अत-तौबा · 45/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
إِنَّمَا يَسْتَأْذِنُكَ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَارْتَابَتْ قُلُوبُهُمْ فَهُمْ فِي رَيْبِهِمْ يَتَرَدَّدُونَ ۝٤٥
Innamaa yastaazinukal lazeena laa yu`minoona billaahi wal Yawmil Aakhiri wartaabat quloobuhum fahum fee raibihim yataraddadoon
📖 हिंदी अर्थ
(पीछे रह जाने की) इजाज़त तो बस वही लोग मॉगेंगे जो ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान नहीं रखते और उनके दिल (तरह तरह) के शक़ कर रहे है तो वह अपने शक़ में डावॉडोल हो रहे हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَسْتَأْذِنُكَ: आपसे अनुमति माँगते हैं।
  • وَارْتَابَتْ: संदेह में पड़ गए।
  • يَتَرَدَّدُونَ: भटकते रहते हैं, हिचकिचाते हैं।

व्याख्या:

हे नबी! आपसे जिहाद से बचने के लिए अनुमति माँगने वाले वास्तव में वही लोग हैं जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान नहीं रखते। उनके दिलों में आपके द्वारा लाए गए इस्लाम और उसकी शिक्षाओं की सच्चाई के बारे में गहरा संदेह पैदा हो चुका है। वे न तो अल्लाह पर भरोसा रखते हैं, न ही उसके इनाम और अज़ाब की परवाह करते हैं। इसीलिए वे जिहाद के कठिन कार्य से भागते हैं और अनुमति माँगते हैं। ये लोग अपने इसी संदेह और शक की स्थिति में डगमगाते रहते हैं—कभी ईमान की तरफ झुकते हैं, कभी कुफ्र की तरफ—और कभी सीधे रास्ते पर स्थिर नहीं हो पाते। उनका यह व्यवहार उनके दिलों की बीमारी और निष्ठाहीनता को स्पष्ट करता है।

लाभ एवं शिक्षाएँ:

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान और अच्छे कर्म आपस में जुड़े हुए हैं। जिसके दिल में सच्चा ईमान होता है, वह अल्लाह के कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है और कठिनाइयों से नहीं भागता।
  2. संदेह और शक की स्थिति इंसान को हिचकिचाहट और बेचैनी में डाल देती है, जबकि ईमान इंसान को स्थिरता, सुकून और साहस प्रदान करता है।
  3. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने दिलों को संदेह से पाक रखना चाहिए और अल्लाह की राह में किए जाने वाले कार्यों में बाधाओं से घबराना नहीं चाहिए।
  4. यह भी शिक्षा है कि मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी मुसलमानों) की पहचान उनके आलस, बहानेबाज़ी और अल्लाह के कामों से भागने से होती है, और हमें उनके रास्ते से बचना चाहिए।
  5. अल्लाह की राह में किया गया हर छोटा कार्य, चाहे वह जिहाद हो या कोई और नेकी, ईमान की मज़बूती और अल्लाह के प्रति प्रेम का प्रमाण है।
🎧 सुनें

📜 आयत 43-47 — अत-तौबा

43عَفَا اللَّهُ عَنكَ لِمَ أَذِنتَ لَهُمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكَ الَّذِينَ صَدَقُوا وَتَعْلَمَ الْكَاذِبِينَ
(ऐ रसूल) ख़ुदा तुमसे दरगुज़र फरमाए तुमने उन्हें (पीछे रह जाने की) इजाज़त ही क्यों दी ताकि (तुम) अगर ऐसा न करते तो) तुम पर सच बोलने वाले (अलग) ज़ाहिर हो जाते और तुम झूटों को (अलग) मालूम कर लेते
44لَا يَسْتَأْذِنُكَ الَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ أَن يُجَاهِدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ
(ऐ रसूल) जो लोग (दिल से) ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान रखते हैं वह तो अपने माल से और अपनी जानों से जिहाद (न) करने की इजाज़त मॉगने के नहीं (बल्कि वह ख़ुद जाऎंगे) और ख़ुदा परहेज़गारों से खूब वाक़िफ है
45إِنَّمَا يَسْتَأْذِنُكَ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَارْتَابَتْ قُلُوبُهُمْ فَهُمْ فِي رَيْبِهِمْ يَتَرَدَّدُونَ
(पीछे रह जाने की) इजाज़त तो बस वही लोग मॉगेंगे जो ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान नहीं रखते और उनके दिल (तरह तरह) के शक़ कर रहे है तो वह अपने शक़ में डावॉडोल हो रहे हैं
46۞ وَلَوْ أَرَادُوا الْخُرُوجَ لَأَعَدُّوا لَهُ عُدَّةً وَلَٰكِن كَرِهَ اللَّهُ انبِعَاثَهُمْ فَثَبَّطَهُمْ وَقِيلَ اقْعُدُوا مَعَ الْقَاعِدِينَ
(कि क्या करें क्या न करें) और अगर ये लोग (घर से) निकलने की ठान लेते तो (कुछ न कुछ सामान तो करते मगर (बात ये है) कि ख़ुदा ने उनके साथ भेजने को नापसन्द किया तो उनको काहिल बना दिया और (गोया) उनसे कह दिया गया कि तुम बैठने वालों के साथ बैठे (मक्खी मारते) रहो
47لَوْ خَرَجُوا فِيكُم مَّا زَادُوكُمْ إِلَّا خَبَالًا وَلَأَوْضَعُوا خِلَالَكُمْ يَبْغُونَكُمُ الْفِتْنَةَ وَفِيكُمْ سَمَّاعُونَ لَهُمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالظَّالِمِينَ
अगर ये लोग तुममें (मिलकर) निकलते भी तो बस तुममे फ़साद ही बरपा कर देते और तुम्हारे हक़ में फ़ितना कराने की ग़रज़ से तुम्हारे दरमियान (इधर उधर) घोड़े दौड़ाते फिरते और तुममें से उनके जासूस भी हैं (जो तुम्हारी उनसे बातें बयान करते हैं) और ख़ुदा शरीरों से ख़ूब वाक़िफ़ है
अत-तौबाकुरान सूची
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45आयत

अनुवाद — अत-तौबा 45

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Tuesday, August 18, 2026

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