अज़-ज़ारियात · 36/60
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ारियात
فَمَا وَجَدْنَا فِيهَا غَيْرَ بَيْتٍ مِّنَ الْمُسْلِمِينَ ۝٣٦
Famaa wajadnaa feehaa ghaira baitim minal muslimeen
📖 हिंदी अर्थ
और वहाँ तो हमने एक के सिवा मुसलमानों का कोई घर पाया भी नहीं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَمَا وَجَدْنَا – और हमने नहीं पाया
  • غَيْرَ بَيْتٍ – एक घर के अलावा
  • مِنَ الْمُسْلِمِينَ – मुसलमानों (आज्ञाकारियों) में से

तफसीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला हमें बताते हैं कि जब उनके फ़रिश्ते हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) की बस्ती में पहुँचे और वहाँ के हालात का जायज़ा लिया, तो उस पूरी बस्ती में अल्लाह के आज्ञाकारी और ईमानवाले लोगों का सिर्फ़ एक ही घर मिला — और वह था हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) का घर। यानी उस बस्ती में ईमान और नेकी की मशाल सिर्फ़ एक ही घर में जल रही थी, बाक़ी पूरी बस्ती कुफ़्र, गुनाह और अल्लाह की नाफ़रमानी में डूबी हुई थी।

ये आयत हमें एक बहुत बड़ा सबक़ सिखाती है कि सच्चाई और ईमान पर क़ायम रहने के लिए भीड़ का साथ होना ज़रूरी नहीं। हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) अकेले थे, लेकिन उन्होंने हक़ पर क़ायम रहकर अल्लाह का हुक्म पूरा किया। अल्लाह ने उनके उसी सब्र और ईमान की वजह से उन्हें और उनके घरवालों को उस तबाही से बचा लिया जो पूरी बस्ती पर आई।

इससे हमें यह भी पता चलता है कि अल्लाह के नज़दीक असली इज़्ज़त तक़वा और ईमान है, न कि तादाद और ताक़त। एक मुसलमान भी अल्लाह की रहमत का हक़दार बन सकता है, बशर्ते वो अपने ईमान और अमल को दुरुस्त रखे। ये आयत उन लोगों के लिए तसल्ली है जो नेकी पर अकेले चल रहे हैं — उन्हें यक़ीन रखना चाहिए कि अल्लाह उनके साथ है और उनकी मेहनत राईगाँ नहीं जाएगी।

आज के दौर में जब बुराई हर तरफ़ फैली हुई है, हमें हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) के घर से सबक़ लेना चाहिए कि अगर हमारा घर अल्लाह की इबादत और नेकी का केंद्र बन जाए, तो हम भी अल्लाह की रहमत और हिफ़ाज़त के हक़दार बन सकते हैं। अल्लाह हमें अपने घरों को ईमान और नेकी की रोशनी से मुनव्वर करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 34-38 — सूरा अज़-ज़ारियात

34مُّسَوَّمَةً عِندَ رَبِّكَ لِلْمُسْرِفِينَ
जिन पर हद से बढ़ जाने वालों के लिए तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से निशान लगा दिए गए हैं
35فَأَخْرَجْنَا مَن كَانَ فِيهَا مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
ग़रज़ वहाँ जितने लोग मोमिनीन थे उनको हमने निकाल दिया
36فَمَا وَجَدْنَا فِيهَا غَيْرَ بَيْتٍ مِّنَ الْمُسْلِمِينَ
और वहाँ तो हमने एक के सिवा मुसलमानों का कोई घर पाया भी नहीं
37وَتَرَكْنَا فِيهَا آيَةً لِّلَّذِينَ يَخَافُونَ الْعَذَابَ الْأَلِيمَ
और जो लोग दर्दनाक अज़ाब से डरते हैं उनके लिए वहाँ (इबरत की) निशानी छोड़ दी और मूसा (के हाल) में भी (निशानी है)
38وَفِي مُوسَىٰ إِذْ أَرْسَلْنَاهُ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ بِسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
जब हमने उनको फिरऔन के पास खुला हुआ मौजिज़ा देकर भेजा
अज़-ज़ारियातकुरान सूची
60आयत
मक्कीअवतरण स्थान
36आयत

अनुवाद — अज़-ज़ारियात 36

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Friday, October 2, 2026

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