maa kaana lilmushrikeena ai ya`muroo masaajidal laahi shaahideena `alaaa anfusihim bilkufr; ulaaa`ika habitat a`maaluhum wa fin naari hum khaalidoon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
मुशरेकीन का ये काम नहीं कि जब वह अपने कुफ़्र का ख़ुद इक़रार करते है तो ख़ुदा की मस्जिदों को (जाकर) आबाद करे यही वह लोग हैं जिनका किया कराया सब अकारत हुआ और ये लोग हमेशा जहन्नुम में रहेंगे
🌐 Additional reference in اردو
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مشرکوں کی زیبا نہیں کہ خدا کی مسجدوں کو آباد کریں جب کہ وہ اپنے آپ پر کفر کی گواہی دے رہے ہیں۔ ان لوگوں کے سب اعمال بےکار ہیں اور یہ ہمیشہ دوزخ میں رہیں گے
يَعْمُرُوا: आबाद करें, यानी मस्जिदों की देखभाल करें, उन्हें बनाए रखें, उनमें इबादत करें।
شَاهِدِينَ عَلَى أَنْفُسِهِمْ بِالْكُفْرِ: अपने कुफ्र (अविश्वास) की गवाही देते हुए, यानी अपने कुफ्र को खुले तौर पर ज़ाहिर करते हुए।
حَبِطَتْ: बेकार हो गए, नष्ट हो गए, उनका कोई फल नहीं रहा।
तफसीर (व्याख्या):
यह आयत उन मुशरिकों (बहुदेववादियों) के बारे में है जो काबा और मस्जिद-ए-हराम की सेवा और देखभाल पर गर्व करते थे। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि मुशरिकों का यह काम बिल्कुल उचित नहीं है कि वे अल्लाह की मस्जिदों को आबाद करें, जबकि वे खुद अपने कुफ्र का इज़हार करते हैं। वे अपनी ज़ुबान से कहते हैं कि हम मुशरिक हैं, वे मूर्तियों की पूजा करते हैं, रसूल (ﷺ) को झुठलाते हैं, और अपने शिर्क (अल्लाह के साथ साझीदार ठहराने) को खुले तौर पर प्रकट करते हैं।
इसका मतलब यह है कि अल्लाह की मस्जिदों की आबादी का असली हक़दार वही है जो अल्लाह पर ईमान रखता है और उसकी इबादत करता है। मुशरिकों के ये काम, चाहे वे कितने भी बड़े क्यों न हों, अल्लाह के यहाँ स्वीकार नहीं होंगे, क्योंकि ईमान उनके कामों की स्वीकृति की शर्त है। इसलिए उनके सारे अच्छे काम क़ियामत के दिन बेकार हो जाएंगे, और उनका अंजाम यह होगा कि वे हमेशा के लिए जहन्नम (नरक) की आग में रहेंगे। हाँ, अगर वे शिर्क से तौबा कर लें और ईमान ले आएं, तो अल्लाह उन्हें माफ़ कर सकता है।
फ़ायदे (सीख):
अल्लाह की मस्जिदों की आबादी और देखभाल का सम्मान उन्हीं को दिया जाता है जो अल्लाह पर ईमान रखते हैं। यह एक बड़ा सम्मान और सौभाग्य है।
ईमान के बिना अच्छे काम भी अल्लाह के यहाँ स्वीकार नहीं होते। इसलिए सबसे पहले अपने ईमान को सही करना चाहिए।
इस्लाम सिखाता है कि इंसान को अपने कुफ्र और शिर्क पर गर्व नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे अल्लाह की तरफ लौटना चाहिए, क्योंकि अल्लाह तौबा करने वालों को माफ़ कर देता है।
यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह के घरों की इज़्ज़त करना और उन्हें आबाद रखना एक बहुत बड़ी नेमत है, और यह नेमत सिर्फ मोमिनों को ही मिलती है।
मुशरेकीन का ये काम नहीं कि जब वह अपने कुफ़्र का ख़ुद इक़रार करते है तो ख़ुदा की मस्जिदों को (जाकर) आबाद करे यही वह लोग हैं जिनका किया कराया सब अकारत हुआ और ये लोग हमेशा जहन्नुम में रहेंगे
क्या तुमने ये समझ लिया है कि तुम (यूं ही) छोड़ दिए जाओगे और अभी तक तो ख़ुदा ने उन लोगों को मुमताज़ किया ही नहीं जो तुम में के (राहे ख़ुदा में) जिहाद करते हैं और ख़ुदा और उसके रसूल और मोमेनीन के सिवा किसी को अपना राज़दार दोस्त नहीं बनाते और जो कुछ भी तुम करते हो ख़ुदा उससे बाख़बर है
मुशरेकीन का ये काम नहीं कि जब वह अपने कुफ़्र का ख़ुद इक़रार करते है तो ख़ुदा की मस्जिदों को (जाकर) आबाद करे यही वह लोग हैं जिनका किया कराया सब अकारत हुआ और ये लोग हमेशा जहन्नुम में रहेंगे
ख़ुदा की मस्जिदों को बस सिर्फ वहीं शख़्स (जाकर) आबाद कर सकता है जो ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान लाए और नमाज़ पढ़ा करे और ज़कात देता रहे और ख़ुदा के सिवा (और) किसी से न डरो तो अनक़रीब यही लोग हिदायत याफ्ता लोगों मे से हो जाऎंगे
क्या तुम लोगों ने हाजियों की सक़ाई (पानी पिलाने वाले) और मस्जिदुल हराम (ख़ानाए काबा की आबादियों को उस शख़्स के हमसर (बराबर) बना दिया है जो ख़ुदा और रोज़े आख़ेरत के दिन पर ईमान लाया और ख़ुदा के राह में जेहाद किया ख़ुदा के नज़दीक तो ये लोग बराबर नहीं और खुदा ज़ालिम लोगों की हिदायत नहीं करता है
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