Wa In kaana taaa`ifatum minkum aamanoo billazeee ursiltu bihee wa taaa`ifatul lam yu`minoo fasbiroo hattaa yahkumual laahu bainanaa; wa Huwa khairul haakimeen
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और जिन बातों का मै पैग़ाम लेकर आया हूँ अगर तुममें से एक गिरोह ने उनको मान लिया और एक गिरोह ने नहीं माना तो (कुछ परवाह नहीं) तो तुम सब्र से बैठे (देखते) रहो यहाँ तक कि ख़ुदा (खुद) हमारे दरमियान फैसला कर दे, वह तो सबसे बेहतर फैसला करने वाला है
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
اور اگر تم میں سے ایک جماعت میری رسالت پر ایمان لے آئی ہے اور ایک جماعت ایمان نہیں لائی ہے۔ اور ایک جماعت ایمان نہیں لائی۔ تو صبر کیے رہو یہاں تک کہ خدا ہمارے تمہارے درمیان فیصلہ کر دے اور وہ سب سے بہتر فیصلہ کرنے والا ہے
और जिन बातों का मै पैग़ाम लेकर आया हूँ अगर तुममें से एक गिरोह ने उनको मान लिया और एक गिरोह ने नहीं माना तो (कुछ परवाह नहीं) तो तुम सब्र से बैठे (देखते) रहो यहाँ तक कि ख़ुदा (खुद) हमारे दरमियान फैसला कर दे, वह तो सबसे बेहतर फैसला करने वाला है
📜
अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
طَائِفَةٌ – एक समूह, एक गिरोह
فَاصْبِرُوا – तो ठहरो, प्रतीक्षा करो (यहाँ अर्थ: प्रतीक्षा करना है, धैर्य रखना नहीं)
يَحْكُمَ اللهُ – अल्लाह फ़ैसला करे
خَيْرُ الْحَاكِمِينَ – सबसे अच्छा फ़ैसला करने वाला
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत हज़रत शुऐब (अलैहिस्सलाम) की कहानी के सिलसिले में है। जब उन्होंने अपनी क़ौम को तौहीद (एकेश्वरवाद) की दावत दी और उन्हें अल्लाह की इबादत की ओर बुलाया, तो उनकी क़ौम दो हिस्सों में बँट गई। एक गिरोह ने उन पर ईमान लाया और उस पैग़ाम को मान लिया जो अल्लाह ने उनके ज़रिये भेजा था, जबकि दूसरा गिरोह कुफ़्र और इनकार पर क़ायम रहा।
इस आयत में अल्लाह तआला हज़रत शुऐब (अलैहिस्सलाम) की ज़ुबान से उन लोगों को ख़िताब कर रहा है जिन्होंने ईमान नहीं लाया। फ़रमाया गया: अगर तुममें से एक गिरोह उस चीज़ पर ईमान ले आया जिसके साथ मुझे भेजा गया है, और दूसरा गिरोह ईमान नहीं लाया, तो तुम लोग ठहरो और इंतज़ार करो, यहाँ तक कि अल्लाह हमारे और तुम्हारे बीच फ़ैसला कर दे। वह फ़ैसला उस वक़्त होगा जब अल्लाह का अज़ाब नाज़िल होगा — ईमान वालों को नजात मिलेगी और काफ़िरों को हलाकत।
यह कोई हुक्म नहीं था कि लोग कुफ़्र पर क़ायम रहें, बल्कि यह एक चेतावनी और धमकी थी। अल्लाह तआला सबसे बेहतर फ़ैसला करने वाला है, क्योंकि वह पूरा इंसाफ़ करता है और उसका फ़ैसला कभी ग़लत नहीं होता। वह ईमान वालों को उनके ईमान का अच्छा बदला देगा और इनकार करने वालों को उनके कुफ़्र की सज़ा देगा।
फ़ायदे (सीख):
अल्लाह पर भरोसा: जब सच्चाई पर हो और लोग मुख़ालिफ़त करें, तो घबराना नहीं चाहिए। अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए कि वह सही वक़्त पर फ़ैसला करेगा।
सब्र और इंतज़ार: नबियों की सीरत से हमें सीख मिलती है कि सच्चाई के रास्ते पर क़ायम रहते हुए अल्लाह के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए। अल्लाह का फ़ैसला हमेशा बेहतर होता है।
अल्लाह का इंसाफ़: अल्लाह तआला सबसे अच्छा हाकिम है। उसका फ़ैसला पूरे इंसाफ़ पर होता है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह अल्लाह के फ़ैसले पर राज़ी रहे और उसकी रज़ा पर भरोसा करे।
ईमान की अहमियत: यह आयत बताती है कि ईमान लाने वालों का अंजाम नजात है और इनकार करने वालों का अंजाम हलाकत। इससे हमें अपने ईमान को मज़बूत करने की तरग़ीब मिलती है।
दावत में ज़िद न करना: दावत देने के बाद अगर लोग न मानें, तो उनसे लड़ना-झगड़ना नहीं चाहिए, बल्कि अल्लाह के फ़ैसले का हवाला देना चाहिए। यही नबियों का तरीक़ा था।
और (हमने) मदयन (वालों के) पास उनके भाई शुएब को (रसूल बनाकर भेजा) तो उन्होंने (उन लोगों से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा ही की इबादत करो उसके सिवा कोई दूसरा माबूद नहीं (और) तुम्हारे पास तो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक वाजेए व रौशन मौजिज़ा (भी) आ चुका तो नाप और तौल पूरी किया करो और लोगों को उनकी (ख़रीदी हुई) चीज़ में कम न दिया करो और ज़मीन में उसकी असलाह व दुरूस्ती के बाद फसाद न करते फिरो अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
और तुम लोग जो रास्तों पर (बैठकर) जो ख़ुदा पर ईमान लाया है उसको डराते हो और ख़ुदा की राह से रोकते हो और उसकी राह में (ख्वाहमाख्वाह) कज़ी ढूँढ निकालते हो अब न बैठा करो और उसको तो याद करो कि जब तुम (शुमार में) कम थे तो ख़ुदा ही ने तुमको बढ़ाया, और ज़रा ग़ौर तो करो कि (आख़िर) फसाद फैलाने वालों का अन्जाम क्या हुआ
और जिन बातों का मै पैग़ाम लेकर आया हूँ अगर तुममें से एक गिरोह ने उनको मान लिया और एक गिरोह ने नहीं माना तो (कुछ परवाह नहीं) तो तुम सब्र से बैठे (देखते) रहो यहाँ तक कि ख़ुदा (खुद) हमारे दरमियान फैसला कर दे, वह तो सबसे बेहतर फैसला करने वाला है
तो उनकी क़ौम में से जिन लोगों को (अपनी हशमत (दुनिया पर) बड़ा घमण्ड था कहने लगे कि ऐ शुएब हम तुम्हारे साथ ईमान लाने वालों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर कर देगें मगर जबकि तुम भी हमारे उसी मज़हब मिल्लत में लौट कर आ जाओ
हम अगरचे तुम्हारे मज़हब से नफरत ही रखते हों (तब भी लौट जाएं माज़अल्लाह) जब तुम्हारे बातिल दीन से ख़ुदा ने मुझे नजात दी उसके बाद भी अब अगर हम तुम्हारे मज़हब मे लौट जाएं तब हमने ख़ुदा पर बड़ा झूठा बोहतान बॉधा (ना) और हमारे वास्ते तो किसी तरह जायज़ नहीं कि हम तुम्हारे मज़हब की तरफ लौट जाएँ मगर हाँ जब मेरा परवरदिगार अल्लाह चाहे तो हमारा परवरदिगार तो (अपने) इल्म से तमाम (आलम की) चीज़ों को घेरे हुए है हमने तो ख़ुदा ही पर भरोसा कर लिया ऐ हमारे परवरदिगार तू ही हमारे और हमारी क़ौम के दरमियान ठीक ठीक फैसला कर दे और तू सबसे बेहतर फ़ैसला करने वाला है
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।