अल-इंसान · 26/31
अनुवाद उच्चारण — अल-इंसान
وَمِنَ اللَّيْلِ فَاسْجُدْ لَهُ وَسَبِّحْهُ لَيْلًا طَوِيلًا ۝٢٦
Wa minal laili fasjud lahoo wa sabbihhu lailan taweelaa
📖 हिंदी अर्थ
और कुछ रात गए उसका सजदा करो और बड़ी रात तक उसकी तस्बीह करते रहो
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَاسْجُدْ لَهُ: उसके लिए सजदा करो, अर्थात नमाज़ पढ़ो और उसके आगे झुको।
  • وَسَبِّحْهُ: उसकी तस्बीह (पवित्रता का वर्णन) करो, अर्थात नमाज़ और ज़िक्र के माध्यम से उसे याद करो।
  • لَيْلًا طَوِيلًا: लंबी रात, यानी रात का अधिकांश हिस्सा।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ और अपने मोमिन बंदों को निर्देश देता है कि दिन के कामों के बाद रात के समय भी उसकी इबादत करो। रात के कुछ हिस्से में उसके लिए सजदा करो, यानी मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़ो, और फिर रात के लंबे हिस्से में तहज्जुद की नमाज़ पढ़ो और उसकी तस्बीह करो। यह वह समय है जब दुनिया के शोर-शराबे से अलग होकर इंसान अपने रब से अकेले में मुनाजात करता है, और यह इबादत दिल को सुकून देती है, ईमान को मज़बूत करती है और इंसान को अल्लाह के करीब लाती है।

रात की नमाज़ (तहज्जुद) एक बहुत बड़ी नेमत है। यह गुनाहों का कफ्फारा (प्रायश्चित) है, दिल को रौशन करती है, और इंसान को दुनिया की मुश्किलों से निजात दिलाती है। अल्लाह ने इस आयत में रात के लंबे हिस्से का ज़िक्र किया है, जिसका मतलब है कि जितना हो सके रात में इबादत करो—चाहे आधी रात हो, तिहाई रात हो, या दो-तिहाई—हर मुसलमान अपनी हैसियत और हालत के मुताबिक इस नेकी में हिस्सा ले।

यह आयत हमें सिखाती है कि जीवन सिर्फ दुनिया के कामों में नहीं गुज़ारना चाहिए, बल्कि रात का कुछ हिस्सा अल्लाह की इबादत के लिए खास करना चाहिए। जो बंदा रात में उठकर अल्लाह के आगे सजदा करता है, अल्लाह उस पर फख्र करता है और उसे वो दर्जे देता है जो दिन की इबादत से नहीं मिलते। यही वह रास्ता है जो इंसान को जन्नत तक पहुंचाता है और उसे अल्लाह की मोहब्बत का हक़ीकी जायका देता है।

इसलिए, प्यारे मुसलमान भाइयों और बहनों! आइए, हम अपनी रातों को अल्लाह की इबादत से रौशन करें, तहज्जुद की नमाज़ पढ़ें, और उसकी तस्बीह करें। यही वह अमल है जो हमें दुनिया और आखिरत दोनों में कामयाबी देगा। अल्लाह हम सबको इस तौफीक अता करे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 24-28 — अल-इंसान

24فَاصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ وَلَا تُطِعْ مِنْهُمْ آثِمًا أَوْ كَفُورًا
तो तुम अपने परवरदिगार के हुक्म के इन्तज़ार में सब्र किए रहो और उन लोगों में से गुनाहगार और नाशुक्रे की पैरवी न करना
25وَاذْكُرِ اسْمَ رَبِّكَ بُكْرَةً وَأَصِيلًا
सुबह शाम अपने परवरदिगार का नाम लेते रहो
26وَمِنَ اللَّيْلِ فَاسْجُدْ لَهُ وَسَبِّحْهُ لَيْلًا طَوِيلًا
और कुछ रात गए उसका सजदा करो और बड़ी रात तक उसकी तस्बीह करते रहो
27إِنَّ هَٰؤُلَاءِ يُحِبُّونَ الْعَاجِلَةَ وَيَذَرُونَ وَرَاءَهُمْ يَوْمًا ثَقِيلًا
ये लोग यक़ीनन दुनिया को पसन्द करते हैं और बड़े भारी दिन को अपने पसे पुश्त छोड़ बैठे हैं
28نَّحْنُ خَلَقْنَاهُمْ وَشَدَدْنَا أَسْرَهُمْ ۖ وَإِذَا شِئْنَا بَدَّلْنَا أَمْثَالَهُمْ تَبْدِيلًا
हमने उनको पैदा किया और उनके आज़ा को मज़बूत बनाया और अगर हम चाहें तो उनके बदले उन्हीं के जैसे लोग ले आएँ
अल-इंसानकुरान सूची
31आयत
मदनीRevelation
26आयत

अनुवाद — अल-इंसान 26

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Tuesday, August 18, 2026

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