अत-तौबा · 44/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
لَا يَسْتَأْذِنُكَ الَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ أَن يُجَاهِدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ ۝٤٤
Laa yastaazinukal lazeena yu`minoona billaahi wal Yawmil Aakhiri ai yujaa hidoo bi amwaalihim wa anfusihim; wallaahu `aleemum bilmut taqeen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) जो लोग (दिल से) ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान रखते हैं वह तो अपने माल से और अपनी जानों से जिहाद (न) करने की इजाज़त मॉगने के नहीं (बल्कि वह ख़ुद जाऎंगे) और ख़ुदा परहेज़गारों से खूब वाक़िफ है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَا يَسْتَأْذِنُكَ – वे आपसे अनुमति नहीं माँगते
  • يُجَاهِدُوا – वे जिहाद करें (संघर्ष करें)
  • بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ – अपने धन और अपनी जान से
  • عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ – परहेज़गारों (मुत्तक़ियों) को भली-भाँति जानने वाला

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन मोमिनों की सच्ची पहचान बयान करती है जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हैं। ऐसे लोग कभी भी पैग़म्बर ﷺ से यह अनुमति नहीं माँगते कि वे जिहाद से पीछे रह जाएँ—न अपने धन के साथ और न अपनी जान के साथ। उनका ईमान उन्हें इस बात पर उभारता है कि वे स्वयं आगे बढ़कर अल्लाह के मार्ग में संघर्ष करें, बिना किसी के कहने के। यह अनुमति माँगने का स्वभाव तो मुनाफ़िक़ों (दिखावटी ईमान रखने वालों) का है, जो बहाने बनाकर जिहाद से बचना चाहते हैं।

सच्चे मोमिन का काम यह है कि जब भी उसे बुलाया जाए, वह तुरंत तैयार हो जाए। हाँ, अगर कोई वाजिब (वैध) उज़्र (कारण) हो—जैसे बीमारी, असमर्थता या कोई मजबूरी—तो वह उस स्थिति में पीछे रह सकता है, लेकिन यह भी उसकी नीयत की सच्चाई पर निर्भर है। अल्लाह तआला हर उस इंसान के दिल की नीयत को जानता है जो उससे डरता है और उसकी आज्ञा का पालन करते हुए उसकी नफ़रमानी से बचता है। वही अल्लाह उन मुत्तक़ियों को अच्छी तरह जानता है जो अपने ईमान में सच्चे हैं और अपने कर्तव्यों को निभाने में पूरी तरह مخلص हैं।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान का दावा सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि अमल से होता है। जो लोग अल्लाह और आख़िरत पर सच्चा ईमान रखते हैं, वे अपने धन और जान से अल्लाह के मार्ग में कुर्बानी देने में कभी पीछे नहीं हटते।
  2. यह हमें बताती है कि अल्लाह के दीन की मदद करने में जो लोग आगे बढ़ते हैं, उनका दर्जा अल्लाह के यहाँ बहुत ऊँचा है, और अल्लाह उनकी नीयत और उनके अमल की क़द्र करता है।
  3. इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हमें अपने जीवन में हर उस काम के लिए तैयार रहना चाहिए जो अल्लाह को पसंद है—चाहे वह धन से हो या जान से। यही सच्ची बंदगी है।
  4. यह हमें मुनाफ़िक़ों के स्वभाव से बचाती है, जो बहाने बनाकर अल्लाह के काम से जी चुराते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने ईमान को अमल में बदलें और अल्लाह की राह में हर संभव कुर्बानी दें।
  5. अल्लाह का यह ज्ञान कि वह मुत्तक़ियों को जानता है, हमें यह भरोसा दिलाता है कि हमारी कोई भी नेकी, चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो, अल्लाह से छिपी नहीं है। वह हमारे अच्छे कर्मों का बदला ज़रूर देगा।
🎧 सुनें

📜 आयत 42-46 — अत-तौबा

42لَوْ كَانَ عَرَضًا قَرِيبًا وَسَفَرًا قَاصِدًا لَّاتَّبَعُوكَ وَلَٰكِن بَعُدَتْ عَلَيْهِمُ الشُّقَّةُ ۚ وَسَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ لَوِ اسْتَطَعْنَا لَخَرَجْنَا مَعَكُمْ يُهْلِكُونَ أَنفُسَهُمْ وَاللَّهُ يَعْلَمُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ
(ऐ रसूल) अगर सरे दस्त फ़ायदा और सफर आसान होता तो यक़ीनन ये लोग तुम्हारा साथ देते मगर इन पर मुसाफ़त (सफ़र) की मशक़क़त (सख्ती) तूलानी हो गई और अगर पीछे रह जाने की वज़ह से पूछोगे तो ये लोग फौरन ख़ुदा की क़समें खॉएगें कि अगर हम में सकत होती तो हम भी ज़रूर तुम लोगों के साथ ही चल खड़े होते ये लोग झूठी कसमें खाकर अपनी जान आप हलाक किए डालते हैं और ख़ुदा तो जानता है कि ये लोग बेशक झूठे हैं
43عَفَا اللَّهُ عَنكَ لِمَ أَذِنتَ لَهُمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكَ الَّذِينَ صَدَقُوا وَتَعْلَمَ الْكَاذِبِينَ
(ऐ रसूल) ख़ुदा तुमसे दरगुज़र फरमाए तुमने उन्हें (पीछे रह जाने की) इजाज़त ही क्यों दी ताकि (तुम) अगर ऐसा न करते तो) तुम पर सच बोलने वाले (अलग) ज़ाहिर हो जाते और तुम झूटों को (अलग) मालूम कर लेते
44لَا يَسْتَأْذِنُكَ الَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ أَن يُجَاهِدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ
(ऐ रसूल) जो लोग (दिल से) ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान रखते हैं वह तो अपने माल से और अपनी जानों से जिहाद (न) करने की इजाज़त मॉगने के नहीं (बल्कि वह ख़ुद जाऎंगे) और ख़ुदा परहेज़गारों से खूब वाक़िफ है
45إِنَّمَا يَسْتَأْذِنُكَ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَارْتَابَتْ قُلُوبُهُمْ فَهُمْ فِي رَيْبِهِمْ يَتَرَدَّدُونَ
(पीछे रह जाने की) इजाज़त तो बस वही लोग मॉगेंगे जो ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान नहीं रखते और उनके दिल (तरह तरह) के शक़ कर रहे है तो वह अपने शक़ में डावॉडोल हो रहे हैं
46۞ وَلَوْ أَرَادُوا الْخُرُوجَ لَأَعَدُّوا لَهُ عُدَّةً وَلَٰكِن كَرِهَ اللَّهُ انبِعَاثَهُمْ فَثَبَّطَهُمْ وَقِيلَ اقْعُدُوا مَعَ الْقَاعِدِينَ
(कि क्या करें क्या न करें) और अगर ये लोग (घर से) निकलने की ठान लेते तो (कुछ न कुछ सामान तो करते मगर (बात ये है) कि ख़ुदा ने उनके साथ भेजने को नापसन्द किया तो उनको काहिल बना दिया और (गोया) उनसे कह दिया गया कि तुम बैठने वालों के साथ बैठे (मक्खी मारते) रहो
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीRevelation
44आयत

अनुवाद — अत-तौबा 44

सूरा अत-तौबा आयत 44 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) जो लोग (दिल से) ख़ुदा और रोज़े आख़िरत…

सूरा आयत 44/129 — अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अत-तौबा सुनें, अत-तौबा अनुवाद, अत-तौबा mp3, अत-तौबा pdf. आयत 42–46. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए