अज़-ज़ारियात · 37/60
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ारियात
وَتَرَكْنَا فِيهَا آيَةً لِّلَّذِينَ يَخَافُونَ الْعَذَابَ الْأَلِيمَ ۝٣٧
Wa taraknaa feehaaa aayatal lillazeena yakhaafoonal `azaabal aleem
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग दर्दनाक अज़ाब से डरते हैं उनके लिए वहाँ (इबरत की) निशानी छोड़ दी और मूसा (के हाल) में भी (निशानी है)
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آيَةً: निशानी, सबक़, इबरत।
  • يَخَافُونَ: डरते हैं।
  • الْعَذَابَ الْأَلِيمَ: दर्दनाक और तकलीफ़देह अज़ाब।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) की क़ौम की बस्ती (सदूम) में उनके अज़ाब के निशानात बाक़ी रखे, ताकि वो जगह एक सबक़ और इबरत बन जाए। ये निशानियाँ आज भी मौजूद हैं, जो अल्लाह की क़ुदरत और उसके इंतक़ाम की गवाही देती हैं। ये वो जगह है जहाँ अल्लाह का अज़ाब नाज़िल हुआ, और उस बस्ती को उलट दिया गया, पत्थर बरसाए गए, और वहाँ के रहने वालों को मिटा दिया गया।

ये निशानी ख़ास तौर पर उन लोगों के लिए इबरत है जो अल्लाह के दर्दनाक अज़ाब से डरते हैं। क्योंकि जो लोग अल्लाह के अज़ाब से डरते हैं, वही उसकी निशानियों से सबक़ हासिल करते हैं और अपने आप को उस अज़ाब से बचाने की कोशिश करते हैं। वे लोग जो इन निशानियों को देखकर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते हैं, वे समझ जाते हैं कि अल्लाह का अज़ाब कितना सख्त है, और वे अपनी ज़िंदगी को सुधारने की कोशिश करते हैं।

ये क़ुरआन की आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की तरफ़ से आने वाली निशानियों से हमें सबक़ लेना चाहिए। अल्लाह ने पिछली क़ौमों के हालात को हमारे लिए एक सबक़ बनाया है, ताकि हम उनकी तरह गुनाहों में न पड़ें और अल्लाह के अज़ाब से बचें। जो लोग अल्लाह से डरते हैं और उसके अज़ाब से खौफ़ रखते हैं, वही सच्चे मोमिन हैं, और उन्हीं के लिए ये निशानियाँ फ़ायदेमंद होती हैं।

इस आयत से हमें ये सबक़ मिलता है कि हमें अपनी ज़िंदगी में अल्लाह के हुक्मों की पैरवी करनी चाहिए, और उन कामों से बचना चाहिए जो अल्लाह के ग़ज़ब का सबब बनते हैं। अल्लाह रहम करने वाला है, लेकिन वो सख्त अज़ाब देने वाला भी है। हमें उसकी रहमत की उम्मीद भी रखनी चाहिए और उसके अज़ाब से डरना भी चाहिए। यही दोनों चीज़ें एक मोमिन के दिल में होती हैं — उम्मीद और ख़ौफ़ — और यही उसे सीधे रास्ते पर चलने में मदद करती हैं।

🎧 सुनें

📜 आयत 35-39 — अज़-ज़ारियात

35فَأَخْرَجْنَا مَن كَانَ فِيهَا مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
ग़रज़ वहाँ जितने लोग मोमिनीन थे उनको हमने निकाल दिया
36فَمَا وَجَدْنَا فِيهَا غَيْرَ بَيْتٍ مِّنَ الْمُسْلِمِينَ
और वहाँ तो हमने एक के सिवा मुसलमानों का कोई घर पाया भी नहीं
37وَتَرَكْنَا فِيهَا آيَةً لِّلَّذِينَ يَخَافُونَ الْعَذَابَ الْأَلِيمَ
और जो लोग दर्दनाक अज़ाब से डरते हैं उनके लिए वहाँ (इबरत की) निशानी छोड़ दी और मूसा (के हाल) में भी (निशानी है)
38وَفِي مُوسَىٰ إِذْ أَرْسَلْنَاهُ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ بِسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
जब हमने उनको फिरऔन के पास खुला हुआ मौजिज़ा देकर भेजा
39فَتَوَلَّىٰ بِرُكْنِهِ وَقَالَ سَاحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌ
तो उसने अपने लशकर के बिरते पर मुँह मोड़ लिया और कहने लगा ये तो (अच्छा ख़ासा) जादूगर या सौदाई है
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अनुवाद — अज़-ज़ारियात 37

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Tuesday, August 18, 2026

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