अत-तौबा · 127/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَإِذَا مَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ نَّظَرَ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ هَلْ يَرَاكُم مِّنْ أَحَدٍ ثُمَّ انصَرَفُوا ۚ صَرَفَ اللَّهُ قُلُوبَهُم بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُونَ ۝١٢٧
Wa izaa maaa unzilat Sooratun nazara ba`duhum ilaa ba`din hal yaraakum min ahadin summman sarafoo; sarafal laahu quloobahum bi annahum qawmul laa yafqahoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब कोई सूरा नाज़िल किया गया तो उसमें से एक की तरफ एक देखने लगा (और ये कहकर कि) तुम को कोई मुसलमान देखता तो नहीं है फिर (अपने घर) पलट जाते हैं (ये लोग क्या पलटेगें गोया) ख़ुदा ने उनके दिलों को पलट दिया है इस सबब से कि ये बिल्कुल नासमझ लोग हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نَظَرَ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ: एक-दूसरे की ओर देखना, आँखों से इशारे करना।
  • هَلْ يَرَاكُم مِّنْ أَحَدٍ: क्या कोई तुम्हें देख रहा है?
  • انصَرَفُوا: वहाँ से चले गए, मजलिस छोड़ दी।
  • صَرَفَ اللَّهُ قُلُوبَهُم: अल्लाह ने उनके दिलों को (हिदायत से) फेर दिया।
  • لَا يَفْقَهُونَ: वे समझते नहीं, न तो समझते हैं और न ही विचार करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब अल्लाह की ओर से कोई सूरा उतरती है जिसमें मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) की हालत और उनके अंदरूनी हाल का ज़िक्र होता है, तो वे लोग शर्मिंदगी और ग़ुस्से से एक-दूसरे की ओर देखने लगते हैं। वे आपस में आँखों ही आँखों से इशारे करते हैं कि यह सूरा हमारे बारे में उतरी है। फिर वे डरते हुए कहते हैं: "क्या कोई (मोमिनीन में से) हमें देख रहा है?" अगर उन्हें लगता है कि कोई उन्हें नहीं देख रहा, तो वे चुपचाप मजलिस से उठकर चले जाते हैं, ताकि उनका पर्दाफ़ाश न हो और उनकी फ़ज़ीहत (रुसवाई) न हो।

अल्लाह ने उनके दिलों को हिदायत और ईमान से फेर दिया, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो अल्लाह की आयतों पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र नहीं करते। उनकी समझ में कमी है, वे सच्चाई को नहीं पहचानते और न ही उससे सबक़ लेते हैं। उनका यह व्यवहार — सूरा सुनते ही भाग खड़े होना — इस बात का सबूत है कि उनके दिलों में ईमान की कोई गुंजाइश नहीं बची, इसलिए अल्लाह ने भी उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया।


फ़ायदे (सीख):

  1. मुनाफ़िक़ों की पहचान: इस आयत से मालूम होता है कि मुनाफ़िक़ों की निशानी यह है कि जब अल्लाह की आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वे बेचैन हो जाते हैं और उस मजलिस से भागने की कोशिश करते हैं। मोमिन का हाल इसके उलट होता है — वह क़ुरआन सुनकर सुकून पाता है और उस पर अमल करता है।
  2. समझ और विचार की अहमियत: अल्लाह ने मुनाफ़िक़ों को "لَا يَفْقَهُونَ" (न समझने वाले) कहा। इससे सीख मिलती है कि दीन को समझकर पढ़ना और उस पर ग़ौर करना बहुत ज़रूरी है। सिर्फ़ ज़ुबान से ईमान लाना काफ़ी नहीं, बल्कि दिल से समझना और अमल करना ज़रूरी है।
  3. अल्लाह की पकड़: जो लोग हक़ से मुँह मोड़ते हैं और नबी (ﷺ) की मजलिस से भागते हैं, अल्लाह उनके दिलों को हिदायत से महरूम कर देता है। यह अल्लाह की सुन्नत (क़ानून) है कि जो हक़ को ठुकराता है, उसे हिदायत नहीं मिलती।
  4. सच्चे मोमिन की ख़ूबी: मोमिन वह है जो क़ुरआन की आयतों को सुनकर उससे सीख लेता है, अपनी ग़लतियों को सुधारता है और अल्लाह से डरता है। उसे किसी से छिपने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि उसका दिल साफ़ और नीयत सच्ची होती है।
  5. अल्लाह की रहमत की तरफ़ दौड़ना: यह आयत हमें सिखाती है कि हमें क़ुरआन से दूर नहीं भागना चाहिए, बल्कि उसकी तरफ़ आना चाहिए। क़ुरआन हमारे लिए रहमत और हिदायत है, और जो इसे अपनाता है, अल्लाह उसके दिल को रौशन कर देता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 125-129 — अत-तौबा

125وَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ فَزَادَتْهُمْ رِجْسًا إِلَىٰ رِجْسِهِمْ وَمَاتُوا وَهُمْ كَافِرُونَ
मगर जिन लोगों के दिल में (निफाक़ की) बीमारी है तो उन (पिछली) ख़बासत पर इस सूरो ने एक ख़बासत और बढ़ा दी और ये लोग कुफ़्र ही की हालत में मर गए
126أَوَلَا يَرَوْنَ أَنَّهُمْ يُفْتَنُونَ فِي كُلِّ عَامٍ مَّرَّةً أَوْ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ لَا يَتُوبُونَ وَلَا هُمْ يَذَّكَّرُونَ
क्या वह लोग (इतना भी) नहीं देखते कि हर साल एक मरतबा या दो मरतबा बला में मुबितला किए जाते हैं फिर भी न तो ये लोग तौबा ही करते हैं और न नसीहत ही मानते हैं
127وَإِذَا مَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ نَّظَرَ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ هَلْ يَرَاكُم مِّنْ أَحَدٍ ثُمَّ انصَرَفُوا ۚ صَرَفَ اللَّهُ قُلُوبَهُم بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُونَ
और जब कोई सूरा नाज़िल किया गया तो उसमें से एक की तरफ एक देखने लगा (और ये कहकर कि) तुम को कोई मुसलमान देखता तो नहीं है फिर (अपने घर) पलट जाते हैं (ये लोग क्या पलटेगें गोया) ख़ुदा ने उनके दिलों को पलट दिया है इस सबब से कि ये बिल्कुल नासमझ लोग हैं
128لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِّنْ أَنفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُم بِالْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ
लोगों तुम ही में से (हमारा) एक रसूल तुम्हारे पास आ चुका (जिसकी शफ़क्क़त (मेहरबानी) की ये हालत है कि) उस पर शाक़ (दुख) है कि तुम तकलीफ उठाओ और उसे तुम्हारी बेहूदी का हौका है ईमानदारो पर हद दर्जे रफ़ीक़ मेहरबान हैं
129فَإِن تَوَلَّوْا فَقُلْ حَسْبِيَ اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ ۖ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ
ऐ रसूल अगर इस पर भी ये लोग (तुम्हारे हुक्म से) मुँह फेरें तो तुम कह दो कि मेरे लिए ख़ुदा काफी है उसके सिवा कोई माबूद नहीं मैने उस पर भरोसा रखा है वही अर्श (ऐसे) बुर्जूग (मख़लूका का) मालिक है
अत-तौबाकुरान सूची
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मदनीRevelation
127आयत

अनुवाद — अत-तौबा 127

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Tuesday, August 18, 2026

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