अर-रहमान · 30/78
अनुवाद उच्चारण — सूरा अर-रहमान
فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ۝٣٠
Fabi ayyi aalaaa`i Rabbikumaa tukazzibaan
📖 हिंदी अर्थ
तो तुम दोनों अपने सरपरस्त की कौन कौन सी नेअमत से मुकरोगे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آلاء: नेमतें, उपकार, अनगिनत अहसान।
  • تُكَذِّبَانِ: तुम दोनों झुठलाते हो (यहाँ ख़िताब इंसानों और जिन्नों दोनों को है)।

तफ़सीर:

ऐ इंसानों और जिन्नों की जमात! तुम्हारे रब की नेमतें और उसके अहसानात इतने ज़्यादा हैं कि उन्हें गिना नहीं जा सकता। हर साँस में, हर पल में, हर चीज़ में उसका करम और फज़ल शामिल है। वही है जिसने तुम्हें पैदा किया, तुम्हें रिज़्क़ दिया, तुम्हें सुनने और देखने की ताक़त दी, तुम्हारे लिए ज़मीन को बिछौना और आसमान को छत बनाया। उसने तुम्हें अक़्ल दी, समझ दी, और हिदायत के लिए रसूल और किताबें भेजीं। फिर ऐ इंसानों और जिन्नों! तुम अपने रब की इन कितनी नेमतों को झुठलाओगे? कौन सी नेमत ऐसी है जिसे तुम मना कर सकते हो? क्या तुम्हारे पास कोई दलील है कि इनमें से कोई नेमत तुम्हारे रब की नहीं?

ये आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतों का अहसान मानना और उसका शुक्र अदा करना हमारा फर्ज़ है। जब हम अपने चारों ओर देखते हैं — सूरज, चाँद, सितारे, पानी, हवा, पेड़-पौधे, जानवर, और सबसे बड़ी नेमत ईमान और हिदायत — तो हमारा दिल चाहता है कि हम अपने रब की तारीफ़ करें और उसका शुक्रिया अदा करें। ये आयत हमें उस मालिक की तरफ़ मुड़ने की तरग़ीब देती है जिसने हमें ये सब कुछ दिया है, और हमें बताती है कि उसकी नेमतों का इनकार करना कितनी बड़ी नाइंसाफ़ी है।

अल्लाह तआला हम सबको अपनी नेमतों की क़द्र करने और उसका शुक्र अदा करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 28-32 — सूरा अर-रहमान

28فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत से इन्कार करोगे
29يَسْأَلُهُ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ كُلَّ يَوْمٍ هُوَ فِي شَأْنٍ
और जितने लोग सारे आसमान व ज़मीन में हैं (सब) उसी से माँगते हैं वह हर रोज़ (हर वक्त) मख़लूक के एक न एक काम में है
30فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने सरपरस्त की कौन कौन सी नेअमत से मुकरोगे
31سَنَفْرُغُ لَكُمْ أَيُّهَ الثَّقَلَانِ
(ऐ दोनों गिरोहों) हम अनक़रीब ही तुम्हारी तरफ मुतावज्जे होंगे
32فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने पालने वाले की किस किस नेअमत को न मानोगे
अर-रहमानकुरान सूची
78आयत
मदनीअवतरण स्थान
30आयत

अनुवाद — अर-रहमान 30

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Thursday, October 1, 2026

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