हाथों को तुमसे रोके रखा और तुम्हारे हाथों को उनसे रोके रखा, उस समय जब तुम मक्का के भीतरी भाग (हुदैबिया) में थे। यह घटना उस समय की है जब लगभग अस्सी हथियारबंद काफिर मक्का से निकलकर रसूलुल्लाह ﷺ के कैम्प की ओर आए थे, उनका इरादा मुसलमानों को नुकसान पहुँचाने का था। लेकिन अल्लाह ने उन्हें मुसलमानों के क़ाबू में कर दिया — मुसलमानों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया और वे पूरी तरह उनके अधीन हो गए। इसके बाद भी अल्लाह की रहमत और हिकमत से मुसलमानों ने उन्हें मारा नहीं, बल्कि उन्हें आज़ाद कर दिया। यह अल्लाह की तरफ से एक बड़ी नेमत और रहमत थी, क्योंकि अल्लाह चाहता तो उन्हें तुम्हारे हाथों से मरवा सकता था, लेकिन उसने यह इसलिए किया ताकि मक्का में फ़ितना और खून-खराबा न हो और आगे चलकर फ़तह-ए-मक्का (मक्का की विजय) जैसी बड़ी कामयाबी का रास्ता हमवार हो।

अल्लाह तआला हर उस अमल से पूरी तरह वाक़िफ़ है जो तुम करते हो — चाहे वह खुला हो या छिपा, छोटा हो या बड़ा। उसकी नज़र से कोई चीज़ पोशीदा नहीं है, और वही तुम्हारे अमलों का पूरा-पूरा हिसाब लेगा और उसका बदला देगा।

दावती पहलू:

इस आयत में अल्लाह की क़ुदरत और उसकी हिफ़ाज़त का जो नमूना पेश किया गया है, वह हर मुसलमान के लिए यक़ीन और भरोसे की बुनियाद है। जब अल्लाह किसी बंदे का हाथ पकड़ लेता है, तो दुनिया की तमाम ताक़तें उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। यह आयत हमें सिखाती है कि मुश्किल वक़्त में घबराना नहीं चाहिए, बल्कि अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए — वही है जो दुश्मनों के हाथों को रोकता है और दिलों को क़ाबू में रखता है। साथ ही, यह भी सबक़ है कि ताक़त और ग़लबा मिलने पर भी मुसलमान को रहम और इंसाफ़ का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि अल्लाह देख रहा है कि तुम क्या करते हो। यही वह पैग़ाम है जो इस उम्मत को इज़्ज़त और कामयाबी की राह दिखाता है — अल्लाह से डरो, उस पर भरोसा रखो, और उसकी राह में नेकी और रहमत को अपनाओ।



📜 आयत 22-26 — अल-फतह

22وَلَوْ قَاتَلَكُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوَلَّوُا الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
(और) अगर कुफ्फ़ार तुमसे लड़ते तो ज़रूर पीठ फेर कर भाग जाते फिर वह न (अपना) किसी को सरपरस्त ही पाते न मददगार
23سُنَّةَ اللَّهِ الَّتِي قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلُ ۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّةِ اللَّهِ تَبْدِيلًا
यही ख़ुदा की आदत है जो पहले ही से चली आती है और तुम ख़ुदा की आदत को बदलते न देखोगे
24وَهُوَ الَّذِي كَفَّ أَيْدِيَهُمْ عَنكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ عَنْهُم بِبَطْنِ مَكَّةَ مِن بَعْدِ أَنْ أَظْفَرَكُمْ عَلَيْهِمْ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا
और वह वही तो है जिसने तुमको उन कुफ्फ़ार पर फ़तेह देने के बाद मक्के की सरहद पर उनके हाथ तुमसे और तुम्हारे हाथ उनसे रोक दिए और तुम लोग जो कुछ भी करते थे ख़ुदा उसे देख रहा था
25هُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوكُمْ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَالْهَدْيَ مَعْكُوفًا أَن يَبْلُغَ مَحِلَّهُ ۚ وَلَوْلَا رِجَالٌ مُّؤْمِنُونَ وَنِسَاءٌ مُّؤْمِنَاتٌ لَّمْ تَعْلَمُوهُمْ أَن تَطَئُوهُمْ فَتُصِيبَكُم مِّنْهُم مَّعَرَّةٌ بِغَيْرِ عِلْمٍ ۖ لِّيُدْخِلَ اللَّهُ فِي رَحْمَتِهِ مَن يَشَاءُ ۚ لَوْ تَزَيَّلُوا لَعَذَّبْنَا الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
ये वही लोग तो हैं जिन्होने कुफ़्र किया और तुमको मस्जिदुल हराम (में जाने) से रोका और क़ुरबानी के जानवरों को भी (न आने दिया) कि वह अपनी (मुक़र्रर) जगह (में) पहुँचने से रूके रहे और अगर कुछ ऐसे ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतें न होती जिनसे तुम वाक़िफ न थे कि तुम उनको (लड़ाई में कुफ्फ़ार के साथ) पामाल कर डालते पस तुमको उनकी तरफ से बेख़बरी में नुकसान पहँच जाता (तो उसी वक्त तुमको फतेह हुई मगर ताख़ीर) इसलिए (हुई) कि ख़ुदा जिसे चाहे अपनी रहमत में दाख़िल करे और अगर वह (ईमानदार कुफ्फ़ार से) अलग हो जाते तो उनमें से जो लोग काफ़िर थे हम उन्हें दर्दनाक अज़ाब की ज़रूर सज़ा देते
26إِذْ جَعَلَ الَّذِينَ كَفَرُوا فِي قُلُوبِهِمُ الْحَمِيَّةَ حَمِيَّةَ الْجَاهِلِيَّةِ فَأَنزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَلْزَمَهُمْ كَلِمَةَ التَّقْوَىٰ وَكَانُوا أَحَقَّ بِهَا وَأَهْلَهَا ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا
(ये वह वक्त) था जब काफ़िरों ने अपने दिलों में ज़िद ठान ली थी और ज़िद भी तो जाहिलियत की सी तो ख़ुदा ने अपने रसूल और मोमिनीन (के दिलों) पर अपनी तरफ़ से तसकीन नाज़िल फ़रमाई और उनको परहेज़गारी की बात पर क़ायम रखा और ये लोग उसी के सज़ावार और अहल भी थे और ख़ुदा तो हर चीज़ से ख़बरदार है
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अनुवाद — अल-फतह 24

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सूरा आयत 24/29 — अल-फतह الفتح (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-फतह सुनें, अल-फतह अनुवाद, अल-फतह mp3, अल-फतह pdf. आयत 22–26. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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