अर-रहमान · 32/78
अनुवाद उच्चारण — अर-रहमान
فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ۝٣٢
Fabi ayyi aalaaa`i Rabbikumaa tukazzibaan
📖 हिंदी अर्थ
तो तुम दोनों अपने पालने वाले की किस किस नेअमत को न मानोगे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • आलाइ (آلاء): अल्लाह की नेमतें और एहसान।
  • तुकज़्ज़िबान (تُكَذِّبَان): तुम दोनों झुठलाते हो।

तफ़सीर:

ऐ जिन्न और इंसानों के समूह! तुम दोनों पर अल्लाह की कितनी ही नेमतें बरस रही हैं—आसमान और ज़मीन की पैदाइश, सूरज और चाँद की रोशनी, बारिश का नाज़िल होना, रिज़्क़ का मिलना, मौत और ज़िंदगी का निज़ाम, और हर वो चीज़ जो तुम्हारे काम आती है। फिर इन सब नेमतों में से कौन सी नेमत को तुम झुठलाओगे? यानी तुम्हारे पास इनकार करने की कोई गुंजाइश ही नहीं, क्योंकि हर नेमत अल्लाह की तरफ से है और उसका शुक्र अदा करना तुम्हारा फर्ज़ है।

यह आयत बार-बार दोहराई गई है ताकि इंसान और जिन्न दोनों को एहसास हो कि अल्लाह की नेमतें अनगिनत हैं और उनका शुक्र अदा करना चाहिए, न कि कुफ़्र और नाशुक्री करनी चाहिए। जो शख्स इन नेमतों को देखकर अल्लाह की तारीफ़ करता है और उसकी इबादत में लगा रहता है, वही सच्चा शुक्रगुज़ार है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि हमारी ज़िंदगी का हर पल अल्लाह की नेमतों से भरा हुआ है। जब हम सुबह उठते हैं, साँस लेते हैं, खाना खाते हैं, पानी पीते हैं—हर चीज़ में अल्लाह का करम है। अगर हम इन नेमतों को गिनना चाहें तो गिन नहीं सकते। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी ज़बान से हमेशा "अल्हम्दुलिल्लाह" कहें और अपने अमल से अल्लाह की इताअत करें। यह आयत हमें नेमतों की क़द्र करना सिखाती है और हमें उस रब के करीब लाती है जो अपने बंदों पर बेहद मेहरबान है। जो शख्स इन नेमतों को पहचान लेता है, उसका दिल अल्लाह की मुहब्बत से भर जाता है और वह अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक गुज़ारता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 30-34 — अर-रहमान

30فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने सरपरस्त की कौन कौन सी नेअमत से मुकरोगे
31سَنَفْرُغُ لَكُمْ أَيُّهَ الثَّقَلَانِ
(ऐ दोनों गिरोहों) हम अनक़रीब ही तुम्हारी तरफ मुतावज्जे होंगे
32فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने पालने वाले की किस किस नेअमत को न मानोगे
33يَا مَعْشَرَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ إِنِ اسْتَطَعْتُمْ أَن تَنفُذُوا مِنْ أَقْطَارِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ فَانفُذُوا ۚ لَا تَنفُذُونَ إِلَّا بِسُلْطَانٍ
ऐ गिरोह जिन व इन्स अगर तुममें क़ुदरत है कि आसमानों और ज़मीन के किनारों से (होकर कहीं) निकल (कर मौत या अज़ाब से भाग) सको तो निकल जाओ (मगर) तुम तो बग़ैर क़ूवत और ग़लबे के निकल ही नहीं सकते (हालॉ कि तुममें न क़ूवत है और न ही ग़लबा)
34فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम अपने परवरदिगार की किस किस नेअमत को झुठलाओगे
अर-रहमानकुरान सूची
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अनुवाद — अर-रहमान 32

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Tuesday, August 18, 2026

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