अत-तौबा · 16/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تُتْرَكُوا وَلَمَّا يَعْلَمِ اللَّهُ الَّذِينَ جَاهَدُوا مِنكُمْ وَلَمْ يَتَّخِذُوا مِن دُونِ اللَّهِ وَلَا رَسُولِهِ وَلَا الْمُؤْمِنِينَ وَلِيجَةً ۚ وَاللَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ ۝١٦
Am hasibtum an turakoo wa lammaa ya`lamil laahul lazeena jaahadoo minkum wa lam yattakhizoo min doonil laahi wa laa Rasoolihee wa lalmu`mineena waleejah; wallaahu khabeerum bimaa ta`maloon
📖 हिंदी अर्थ
क्या तुमने ये समझ लिया है कि तुम (यूं ही) छोड़ दिए जाओगे और अभी तक तो ख़ुदा ने उन लोगों को मुमताज़ किया ही नहीं जो तुम में के (राहे ख़ुदा में) जिहाद करते हैं और ख़ुदा और उसके रसूल और मोमेनीन के सिवा किसी को अपना राज़दार दोस्त नहीं बनाते और जो कुछ भी तुम करते हो ख़ुदा उससे बाख़बर है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • वलीजा (وَلِيجَةً): किसी व्यक्ति का विशेष मित्र, भेदिया या अंदरूनी साथी बनाना, जिससे व्यक्ति अपने रहस्य साझा करे। यहाँ इसका अर्थ है काफ़िरों को अपना घनिष्ठ मित्र और सहयोगी बनाना।
  • अम (أَمْ): यहाँ यह 'बल्कि' या 'क्या' के अर्थ में है, जो पूछताछ के लिए आया है।
  • लम्मा (لَمَّا): 'अभी तक नहीं' — यानी जब तक ऐसा नहीं हो जाता।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमानवालों! क्या तुमने यह समझ लिया है कि तुम्हें यूँ ही छोड़ दिया जाएगा, बिना किसी परीक्षा के? यह अल्लाह की सुन्नत (रीति) है कि वह अपने बंदों को परीक्षा में डालता है, ताकि सच्चे और झूठे लोग स्पष्ट हो जाएँ। यह परीक्षा जिहाद (संघर्ष) के माध्यम से होती है — कि तुममें से कौन अल्लाह के मार्ग में सच्चे दिल से संघर्ष करता है, और कौन केवल दिखावे के लिए या सांसारिक लाभ के लिए।

अल्लाह तआला का यह ज्ञान पहले से ही है, लेकिन उसका तरीका यह है कि वह चीज़ों को प्रकट रूप में सामने लाता है, ताकि लोगों पर हुज्जत (प्रमाण) स्थापित हो। इस परीक्षा में वही लोग कामयाब होते हैं जो अल्लाह, उसके रसूल (ﷺ) और मोमिनीन को अपना सच्चा सहारा और मित्र बनाते हैं, और काफ़िरों को अपना अंदरूनी मित्र व भेदिया नहीं बनाते। ऐसे लोग जो काफ़िरों से दोस्ती करते हैं और उन्हें अपने रहस्य सौंपते हैं, वे अल्लाह की नज़र में सच्चे मोमिन नहीं हैं।

अल्लाह तआला हर उस काम से पूरी तरह अवगत है जो तुम करते हो — चाहे वह अच्छा हो या बुरा, चाहे वह इख़लास (शुद्ध नियत) के साथ हो या दिखावे के साथ। वह तुम्हारे सभी कर्मों का हिसाब लेगा और उसका बदला देगा।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. परीक्षा अनिवार्य है: अल्लाह ने मोमिनों को यह स्पष्ट कर दिया कि ईमान का दावा करना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि परीक्षा से गुज़रना ज़रूरी है। यह जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो व्यक्ति को निखारता है।
  2. सच्चाई और ईमानदारी की पहचान: यह आयत हमें सिखाती है कि कठिनाइयों और परीक्षाओं के समय ही सच्चे और झूठे लोगों की पहचान होती है। इसलिए परीक्षा को बुरा नहीं समझना चाहिए, बल्कि इसे अल्लाह की ओर से एक नेमत समझना चाहिए।
  3. वफ़ादारी का पैमाना: मोमिन की पहचान यह है कि वह अल्लाह, उसके रसूल और मोमिनीन के साथ वफ़ादार रहे, और काफ़िरों को अपना अंदरूनी मित्र न बनाए। यह हमें सिखाता है कि हमारी मित्रता और सहयोग की नींव ईमान पर होनी चाहिए।
  4. अल्लाह की निगरानी का एहसास: यह आयत हमें याद दिलाती है कि अल्लाह हमारे हर काम से वाकिफ़ है। यह एहसास हमें अच्छे काम करने की प्रेरणा देता है और बुरे कामों से रोकता है।
  5. इख़लास की अहमियत: अल्लाह के यहाँ वही काम क़बूल है जो शुद्ध नियत से किया जाए। दिखावे और सांसारिक लाभ के लिए किए गए काम अल्लाह के यहाँ बेकार हैं। यह हमें सिखाता है कि हर अमल में इख़लास (शुद्ध नियत) को शामिल करें।

📜 आयत 14-18 — अत-तौबा

14قَاتِلُوهُمْ يُعَذِّبْهُمُ اللَّهُ بِأَيْدِيكُمْ وَيُخْزِهِمْ وَيَنصُرْكُمْ عَلَيْهِمْ وَيَشْفِ صُدُورَ قَوْمٍ مُّؤْمِنِينَ
इनसे (बेख़ौफ (ख़तर) लड़ो ख़ुदा तुम्हारे हाथों उनकी सज़ा करेगा और उन्हें रूसवा करेगा और तुम्हें उन पर फतेह अता करेगा और ईमानदार लोगों के कलेजे ठन्डे करेगा
15وَيُذْهِبْ غَيْظَ قُلُوبِهِمْ ۗ وَيَتُوبُ اللَّهُ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
और उन मोनिनीन के दिल की क़ुदरतें जो (कुफ्फ़ार से पहुचॅती है) दफ़ा कर देगा और ख़ुदा जिसकी चाहे तौबा क़ुबूल करे और ख़ुदा बड़ा वाक़िफकार (और) हिकमत वाला है
16أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تُتْرَكُوا وَلَمَّا يَعْلَمِ اللَّهُ الَّذِينَ جَاهَدُوا مِنكُمْ وَلَمْ يَتَّخِذُوا مِن دُونِ اللَّهِ وَلَا رَسُولِهِ وَلَا الْمُؤْمِنِينَ وَلِيجَةً ۚ وَاللَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
क्या तुमने ये समझ लिया है कि तुम (यूं ही) छोड़ दिए जाओगे और अभी तक तो ख़ुदा ने उन लोगों को मुमताज़ किया ही नहीं जो तुम में के (राहे ख़ुदा में) जिहाद करते हैं और ख़ुदा और उसके रसूल और मोमेनीन के सिवा किसी को अपना राज़दार दोस्त नहीं बनाते और जो कुछ भी तुम करते हो ख़ुदा उससे बाख़बर है
17مَا كَانَ لِلْمُشْرِكِينَ أَن يَعْمُرُوا مَسَاجِدَ اللَّهِ شَاهِدِينَ عَلَىٰ أَنفُسِهِم بِالْكُفْرِ ۚ أُولَٰئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ وَفِي النَّارِ هُمْ خَالِدُونَ
मुशरेकीन का ये काम नहीं कि जब वह अपने कुफ़्र का ख़ुद इक़रार करते है तो ख़ुदा की मस्जिदों को (जाकर) आबाद करे यही वह लोग हैं जिनका किया कराया सब अकारत हुआ और ये लोग हमेशा जहन्नुम में रहेंगे
18إِنَّمَا يَعْمُرُ مَسَاجِدَ اللَّهِ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآتَى الزَّكَاةَ وَلَمْ يَخْشَ إِلَّا اللَّهَ ۖ فَعَسَىٰ أُولَٰئِكَ أَن يَكُونُوا مِنَ الْمُهْتَدِينَ
ख़ुदा की मस्जिदों को बस सिर्फ वहीं शख़्स (जाकर) आबाद कर सकता है जो ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान लाए और नमाज़ पढ़ा करे और ज़कात देता रहे और ख़ुदा के सिवा (और) किसी से न डरो तो अनक़रीब यही लोग हिदायत याफ्ता लोगों मे से हो जाऎंगे
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अनुवाद — अत-तौबा 16

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Tuesday, August 18, 2026

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