अत-तौबा · 128/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِّنْ أَنفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُم بِالْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ ۝١٢٨
Laqad jaaa`akum Rasoolum min anfusikum `azeezun `alaihi maa `anittum hareesun `alaikum bilmu`mineena ra`oofur raheem
📖 हिंदी अर्थ
लोगों तुम ही में से (हमारा) एक रसूल तुम्हारे पास आ चुका (जिसकी शफ़क्क़त (मेहरबानी) की ये हालत है कि) उस पर शाक़ (दुख) है कि तुम तकलीफ उठाओ और उसे तुम्हारी बेहूदी का हौका है ईमानदारो पर हद दर्जे रफ़ीक़ मेहरबान हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مِنْ أَنفُسِكُمْ: तुम्हीं में से, तुम्हारी ही जाति और क़ौम से।
  • عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ: उन पर तुम्हारी तकलीफ़ और मुश्किल बहुत भारी और ग्रां है।
  • حَرِيصٌ عَلَيْكُم: तुम्हारी हिदायत और भलाई के लिए अत्यधिक इच्छुक और लालायित।
  • رَءُوفٌ رَّحِيمٌ: अत्यधिक दयालु और मेहरबान, जो बहुत अधिक शफ़क़त और रहमत रखने वाला हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की अज़ीमुश्शान शान और उनके उम्मत के साथ बेपनाह मुहब्बत और शफ़क़त को बयान करती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ऐ ईमान वालो! तुम्हारे पास एक रसूल आ चुके हैं जो तुम्हीं में से हैं—तुम्हारी ही क़ौम, तुम्हारी ही ज़ुबान और तुम्हारे ही ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते हैं। वह कोई अजनबी या फ़रिश्ता नहीं, बल्कि तुम्हारे भाई और हमजिंस इंसान हैं, ताकि तुम आसानी से उनसे सीख सको और उनकी बात को क़बूल कर सको।

वह ऐसे रसूल हैं कि उन्हें तुम्हारी हर तकलीफ़ और मुसीबत पर गहरा रंज होता है। जब तुम पर कोई मुश्किल आती है, कोई बीमारी, फ़क़ीरी या ज़ुल्म होता है, तो उनका दिल दुखता है और वह तुम्हारे दर्द को महसूस करते हैं। वह तुम्हारी हिदायत के लिए इस क़दर बेचैन रहते हैं कि तुम में से कोई भी गुमराही के रास्ते पर न चला जाए। उनकी आरज़ू यही है कि तुम सब जन्नत में दाख़िल हो जाओ और आग से बच जाओ।

विशेष रूप से ईमान वालों के साथ वह अत्यधिक नर्म दिल, दयालु और मेहरबान हैं। उनकी रहमत सिर्फ़ ज़बानी नहीं, बल्कि अमली है—उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी उम्मत की भलाई, उनकी तरबियत और उन्हें जहन्नम से बचाने में लगा दी। यह आयत उनके अख़लाक़ और शफ़क़त का सबसे बड़ा तसव्वुर पेश करती है।

फ़ायदे और सबक़:

  1. इस आयत से हमें पैग़म्बर ﷺ से मुहब्बत का सबक़ मिलता है। जिस रसूल को अल्लाह ने हम पर इतना मेहरबान बनाया है, उसकी मुहब्बत हमारे ईमान का हिस्सा है। हमें उनके बताए रास्ते पर चलना चाहिए और उनकी सुन्नत को अपनी ज़िंदगी में अपनाना चाहिए।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि एक मुसलमान को दूसरे मुसलमान के दर्द को महसूस करना चाहिए। जिस तरह रसूल ﷺ को उम्मत की तकलीफ़ पर रंज होता था, उसी तरह हमें भी अपने भाइयों की मुश्किलों में उनके साथ खड़ा होना चाहिए।
  3. रसूल ﷺ की रहमत और शफ़क़त हमारे लिए रहमत का ज़रिया है। हमें उनके इस प्यार का एहसानमंद होना चाहिए और उनकी उम्मत होने पर फ़ख़्र करना चाहिए, साथ ही उनके तरीक़े को अपनाकर अपनी ज़िंदगी को संवारना चाहिए।
  4. यह आयत हमें बताती है कि इस्लाम में रहमत और शफ़क़त कितनी अहम है। रसूल ﷺ की सीरत ही रहमत थी, और हमें भी अपने अंदर यही सिफ़ात पैदा करनी चाहिए—दूसरों के साथ नरमी, दया और भलाई का बरताव करना चाहिए।


📜 आयत 126-129 — अत-तौबा

126أَوَلَا يَرَوْنَ أَنَّهُمْ يُفْتَنُونَ فِي كُلِّ عَامٍ مَّرَّةً أَوْ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ لَا يَتُوبُونَ وَلَا هُمْ يَذَّكَّرُونَ
क्या वह लोग (इतना भी) नहीं देखते कि हर साल एक मरतबा या दो मरतबा बला में मुबितला किए जाते हैं फिर भी न तो ये लोग तौबा ही करते हैं और न नसीहत ही मानते हैं
127وَإِذَا مَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ نَّظَرَ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ هَلْ يَرَاكُم مِّنْ أَحَدٍ ثُمَّ انصَرَفُوا ۚ صَرَفَ اللَّهُ قُلُوبَهُم بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُونَ
और जब कोई सूरा नाज़िल किया गया तो उसमें से एक की तरफ एक देखने लगा (और ये कहकर कि) तुम को कोई मुसलमान देखता तो नहीं है फिर (अपने घर) पलट जाते हैं (ये लोग क्या पलटेगें गोया) ख़ुदा ने उनके दिलों को पलट दिया है इस सबब से कि ये बिल्कुल नासमझ लोग हैं
128لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِّنْ أَنفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُم بِالْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ
लोगों तुम ही में से (हमारा) एक रसूल तुम्हारे पास आ चुका (जिसकी शफ़क्क़त (मेहरबानी) की ये हालत है कि) उस पर शाक़ (दुख) है कि तुम तकलीफ उठाओ और उसे तुम्हारी बेहूदी का हौका है ईमानदारो पर हद दर्जे रफ़ीक़ मेहरबान हैं
129فَإِن تَوَلَّوْا فَقُلْ حَسْبِيَ اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ ۖ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ
ऐ रसूल अगर इस पर भी ये लोग (तुम्हारे हुक्म से) मुँह फेरें तो तुम कह दो कि मेरे लिए ख़ुदा काफी है उसके सिवा कोई माबूद नहीं मैने उस पर भरोसा रखा है वही अर्श (ऐसे) बुर्जूग (मख़लूका का) मालिक है
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अनुवाद — अत-तौबा 128

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Tuesday, August 18, 2026

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