अल-अनफाल · 51/75
अनुवाद उच्चारण — अल-अनफाल
ذَٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيكُمْ وَأَنَّ اللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ ۝٥١
Zaalika bimaa qaddamat aideekum wa anal laaha laisa bizallaamil lil `abeed
📖 हिंदी अर्थ
ये सज़ा उसकी है जो तुम्हारे हाथों ने पहले किया कराया है और ख़ुदा बन्दों पर हरगिज़ ज़ुल्म नहीं किया करता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ذَٰلِكَ – यह (अज़ाब)।
  • بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيكُمْ – उसके कारण जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजा (अर्थात् तुम्हारे कर्म)।
  • لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ – बंदों पर अत्याचार करने वाला नहीं है (अर्थात् वह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता)।

तफ़सीर:

यह अज़ाब और यातना जो काफ़िरों को मिल रही है—चाहे वह मृत्यु के समय हो, क़ब्र में हो या आख़िरत में—यह अल्लाह की ओर से कोई अन्याय या ज़ुल्म नहीं है। बल्कि यह उनके उन कर्मों का परिणाम है जो उन्होंने दुनिया में अपने हाथों से किए थे। उन्होंने कुफ़्र, शिर्क और अल्लाह के रसूल के विरोध का रास्ता अपनाया, और इसी का फल उन्हें भुगतना पड़ रहा है।

अल्लाह तआला अपने बंदों पर ज़ुल्म करने से पाक है। वह न तो किसी को उसके कर्मों से बढ़कर सज़ा देता है और न ही किसी के अच्छे कर्म को बेकार करता है। वह पूर्ण न्याय करने वाला है। उसका फ़ैसला हर हाल में अदल और हिकमत पर आधारित होता है। जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही बदला मिलता है—यही उसका न्याय है।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. कर्मों का फल अवश्य मिलता है: यह आयत सिखाती है कि दुनिया में किया गया हर अच्छा या बुरा काम आख़िरत में सामने आएगा। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अपने कर्मों को सुधारे और अल्लाह की नाराज़गी से बचे।
  2. अल्लाह पर भरोसा और न्याय का यक़ीन: यह आयत मुसलमान के दिल में यह बात पक्की करती है कि अल्लाह कभी किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। इससे बंदे को सुकून मिलता है कि चाहे दुनिया में कुछ भी हो, आख़िरत में अल्लाह का फ़ैसला पूर्ण न्याय पर होगा।
  3. ज़िम्मेदारी का एहसास: इंसान अपने कर्मों का ज़िम्मेदार खुद है। वह अपनी गलतियों का ठीकरा किसी और पर नहीं फोड़ सकता। यह आयत इंसान को ज़िम्मेदारी का एहसास दिलाती है और उसे अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की मरज़ी के मुताबिक ढालने की तरफ़ राह दिखाती है।
  4. अल्लाह की रहमत की उम्मीद: जब हम जानते हैं कि अल्लाह ज़ुल्म नहीं करता, तो हमें यह भी यक़ीन होता है कि उसकी रहमत और माफ़ी भी इंसाफ़ पर आधारित है। जो तौबा करके लौट आता है, अल्लाह उसे माफ़ कर देता है, क्योंकि वह बड़ा क्षमाशील है।


📜 आयत 49-53 — अल-अनफाल

49إِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ غَرَّ هَٰؤُلَاءِ دِينُهُمْ ۗ وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ فَإِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
(ये वक्त था) जब मुनाफिक़ीन और जिन लोगों के दिल में (कुफ्र का) मर्ज़ है कह रहे थे कि उन मुसलमानों को उनके दीन ने धोके में डाल रखा है (कि इतराते फिरते हैं हालॉकि जो शख़्स ख़ुदा पर भरोसा करता है (वह ग़ालिब रहता है क्योंकि) ख़ुदा तो यक़ीनन ग़ालिब और हिकमत वाला है
50وَلَوْ تَرَىٰ إِذْ يَتَوَفَّى الَّذِينَ كَفَرُوا ۙ الْمَلَائِكَةُ يَضْرِبُونَ وُجُوهَهُمْ وَأَدْبَارَهُمْ وَذُوقُوا عَذَابَ الْحَرِيقِ
और काश (ऐ रसूल) तुम देखते जब फ़रिश्ते काफ़िरों की जान निकाल लेते थे और रूख़ और पुश्त (पीठ) पर कोड़े मारते थे और (कहते थे कि) अज़ाब जहन्नुम के मज़े चखों
51ذَٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيكُمْ وَأَنَّ اللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ
ये सज़ा उसकी है जो तुम्हारे हाथों ने पहले किया कराया है और ख़ुदा बन्दों पर हरगिज़ ज़ुल्म नहीं किया करता है
52كَدَأْبِ آلِ فِرْعَوْنَ ۙ وَالَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَفَرُوا بِآيَاتِ اللَّهِ فَأَخَذَهُمُ اللَّهُ بِذُنُوبِهِمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ قَوِيٌّ شَدِيدُ الْعِقَابِ
(उन लोगों की हालत) क़ौमे फिरऔन और उनके लोगों की सी है जो उन से पहले थे और ख़ुदा की आयतों से इन्कार करते थे तो ख़ुदा ने भी उनके गुनाहों की वजह से उन्हें ले डाला बेशक ख़ुदा ज़बरदस्त और बहुत सख्त अज़ाब देने वाला है
53ذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ لَمْ يَكُ مُغَيِّرًا نِّعْمَةً أَنْعَمَهَا عَلَىٰ قَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنفُسِهِمْ ۙ وَأَنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
ये सज़ा इस वजह से (दी गई) कि जब कोई नेअमत ख़ुदा किसी क़ौम को देता है तो जब तक कि वह लोग ख़ुद अपनी कलबी हालत (न) बदलें ख़ुदा भी उसे नहीं बदलेगा और ख़ुदा तो यक़ीनी (सब की सुनता) और सब कुछ जानता है
अल-अनफालकुरान सूची
75आयत
मदनीRevelation
51आयत

अनुवाद — अल-अनफाल 51

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Wednesday, August 19, 2026

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