Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- لَا يَسْتَأْذِنُكَ – वे आपसे अनुमति नहीं माँगते
- يُجَاهِدُوا – वे जिहाद करें (संघर्ष करें)
- بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ – अपने धन और अपनी जान से
- عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ – परहेज़गारों (मुत्तक़ियों) को भली-भाँति जानने वाला
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन मोमिनों की सच्ची पहचान बयान करती है जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हैं। ऐसे लोग कभी भी पैग़म्बर ﷺ से यह अनुमति नहीं माँगते कि वे जिहाद से पीछे रह जाएँ—न अपने धन के साथ और न अपनी जान के साथ। उनका ईमान उन्हें इस बात पर उभारता है कि वे स्वयं आगे बढ़कर अल्लाह के मार्ग में संघर्ष करें, बिना किसी के कहने के। यह अनुमति माँगने का स्वभाव तो मुनाफ़िक़ों (दिखावटी ईमान रखने वालों) का है, जो बहाने बनाकर जिहाद से बचना चाहते हैं।
सच्चे मोमिन का काम यह है कि जब भी उसे बुलाया जाए, वह तुरंत तैयार हो जाए। हाँ, अगर कोई वाजिब (वैध) उज़्र (कारण) हो—जैसे बीमारी, असमर्थता या कोई मजबूरी—तो वह उस स्थिति में पीछे रह सकता है, लेकिन यह भी उसकी नीयत की सच्चाई पर निर्भर है। अल्लाह तआला हर उस इंसान के दिल की नीयत को जानता है जो उससे डरता है और उसकी आज्ञा का पालन करते हुए उसकी नफ़रमानी से बचता है। वही अल्लाह उन मुत्तक़ियों को अच्छी तरह जानता है जो अपने ईमान में सच्चे हैं और अपने कर्तव्यों को निभाने में पूरी तरह مخلص हैं।
फ़ायदे (उपदेश):
- यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान का दावा सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि अमल से होता है। जो लोग अल्लाह और आख़िरत पर सच्चा ईमान रखते हैं, वे अपने धन और जान से अल्लाह के मार्ग में कुर्बानी देने में कभी पीछे नहीं हटते।
- यह हमें बताती है कि अल्लाह के दीन की मदद करने में जो लोग आगे बढ़ते हैं, उनका दर्जा अल्लाह के यहाँ बहुत ऊँचा है, और अल्लाह उनकी नीयत और उनके अमल की क़द्र करता है।
- इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हमें अपने जीवन में हर उस काम के लिए तैयार रहना चाहिए जो अल्लाह को पसंद है—चाहे वह धन से हो या जान से। यही सच्ची बंदगी है।
- यह हमें मुनाफ़िक़ों के स्वभाव से बचाती है, जो बहाने बनाकर अल्लाह के काम से जी चुराते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने ईमान को अमल में बदलें और अल्लाह की राह में हर संभव कुर्बानी दें।
- अल्लाह का यह ज्ञान कि वह मुत्तक़ियों को जानता है, हमें यह भरोसा दिलाता है कि हमारी कोई भी नेकी, चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो, अल्लाह से छिपी नहीं है। वह हमारे अच्छे कर्मों का बदला ज़रूर देगा।
📜 आयत 42-46 — सूरा अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 44
सूरा अत-तौबा आयत 44 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) जो लोग (दिल से) ख़ुदा और रोज़े आख़िरत…सूरा आयत 44/129 — सूरा अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अत-तौबा सुनें, सूरा अत-तौबा अनुवाद, सूरा अत-तौबा mp3, सूरा अत-तौबा pdf. आयत 42–46. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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