अल-आराफ · 74/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
وَاذْكُرُوا إِذْ جَعَلَكُمْ خُلَفَاءَ مِن بَعْدِ عَادٍ وَبَوَّأَكُمْ فِي الْأَرْضِ تَتَّخِذُونَ مِن سُهُولِهَا قُصُورًا وَتَنْحِتُونَ الْجِبَالَ بُيُوتًا ۖ فَاذْكُرُوا آلَاءَ اللَّهِ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْأَرْضِ مُفْسِدِينَ ۝٧٤
Wazkkurooo iz ja`alakum khulafaaa`a mim ba`di `Aadinw wa bawwa akum fil ardi tattakhizoona min suhoolihaa qusooranw wa tanhitoonal jibaala buyootan fazkurooo aalaaa`al laahi wa laa ta`saw fil ardi mufsideen
📖 हिंदी अर्थ
और वह वक्त याद करो जब उसने तुमको क़ौम आद के बाद (ज़मीन में) ख़लीफा (व जानशीन) बनाया और तुम्हें ज़मीन में इस तरह बसाया कि तुम हमवार व नरम ज़मीन में (बड़े-बड़े) महल उठाते हो और पहाड़ों को तराश के घर बनाते हो तो ख़ुदा की नेअमतों को याद करो और रूए ज़मीन में फसाद न करते फिरो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ख़ुलफ़ा: उत्तराधिकारी, पीढ़ी दर पीढ़ी एक के बाद एक आने वाले।
  • बव्वा-अकुम: तुम्हें जगह दी, बसाया, अधिकार दिया।
  • सुहूलिहा: उसके मैदान, समतल भूमि।
  • क़ुसूर: महल, ऊँची इमारतें।
  • तन्हितून: तराशते हो, काटते हो।
  • आला-अल्लाह: अल्लाह की नेमतें, अनगिनत उपकार।
  • ता'सौ: फसाद फैलाना, ज़मीन में बिगाड़ पैदा करना।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने बंदों को उनकी नेमतें याद दिलाता है, ताकि उनके दिल शुक्र से भर जाएँ और वे अपने रब की तरफ झुकें। यह ख़िताब क़ौमे-समूद से है, जिन्हें आद की क़ौम के बाद ज़मीन का उत्तराधिकारी बनाया गया। आद की क़ौम अपनी ताकत और सरकशी की वजह से हलाक हुई, और अल्लाह ने समूद को उनकी जगह दी। उन्हें ज़मीन में ऐसा मकाम दिया गया कि वे मैदानों में ऊँचे-ऊँचे महल बनाते थे और पहाड़ों को काटकर उसमें घर तराशते थे। यह उनकी तरक्की, ताकत और सभ्यता की निशानी थी, लेकिन यह सब अल्लाह की देन थी।

अल्लाह उनसे कहता है: "मेरी नेमतों को याद करो, उन पर शुक्र अदा करो, और ज़मीन में फसाद न फैलाओ।" यानी जो ताकत और सामर्थ्य तुम्हें दी गई है, उसका इस्तेमाल अल्लाह की इताअत में करो, न कि उसकी नाफ़रमानी में। फसाद फैलाने से मुराद अल्लाह के साथ कुफ्र करना, उसके हुक्मों की खिलाफ़वर्ज़ी करना और लोगों के साथ ज़ुल्म करना है। यह आयत हमें सिखाती है कि जब अल्लाह हमें नेमतें देता है, तो हमें उनका सही इस्तेमाल करना चाहिए और अपनी ताकत को ग़ुरूर में नहीं बदलना चाहिए।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हर उस इंसान के लिए एक जागृति है जो तरक्की और सुख-सुविधाओं में डूबा हुआ है। अल्लाह हमें याद दिलाता है कि यह सब कुछ उसकी बख्शिश है, हमारी अपनी काबिलियत का करिश्मा नहीं। जब हम अपने घरों, नौकरियों, सेहत और परिवार को देखें, तो समझें कि यह अल्लाह की मेहरबानी है। यही एहसास हमें शुक्रगुज़ार बनाता है और शुक्र अदा करने का तरीक़ा यह है कि हम अल्लाह की इताअत करें, उसके बताए रास्ते पर चलें और ज़मीन में भलाई फैलाएँ। फसाद, ज़ुल्म, रिश्वत, झूठ और नाफ़रमानी से बचें। याद रखें, जो क़ौमें अल्लाह की नेमतों को भूलकर फसाद में लग गईं, वे हलाक हुईं। इसलिए हमें चाहिए कि हम अल्लाह के शुक्रगुज़ार बंदे बनें और अपनी ज़िंदगी को उसकी रज़ा के मुताबिक़ ढालें। अल्लाह हमें यह तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 72-76 — अल-आराफ

72فَأَنجَيْنَاهُ وَالَّذِينَ مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِّنَّا وَقَطَعْنَا دَابِرَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا ۖ وَمَا كَانُوا مُؤْمِنِينَ
आख़िर हमने उनको और जो लोग उनके साथ थे उनको अपनी रहमत से नजात दी और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया था हमने उनकी जड़ काट दी और वह लोग ईमान लाने वाले थे भी नहीं
73وَإِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَالِحًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ قَدْ جَاءَتْكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ هَٰذِهِ نَاقَةُ اللَّهِ لَكُمْ آيَةً ۖ فَذَرُوهَا تَأْكُلْ فِي أَرْضِ اللَّهِ ۖ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
और (हमने क़ौम) समूद की तरफ उनके भाई सालेह को रसूल बनाकर भेजा तो उन्होनें (उन लोगों से कहा) ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा ही की इबादत करो और उसके सिवा कोई तुम्हारा माबूद नहीं है तुम्हारे पास तो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से वाज़ेए और रौशन दलील आ चुकी है ये ख़ुदा की भेजी हुई ऊँटनी तुम्हारे वास्ते एक मौजिज़ा है तो तुम लोग उसको छोड़ दो कि ख़ुदा की ज़मीन में जहाँ चाहे चरती फिरे और उसे कोई तकलीफ़ ना पहुंचाओ वरना तुम दर्दनाक अज़ाब में गिरफ्तार हो जाआगे
74وَاذْكُرُوا إِذْ جَعَلَكُمْ خُلَفَاءَ مِن بَعْدِ عَادٍ وَبَوَّأَكُمْ فِي الْأَرْضِ تَتَّخِذُونَ مِن سُهُولِهَا قُصُورًا وَتَنْحِتُونَ الْجِبَالَ بُيُوتًا ۖ فَاذْكُرُوا آلَاءَ اللَّهِ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْأَرْضِ مُفْسِدِينَ
और वह वक्त याद करो जब उसने तुमको क़ौम आद के बाद (ज़मीन में) ख़लीफा (व जानशीन) बनाया और तुम्हें ज़मीन में इस तरह बसाया कि तुम हमवार व नरम ज़मीन में (बड़े-बड़े) महल उठाते हो और पहाड़ों को तराश के घर बनाते हो तो ख़ुदा की नेअमतों को याद करो और रूए ज़मीन में फसाद न करते फिरो
75قَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا مِن قَوْمِهِ لِلَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِمَنْ آمَنَ مِنْهُمْ أَتَعْلَمُونَ أَنَّ صَالِحًا مُّرْسَلٌ مِّن رَّبِّهِ ۚ قَالُوا إِنَّا بِمَا أُرْسِلَ بِهِ مُؤْمِنُونَ
तो उसकी क़ौम के बड़े बड़े लोगों ने बेचारें ग़रीबों से उनमें से जो ईमान लाए थे कहा क्या तुम्हें मालूम है कि सालेह (हक़ीकतन) अपने परवरदिगार के सच्चे रसूल हैं - उन बेचारों ने जवाब दिया कि जिन बातों का वह पैग़ाम लाए हैं हमारा तो उस पर ईमान है
76قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا إِنَّا بِالَّذِي آمَنتُم بِهِ كَافِرُونَ
तब जिन लोगों को (अपनी दौलत दुनिया पर) घमन्ड था कहने लगे हम तो जिस पर तुम ईमान लाए हो उसे नहीं मानते
अल-आराफकुरान सूची
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अनुवाद — अल-आराफ 74

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Tuesday, August 18, 2026

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